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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

द्वादशः सर्गः १३५ संत्रस्तांस्तान् सन्निवर्त्य स्वसैन्यानुलूग्खानेनानुजेनानुयातः । अव्यग्रात्मा सम्पराये समागाद् वर्षन् भल्लांस्तूर्णमल्लावुदीनः ॥६१॥ अलाउद्दीन, जिसके पीछे उसका भाई उलूगखाँ चल रहा था, अपनी भयभीत सेना को (आश्वासन देकर) रणक्षेत्र में लौटाता हुआ और स्थिरतापूर्वक शीघ्रता से बाणों की वर्षा करता हुआ, युद्धस्थल में आया ॥६१॥ शस्त्राशस्त्रि व्यापृतानां भटानां साहङ्कारैः सङ्गतानां रणान्तः । द्रागुद्भूता रक्तधाराः क्षतोत्था नादुः खेदं स्वेदवत् संस्रवन्त्यः ॥६२॥ युद्धस्थल में आये हुये अभिमानी वीरों को, परस्पर शस्त्रप्रहार के कारण घावों से पसीने की तरह बहने वाली रक्त की धाराओं ने भी कष्ट नहीं दिया ॥६२॥ उत्क्षिप्योच्चैः प्रेरितस्तीक्ष्णखड्गो नालं भेत्तुं वैरिणो वारवाणम् । तत्संघट्टादुत्थितोऽङ्गे कृशानुर्निन्ये मूर्च्छां लम्बकूर्चावलम्बो ॥६३॥ किसी वीर ने अपनी तलवार उठाकर बड़े जोर से शत्रु पर जो प्रहार किया वह प्रहार शत्रु का कवच नहीं भेद सका, किन्तु तलवार और कवच के संघर्ष से शत्रु के वक्षःस्थल में जो आग निकल पड़ी वह शत्रु की लम्बी दाढ़ी में जा लगी और उसने शत्रु को मूर्च्छित कर दिया ॥६३॥ क्रोधान्मुक्ता धन्विभिस्तीव्रवेगैरग्रे लूनं वैरिणां वक्त्रपद्मम् । संबिभ्राणा व्योमकासारमध्ये बाणास्तिर्यग्नाललक्ष्मीमवापुः ॥६४॥ तीव्र वेग वाले धनुर्धरों ने क्रोध से जो बाण छोड़े वे शत्रुओं के मुख-कमलों को काटकर आकाश में ले उड़े और उन्होंने आकाश-सरोवर में शत्रुओं के मुख-कमलों के नीचे-टेढ़े कमल-नाल की शोभा को प्राप्त किया ॥६४॥ सङ्ग्रामान्ते पतितानां भटानां भूषारत्नज्योतिषाऽत्युज्ज्वलाभैः । अस्रापूरैर्लम्भिताः पावकाभैर्धूमच्छायामुच्छ्रिता दन्तिदेहाः ॥६५॥ युद्धक्षेत्र में काम आये हुये वीरों के रत्नाभूषणों की चमक से जिनकी आभा बढ़ गई थी ऐसे, अग्नि के समान प्रज्वलित रक्त-समूहों ने, मारे गये हाथियों के काले और उन्नत शरीरों को धुयें की शोभा प्राप्त करा दी ॥६५॥ उत्तानस्थं स्रस्तमुक्तहस्तादध्यारूढाः खेटकं बद्धकेल्यः । तत्राजस्रप्रस्रुतास्रस्रवन्तीः फेत्कारिण्यः फेरुकान्ताः प्रतेरुः ॥६६॥ खेल करने वालीं और 'फेत् फेत्' शब्द करने वालीं गीदड़ों की मादाओं ने, युद्धक्षेत्र में निरन्तर बहने वाले रक्त की नदियों को, किसी वीर के कटे हुए हाथ से गिरे हुए और सीधे खड़े हुए खेटक नामक शस्त्र पर चढ़कर (वहाँ से कूदकर) पार किया ॥६६॥ (६६) खेटकमायुधविशेषम् । 'फेत् फेत्' इति अपशब्दं कुर्वन्त्यः । फेरुकान्ताः शृगाल्यः ।

१३६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् वीक्ष्य स्वीयं सैनिकं शीर्यमाणं मत्वा शत्रोः शौर्यमानन्त्यभाजः । अध्यारुढः कुञ्जरेन्द्रं नरेन्द्रः प्रायाद् यस्मिन् पारसीकक्षितीशः ॥६७॥ अपनी थोड़ी सी सेना को भी क्षीण होते हुये देख कर और शत्रु की अनन्त सेना को देख कर हम्मीरदेव, हाथी पर बैठे हुए, उधर गये जिस ओर सुलतान अलाउद्दीन था ॥६७॥ तं तेजोभिः प्रज्वलन्तं दुरन्तैरावव्रुस्ते यौगपद्येन योधाः । कल्पापाये क्रूररूपं यथोच्चैर्बिम्बं पूष्णः पुष्कराद्याः पयोदाः ॥६८॥ दुर्धर्ष तेज से प्रज्वलित वीर हम्मीरदेव को शत्रु सैनिकों ने एक साथ उस प्रकार घेर लिया जिस प्रकार पुष्कर आदि बादल, प्रलय के समय, सूर्य के भयानक तेजस्वी बिम्ब को वेग से ढक लेते हैं ॥६८॥ तान् दुर्वारान् वारयन् बाणवर्षै म्लेच्छव्रातानब्रवीत् तीव्रकर्मा । क्षुद्राः क्षुद्रासन्निभाः केऽत्र यूयं जाग्रत्युग्रे चाहूवाणप्रतापे ॥६९॥ उग्र कर्म में निपुण राजा हम्मीर, उन दुर्धर्ष म्लेच्छों के समूहों को अपने बाणों की वर्षा से हटाकर, यों बोले—तुच्छ बर्रों के समान (डंक मारने वाले) क्षुद्र पुरुषों ! उग्र प्रतापी चौहाण के प्रज्वलित रहते तुम क्या कर सकते हो ? ॥६९॥ उलूगखानोलूकमूकोऽत्र भूयः प्रागेव त्वं ज्ञातसारः परोक्षम् । क्षुद्रैरेव द्रावितः सङ्क्रान्तात् सौरं तेजः सोढुमेवाक्षमोऽसि ॥७०॥ उल्लू की तरह चुप रहने वाले उलूग खाँ ! तू फिर यहाँ आया है। तेरी शक्ति का पता तो हमारे परोक्ष में ही लग गया था जब हमारे साधारण सैनिकों ने ही तुझे हरा कर युद्धक्षेत्र से भगा दिया था। जैसे उल्लू सूर्य का तेज नहीं सह सकता, उसी प्रकार तू भी सूर्यवंशी चौहाण का तेज नहीं सह सकता ॥७०॥ शंसन्नित्थं सन्निपत्य प्रवीरान् सर्वैरम्भैर्बाधमानानरातीन् । अह्नायाऽसौ प्रत्यगृह्णान्नरेन्द्रो नागानन्यान् यूथनाथो यथैकः ॥७१॥ इस प्रकार कह कर वीर हम्मीर ने आगे बढ़कर अपनी शक्ति से वीर शत्रुओं को बाधित करके उन पर शीघ्र उसी प्रकार आक्रमण किया जिस प्रकार यूथनायक हाथी अकेला ही अन्य हाथियों पर आक्रमण करता है ॥७१॥ सर्वेष्वेव प्रेषितास्तुल्यकालं चापात्तस्य प्रापतन्तः पृषत्काः । स्थूलां मूर्तिं बुद्धिमप्याशु सूक्ष्मां भित्वा मोहं द्विप्रकारं वितेनुः ॥७२॥ हम्मीरदेव के धनुष से छूटे हुये बाण एक साथ सब शत्रुओं पर गिरे और उनके स्थूल शरीर को तथा सूक्ष्म बुद्धि को भेदकर उन्हें दोनों प्रकार से मूर्च्छित कर दिया ॥७२॥ (६९) क्षुद्राः वरटाः भ्रमर्यः ।

१८ द्वादशः सर्गः १३७ नालक्ष्यन्त क्षिप्रकर्तुः पृषत्काश्छिन्दन्तस्ते वातवेगा अरातीन् । उन्नीयन्ते पात्यमानैः शरीरैः स्फारां धारां रौधिरीमुद्वमद्भिः ॥७३॥ अत्यन्त शीघ्रता से बाण चलाने वाले हम्मीरदेव के वायु के समान गतिशील बाण शत्रुओं को काटते हुये दिखाई नहीं देते थे ; रक्त की विस्तृत धारा को उगलने वाले गिरते हुए शरीरों द्वारा उन बाणों का अनुमान किया जाता था ॥७३॥ म्लेच्छाधीशोऽप्यस्य मूर्च्छत्प्रतापः पत्रिव्रातैरातुदत् कुञ्जरेन्द्रान् । तैरत्यर्थं मर्मविद्धोऽपि युद्धे तस्थौ पक्षे रोद्धुराधोरणस्य ॥७४॥ म्लेच्छपति अलाउद्दीन भी हम्मीरदेव के बाण-समूहों के कारण मूर्छित प्रताप वाला बन गया और उसने अपने हाथियों को हम्मीर की सेना पर आक्रमण के लिये प्रेरित किया । किन्तु जब वह स्वयं हम्मीर के बाणों से युद्ध में मर्मविद्ध होने लगा तो उसे आक्रमण रोकने वाले महावत के पीछे छिपना पड़ा ॥७४॥ विश्राम्यन्ती तत्र शुभ्रातपत्रच्छायासीना स्वैरमेवोभयत्र । भूयो भूयो भूभृतोः सञ्चरन्ती पार्श्वं प्रापन्नैव खेदं जयश्रीः ॥७५॥ युद्धस्थल में, वीर हम्मीरदेव और अलाउद्दीन इन दोनों राजाओं के शुभ्र छत्रों की छाया में यथेच्छ बैठने वाली विजय-लक्ष्मी कभी हम्मीरदेव के और कभी अलाउद्दीन के पास जाती हुई खिन्न नहीं होती थी ॥७५॥ नागात् तस्मात् पतितात् यावदन्यं नागाद् वेगाद् वाहनं चाहुवाणः । तावद् भिन्दन् भिन्दिपालेन वक्षश्चिक्षेपैनं वीरतल्पे विपक्षः ॥७६॥ अपने मारे गये हाथी को छोड़कर ज्यों ही हम्मीरदेव चौहान दूसरे हाथी पर चढ़ने लगे उसी समय शत्रु ने भिन्दिपाल (बन्दूक ?) नामक शस्त्र से उनका वक्षःस्थल भेद कर उन्हें वीर-शय्या पर सुला दिया ॥७६॥ सुचिरमथविपक्षक्षोणिपानीकिनीनां क्षतजमयनदीभिः क्षोणिमाप्लाव्य कृत्स्नाम् । तनुमनुपमरूपां स्थेयसीं कीर्तिरूपामविशदसमतेजा वीरहम्मीरदेवः ॥७७॥ इस प्रकार सम्पूर्ण युद्धभूमि को बहुत देर तक शत्रु राजा की सेनाओं के घावों से बहने वाली रुधिर की नदियों से पाट कर, अद्वितीय तेजस्वी वीर हम्मीरदेव ने (अपने क्षणभंगुर पार्थिव शरीर को छोड़कर) अनुपम शोभायुक्त चिरस्थायी यशःशरीर में प्रवेश किया ॥७७॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये द्वादशः सर्गः (७६) भिन्दिपालः प्रायेण 'गुलेल' इति ख्यातः परन्तु नालिकास्त्रेऽपि अस्य शब्दस्य प्रयोगो दृश्यते । अत्र तु औचित्यवशात् नालिकास्त्रं 'बन्दूक' इति ख्यातमेव प्रतीयते ।

त्रयोदशः सर्गः पूर्वो हम्मीरदेवस्य सप्तमः शत्रुमर्दनः । शहाबुद्दीनमान्धोऽपि कुण्ठबाणेन योऽवधीत् ॥ १ ॥ पृथ्वीराजस्य तस्यैव समो भ्राता जयत्यजः । माणिक्यराजो मतिमानंशेन बुभुजे महीम् ॥ २ ॥ हम्मीरदेव के शत्रु को रौंदने वाले सातवें पूर्वज पृथ्वीराज के, जिन्होंने अन्धे होने पर भी कुण्ठित बाण से शहाबुद्दीन को मार दिया था, छोटे भाई बुद्धिमान् माणिक्यराज, जो अपने भाई के समान थे, अपने भाग की पृथ्वी पर शासन करते रहे ॥१-२॥ सदाऽरुणदरात्तीनां स दारुणधियां पुरम् । तमाऽऽहितधियः साधु तमाराहितकरं विदुः ॥ ३ ॥ माणिक्यराज दारुण बुद्धिवाले शत्रुओं के नगरों को सदा नष्ट-भ्रष्ट करते रहे। बुद्धिमान् लोग उनको अन्धकार को नष्ट करने वाले सूर्य के समान अथवा राहु के शत्रु भगवान् विष्णु के समान मानते थे ॥ ३ ॥ नित्यमाश्रित्य नृत्यन्ती सद्वंशालम्बिनो गुणान् । खेलति स्म निरालम्बे रङ्गे यत्कीर्तिनर्तकी ॥ ४ ॥ उत्तम वंश में उत्पन्न राजा माणिक्यराज के गुणों का आश्रय लेकर नाचती हुई उनकी कीर्ति रूपी नर्तकी आकाश में खेल किया करती थी, जैसे उत्तम बाँस में बाँधे हुये रस्सों का सहारा लेकर नाचती हुई नटी आकाश में अपने खेल दिखाया करती है ॥ ४ ॥ चक्रे न पात्रमालिन्यं पतङ्गे मित्रतामधात् । अतः प्रतापदीपोऽस्य जगदुत्तरतां गतः ॥ ५ ॥ (दीपक अपने पात्र को मलिन बना देता है और सूर्य से उसकी शत्रुता है क्योंकि सूर्योदय होते ही वह बुझ जाता है, किन्तु) माणिक्यराज का प्रताप-रूपी दीपक अलौकिक है क्योंकि वह कभी पात्रमालिन्य नहीं करता (अर्थात् सुपात्र पुरुषों के हृदयों को कभी मलिन नहीं करता) और सूर्य से उसकी मित्रता है (अर्थात् वह सूर्य के समान तेजस्वी है) ॥ ५ ॥ चण्डराजस्तनूजोऽस्य चण्डभानुसमप्रभः । चण्डराजकपद्मानांमचण्डकिरणोऽभवत् ॥ ६ ॥ माणिक्यराज के प्रचण्ड सूर्य के समान तेजस्वी चण्डराज नामक पुत्र हुये जो शत्रुराजाओं रूपी कमलों के लिये अचण्डकिरण चन्द्रमा के समान थे (जैसे चन्द्रोदय के समय कमल मुकुलित हो जाते हैं वैसे ही इनको देखकर शत्रु मुरझा जाते थे) ॥ ६ ॥ स पुत्रं भीमविक्रान्तं भीमराजमजीजनत् । भीमसेनसमः स्थाम्ना भीमसेनासमृद्धिमान् ॥ ७ ॥ उनके भयंकर पराक्रमी भीमराज नामक पुत्र हुये जो भीमसेन के समान पुष्ट थे और बल- वती सेना की समृद्धि से युक्त थे ॥ ७ ॥

त्रयोदशः सर्गः १३९ असौ विजयराजाख्यं राजा विजयशालिनम् । तनयं जनयामास जनरञ्जनचेष्टितम् ॥ ८ ॥ भीमराज के विजयराज नामक विजयशाली पुत्र उत्पन्न हुये जो प्रजा को प्रसन्न रखने का प्रयत्न किया करते थे ॥ ८ ॥ रयणस्तनयस्तस्य रयनर्तितविक्रमः । स्मयमानोद्धतानेकः स्मयमानोजयत् परान् ॥ ९ ॥ उनके रयण नामक पुत्र हुये जो अपने वेग से पराक्रम को नचाया करते थे और जो अकेले ही, गर्व और अभिमान से उद्धत शत्रुओं को हँसते हुये जीत लेते थे ॥ ९ ॥ तस्मान् महार्घनिःसीमगुणरत्नमहोदधेः । कोह्लणः कुलकल्हारकलानिधिरजायत ॥१०॥ उन बहुमूल्य और असीम गुणरत्नों के समुद्र रयण के कोह्लण नामक पुत्र हुये जो अपने कुल- कुमुद के लिये चन्द्रमा के समान थे ॥१०॥ विनीतो नीतिशास्त्रेषु विनीतोल्बणदूषणः । स्वनये सोऽभवत् ख्यातः स्वनयेऽस्य यथारिपुः ॥११॥ वे नीतिशास्त्रों में निष्णात थे और उन्होंने उग्र दोषों को दूर कर रक्खा था। जिस प्रकार उनके शत्रु अपनी अनीति में कुख्यात थे उसी प्रकार वे अपनी नीति में विख्यात थे ॥११॥ गङ्गदेवोऽभवत् तस्माद् भुवं गोपायति स्म यः । भ्रूभङ्गोद्धतदृक्पातः क्लृप्तभङ्गो विरोधिनाम् ॥१२॥ उन कोह्लण के गंगदेव उत्पन्न हुये जिन्होंने अपनी भृकुटी के क्रुद्ध कटाक्ष से शत्रुओं को नष्ट करके पृथ्वी पर शासन किया ॥१२॥ देवसिंहः सुतोऽस्यासीद् देवोपमपराक्रमः । नरदेवो नृणामिन्दुः शरदेवोपरञ्जितः ॥१३॥ गंगदेव के देवसिंह नामक पुत्र हुये जो देवता के समान पराक्रमी थे। वे नरदेव लोगों को शरद् ऋतु से शोभित पूर्ण चन्द्र के समान (सुन्दर और शीतल) प्रतीत होते थे ॥१३॥ तस्मात् समरसिंहोऽभूद् यथार्थामभिधां दधत् । कीर्तिहंसीमुखे यस्य विपच्छैवालमञ्जरी ॥१४॥ देवसिंह के समरसिंह नामक यथार्थनामा पुत्र हुये क्योंकि वे समर में वास्तव में सिंह के समान पराक्रमी थे। विपत्ति रूपी शैवालमंजरी उनकी कीर्ति-रूपी हंसी के मुख में रहती थी अर्थात् वे विपत्ति नष्ट करने में विख्यात थे ॥१४॥ नरपालमयं नाम्ना पुत्रं प्राप प्रतिष्ठितम् । नापोहति स्म यं लक्ष्मीनरपालक्रमा गता ॥ १५॥ समरसिंह के नरपाल (नापाजी) नामक प्रतिष्ठित पुत्र उत्पन्न हुये जिनको राजपरम्परा- गत लक्ष्मी ने कभी नहीं छोड़ा ॥१५॥

१४० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् हम्मीरस्तनयस्तस्य समीरणसखप्रभः । अजनिष्ट प्रतापेन जनिताऽनिष्टकृज्ज्वरः ॥११६॥ उनके हम्मीर (हामा जी) नामक अग्नि के समान तेजस्वी पुत्र हुये जिनके प्रताप के कारण शत्रुओं को ज्वर आ जाता था ॥११६॥ वरसिंहः सुतस्तस्य वरसिंहपराक्रमः । अभीरोषाञ्चकारारीन् वैरोपहितवैशसैः ॥११७॥ उनके वरसिंह नामक श्रेष्ठ सिंह (नरसिंह) के समान पराक्रमी पुत्र हुये जिन्होंने निर्भय होकर शत्रुता के कारण प्रवृद्ध क्रोधाग्नि से शत्रुओं को जला दिया॥ ११७॥ भारमल्लोऽभवत् तस्माद् भारमग्र्यं दधद् भुवः । स भारोचितदिग्वीरसभारोहणविश्रुतः ॥११८॥ उनसे भारमल्ल उत्पन्न हुये जो (अपने बलिष्ठ कंधों पर) पृथ्वी का भारी भार उठाते थे और प्रभायुक्त दिग्वीरों की सभा के स्वामी होने के कारण विख्यात थे ॥११८॥ तस्मान् नर्मदनामाऽभून् नृपधर्मधुरन्धरः । मर्मस्पृक् समरेऽरीणां शरैर्वर्मभृतामपि ॥११९॥ उनके राज-धर्म के पारंगत नर्मद नामक पुत्र हुये जो युद्ध में कवचधारी शत्रुओं के मर्मस्थलों को भी अपने बाणों से भेद देते थे ॥११९॥ तीक्ष्णकौशेयकस्तस्य वैरिवामदृशां दृशाम् । धारामश्रुमयीं दत्त्वा कज्जलश्रियमाददे ॥१२०॥ उनकी तेज (काली) तलवार शत्रुस्त्रियों के नेत्रों को आँसुओं की धारा देकर उनसे कज्जल की कालिमा ग्रहण कर लेती थी ॥१२०॥ धर्मपत्नी बभूवाऽस्य धारानाम्नी धरापतेः । अनतिक्रान्तमर्यादा यथा धारा महोदधेः ॥१२१॥ नर्मद राजा के धारा नामक धर्मपत्नी थीं जिन्होंने समुद्र की धारा के समान कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया ॥१२१॥ नर्मदस्य महीभर्तुर्महिषी तनुमध्यमा । उचितं नर्मदा साऽपि महावंशभवा यतः ॥१२२॥ नर्मद राजा की सुमध्यमा और अच्छे कुल में उत्पन्न रानी भी वास्तव में नर्मदा (आनन्द देने वाली) थीं । (रानी महान् वंश में उत्पन्न थीं और नर्मदा नदी के तट पर बड़े-बड़े बाँस उत्पन्न होते हैं) ॥१२२॥


(१७) अभीः निर्भयः । ओषाञ्चकार ददाह । वैशसं क्रोधः ।

त्रयोदशः सर्गः १४१ सुतमर्जुननामानं नृपस्तस्यामजीजनत् । शुद्धं स्वातीभवो बिन्दुः शुक्तौ मुक्ताफलं यथा ॥२३॥ नर्माद राजा न रानी धारा में अर्जुन नामक पुत्र को जन्म दिया, जैसे स्वाति नक्षत्र का जल- बिन्दु सीप में शुद्ध मोती को जन्म देता है ॥२३॥ कर्णमूर्जितसत्त्वेन जितवन्तममुं जनाः । विजयाभिख्यया दीप्तमर्जुनं साधु मेनिरे ॥२४॥ उत्कृष्ट पराक्रम के कारण कर्ण को जीतने वाले और विजय की शोभा से दीप्त अर्जुन को लोग वास्तव में कर्णविजयी 'विजय' नामक कुन्तीपुत्र अर्जुन ही मानते थे ॥२४॥ सञ्चरन् समराग्रेशु भीमसेनानुगोऽर्जुनः । पश्चाच्चकार नकुलं वाजिशिक्षाविशारदम् ॥२५॥ युद्धभूमि में भीमसेन के पीछे और नकुल के आगे चलने वाले अर्जुन के समान, राजा अर्जुन के आगे भीषण सेना चलती थी और पीछे अश्वविद्याविशारद चलते थे ॥२५॥ क्रमेणाक्रान्तभुवना द्विजेशोपरि

१४२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् आननेनाऽथ निन्दन्ती शारदीनं निशाकरम् । अलकान्तेन कान्तेन क्लेशयन्त्यलिसन्ततिम् ॥३०॥ नेत्रश्रीतर्जिताऽनेकद्राधीयःकेतकीदला । रदनच्छदरागेण रञ्जयन्ती रदान् सितान् ॥३१॥ अनीचस्तनसत्कान्त्या हसन्ती करिणां कटान् । नयन्ती कदलीकाण्डं जघनेन जघन्यताम् ॥३२॥ सरागचरणन्यासहसितस्थलसारसा । जैत्री शक्तिरनङ्गस्य सा चकाशे शरीरिणी ॥३३॥ जयन्ती अपने सुन्दर मुख से शरद्-ऋतु के चन्द्रमा को तिरस्कृत करती थी, अपने सुन्दर बालों से भ्रमरों की पंक्ति को (पराजय की) पीड़ा देती थी, अपने नेत्रों की शोभा से घने और लम्बे पत्तों वाली केतकी को दूर भगाती थी, अपने अधर की लालिमा से शुभ्र दाँतों को भी रक्त बना देती थी, उन्नत स्तनों की सुन्दर कान्ति से हाथियों के गण्डस्थलों का उपहास करती थी, अपनी जंघा की शोभा से केले के स्कन्ध को हेय समझती थी और अपने रंजित चरणों की कलापूर्ण चाल से, भूमि पर चलने वाले सारस पक्षियों का उपहास करती थी ; वह कामदेव की मूर्तिमती विजयशक्ति के समान शोभित होती थी ॥३०-३३॥ स तस्यां वंशधौरेयं सुतमिच्छन् सतां प्रियम् । प्राप पुण्यं सरः शौरेः पदाम्बुजमुपासितुम् ॥३४॥ राजा अर्जुन जयन्ती में वंशवाही और सज्जनों के प्रिय पुत्र प्राप्त करने की इच्छा से भग- वान् विष्णु के पद-कमलों की सेवा करने के लिये किसी पुण्य सरोवर के समीप गये ॥३४॥ संसारसारसरसों स संसार संसारसाम् । सरसः सुरसासाररसासिसुसारसाम् ॥३५॥ वे संसार के सार (जल) से सरस, तथा सुन्दर कमलों (सारस) से शोभित, एवं सरोवर के (सरसः) सुन्दर जल के (सुरसंस्य) बरसते हुये (आसारैः) विन्दुओं से (रसैः) चारों ओर (आ) नाचने वाले (रासिनः) सुन्दर हंसों से युक्त (सुसारसां) सरोवर के पास पहुँचे (ससार) ॥३५॥ अपोढकपटावेशैस्तपोभिः पृथिवीभुजा । नित्यमाराधयाञ्चक्रे पादपद्मं परात्मनः ॥३६॥ निष्कपट तप से राजा अर्जुन ने नित्य भगवान् के चरण-कमलों की आराधना की ॥३६॥ परापरपरेऽपारपापपूररिपौ पुरः । पुपूरेऽपि रमारामे परा प्रेमपरम्परा ॥३७॥ पर (कारण) और अपर (कार्य) दोनों के पारगामी (पर) तथा अपार पापों के समूह (पूर) के शत्रु (रिपु) लक्ष्मीपति (रमाराम) भगवान् विष्णु में राजा की प्रेमपरम्परा पूर्णता को प्राप्त हुई (पुपूरे) ॥३७॥ (३५) ससारसां कमलैः शोभिताम् । सरसः सरोवरस्य सुरसस्य सुन्दरजलस्य आसारैः वर्षद्भिारिव रसैः आ समन्तात् रासिनः क्रीडन्तः सुसारसाः शोभनाः हंसाः यस्यास्ताम् । (३७) परापराभ्यां कार्यकारणाभ्यां परे विचित्रे अतीते इत्यर्थः । अपाराणां पापानां पूरस्य समूहस्य रिपौ निवर्तके । रमारामे लक्ष्मीपतौ । पुपूरे पूर्णतां गता ।

अयन्तं सर्वसिद्धीनामाश्रयन्तं श्रियः पतिम् । Wait, look at the gap betweenसर्वसिद्धीनाम्andआश्रयन्तं: Is it सर्वसिद्धीनामाश्रयन्तंorसर्वसिद्धीनामाश्रयन्तं? It is joined: सर्वसिद्धीनामाश्रयन्तं! (दीर्घ सन्धि: सर्वसिद्धीनाम् + आश्रयन्तं -> no, सर्वसिद्धीनाम् ends in म्! म् + आ = मा! So सर्वसिद्धीनाम् + आश्रयन्तं = सर्वसिद्धीनामाश्रयन्तं!) YES! PERFECT! It's सर्वसिद्धीनामाश्रयन्तं`! What a brilliant realization. म् + आ = मा. So सर्वसिद्धीनाम् + आश्रयन्तं = सर्वसिद्धीनामाश्रयन्तं! Syllables: अ-यन्-तं स-र्व-सिद्-धी-नाम् (८) आ-श्र-यन्-तं श्रि-यः प-तिम् (८) सु-त-रा-माप्-नु-वन्-त्ये-व (८) सु-त-रा-मा-दि-सम्-प-दः (८) ॥३८॥ Meter is absolutely flawless Anushtubh!

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१४४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् न परं निजवंशस्य सोऽभूदालम्बनं शिशुः। कलिना क्लिश्यमानस्य धर्मस्याऽपि महामनाः ॥४६॥ महान् आत्मा वाला वह बालक केवल अपने वंश का ही आलम्बन नहीं हुआ, किन्तु कलियुग द्वारा सताये गये धर्म का भी आलम्बन हुआ ॥४६॥ पुरा देवान् पुरोडाशैः पुरुभिः पूरयत्यसौ। इतीव मुदितो जातः प्रदक्षिणशिखः शिखी ॥४७॥ उस बालक ने पूर्वजन्म में बहुत से पुरोडाश (हव्य विशेष, सोमरस, हुतशेष) से देवताओं को तृप्त किया था इसलिये उसके जन्म के समय अग्निदेव प्रसन्न होकर दक्षिण ज्वाला से प्रज्वलित थे (अग्नि का दक्षिण ज्वाला से जलना शुभ शकुन है) ॥४७॥ तस्य जन्मनि संभूतैः शुभवादित्रनिःस्वनैः। पूरिता हरितो हर्षात् प्रसन्नमुखतां दधुः ॥४८॥ उसके जन्म के समय बजने वाले शुभ बाजों के शब्दों से पूरित होकर दिशायें हर्ष से प्रसन्न- मुख हो रही थीं ॥४८॥ शूरः स्वकुलपद्मानां शूरोऽसौ रणधर्मयोः। इति शूरजनं नाम्ना तमाहुः सूरयः शिशुम् ॥४९॥ वे शिशु अपने कुल-कमल के लिये सूर्य (शूर) थे और युद्ध में तथा धर्म में वीर (शूर) थे, इसलिये बुद्धिमान् पुरुष उन्हें 'शूरजन' (सुर्जन) नाम से पुकारते थे ॥४९॥ शुद्धसंस्कारसंभेदादथ सातिशयां दधे। अर्जुनप्रभवः शोभां मुकुरो मार्जनादिव ॥५०॥ विशुद्ध संस्कारों के संसर्ग से अर्जुनपुत्र सुर्जन की शोभा अत्यन्त बढ़ गई थी, जैसे माँजने से शीशे की चमक बढ़ जाती है ॥५०॥ प्रतिपत्तिर्नृणां तुल्या प्रतिपत्तिथिमाश्रिते। सुधामहसि तस्मिंश्च सुधामहसितस्मरे ॥५१॥ प्रतिपदा (द्वितीया) तिथि के उदीयमान अमृत-वर्षी नव चन्द्रमा को और अपनी आभा से कामदेव का उपहास करने वाले शिशु सुर्जन को लोग समान समझते थे ॥५१॥ विद्याः कुलोचितास्तेन गुरुणा गुरुणार्पिताः। प्रज्ञाबलेन बालेन सहस्रशिखरीकृताः ॥५२॥ मेधावी बालक सुर्जन ने पूज्य गुरु द्वारा सिखाई गईं कुलोचित विद्याओं को अपनी प्रतिभा से हज़ार गुना बना दिया ॥५२॥

१९ त्रयोदशः सर्गः १४५ एकेनैव कराग्रेण विस्फुरत्तरवारिणा । स्थूलतालतरुश्रेणिं तरुणिम्नाप्यनाश्रितः ॥५३॥ बाललीलाविलोलोलं विलुलाव बली बलात् । लवं लवं ललोलावं लावं वा वेल्लिवल्ललिम् ॥५४॥ पूर्णतया तरुण न होने पर भी बलवान् और सुन्दर सुर्जन, अपने एक हाथ में चमकती तल- वार लेकर मोटे-मोटे ताड़ के वृक्षों की श्रेणी को, बाललीला के कारण चपल होकर हठात् कोमल लता के समान, काट काट कर टुकड़े-टुकड़े कर देते थे ॥५३-५४॥ लीलयाऽपि विनिर्मुक्तास्तेन नवधनुर्भृता । अपि शैलशिखाग्राणि पातयामासुराशुगाः ॥५५॥ नवीन धनुर्धारी द्वारा लीला वश छोड़े गये बाण पर्वतों के शिखरों को भी गिरा देते थे ॥५५॥ विदग्धवनिताकूतकलाहस्तावलम्बनम् उपास्यं पुष्पबाणेन विलासानां रसायनम् ॥५६॥ [L14

१४६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् पृथुलं पृथिवीभारं वहन्नेष न खिद्यताम्। कन्धरायाः परीणाहमिति तस्याऽतनोद् वयः ॥६१॥ युवावस्था ने उनके कंधों को विशाल बना दिया ताकि उन्हें भूमि का विपुल भार वहन करने में कष्ट न हो ॥६१॥ स्वच्छन्दं रमतामत्र रमया सहितो हरिः। विशालमिति वक्षोऽस्य सदृक्षो विदधे विधिः ॥६२॥ विष्णु के मित्र ब्रह्मा ने सुर्जन का वक्षःस्थल विशाल बनाया ताकि उसमें विष्णु भगवान् लक्ष्मी के साथ स्वच्छन्द रमण कर सकें ॥६२॥ प्रायो मदनिदानं स्यादन्येषामध्यमं वयः। तेनव नीतमेतस्य विनयप्रह्रतां वपुः ॥६३॥ और लोगों के लिये युवावस्था प्रायः मादक सिद्ध होती है, किन्तु सुर्जन के शरीर को उसी युवावस्था ने विनय से नम्र बना दिया ॥६३॥ धर्म एवाऽभवत् तस्य प्रणयः सर्वतोमुखः। अतस्तदनुवृत्यैनमन्ववर्तत मन्मथः ॥६४॥ सुर्जन की धर्म में ही सर्वतोमुखी प्रीति हुई, अतः कामदेव भी उनमें धर्मानुकूल रीति से ही रहते रहे ॥६४॥ शौर्यसाहससत्वानि तस्य नैसर्गिकाण्यपि। पर्याप्ति प्रापयामास शैशवाच्चरमं वयः ॥६५॥ शैशव के बाद आने वाले यौवन ने सुर्जन के स्वाभाविक बल, साहस और पराक्रम को पूर्ण बना दिया ॥६५॥ तत्र तत्र तता रीतिररातिततितुत्तरा । तारितार्तातुरातीतरुता रतिरा तत ॥६६॥ इसके बाद (ततः) सुर्जन ने सब जगह (तत्र तत्र), शत्रुओं के समूह की अत्यन्त कष्ट देने वाली (अरातिततितुत्तरा), पीड़ितों का उद्धार करने वाली (तारितार्ता) सर्वथा सम्पन्न (आतुरातीत) एवं फलीफूली (तरुता) तथा आनन्ददायिनी (रतिरा) रीति को विस्तृत किया (तता) ॥६६॥ उचिते समये शूरः संश्रित्योदयभूभृतम् । प्रथीयसा प्रतापेन प्राप सर्वोज्ज्वलां श्रियम् ॥६७॥ उचित समय पर (राजतिलक के समय) सुर्जन ने, उदयाचल परं चढ़कर उज्ज्वल तेज से सारी दिशाओं को प्रकाशित करने वाले सूर्य के समान, उन्नति शिखरारूढ़ होकर अपने महान् प्रताप से सबको उज्ज्वल बनाने वाली शोभा प्राप्त की ॥६७॥ (६६) ततः तदनन्तरं तत्र तत्र विभिन्नस्थलेषु अरातिततितुत्तरा अरातीनां ततिमतिशयेन तुदति इत्यर्थः, तारितार्ता तारिता आर्ताः यया सा, आतुरातीतरुता आतुरतामतीता सर्वथा सम्पनेत्यर्थः तरुता द्रुमत्वं छायाफल- प्रदानादिना यस्यां सा अतिशयेन फलितेत्यर्थः, रतिरा रतिं राति ददाति आनन्दप्रदेत्यर्थः, रीतिः तता विस्तुता ।

त्रयोदशः सर्गः १४७ सञ्चिकाय समर्थोऽपि पुमर्थोत्पादने स्वयम् । स वाहिनीपरीवारं व्यवहाराय वीरहा ॥६८॥ स्वयं पुरुषार्थ प्राप्ति के लिये समर्थ होने पर भी वीरों को परास्त करने वाले सुर्जन ने व्यवहार का निर्वाह करने के लिये सेना का संग्रह किया ॥६८॥ भवन्ति शक्तयस्तिस्रः क्ष्माभृतां जयहेतवः । चतुर्थी शक्तिरेतस्य विष्णुभक्तिरजायत ॥६९॥ राजाओं की विजय का कारण तीन शक्तियाँ (प्रभु-शक्ति, उत्साह-शक्ति और मंत्र-शक्ति) हुआ करती हैं, किन्तु सुर्जन के पास इन तीनों से विशिष्ट विष्णुभक्ति रूपी चौथी शक्ति भी थी ॥६९॥ दूनानन्दनिदानेन नन्दनन्दननन्दिना । दीतनादनुदाऽनेन ददे दानं दिने दिने ॥७०॥ पीडित जनों को आनन्द देने वाले, नन्दनन्दन श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने वाले और दीनों के आर्तनाद को नष्ट करने वाले सुर्जन प्रतिदिन दान देते थे ॥७०॥ न केवलं कुलायातामयं वृन्दावतीं पुरीम् । सुदुर्गाण्यपि दुर्गाणि चकार करसात् कृती ॥७१॥ सुर्जन ने, केवल परम्परा से चली आने वाली वृन्दावती (बूंदी) नगरी को ही आधीन नहीं किया, किन्तु अन्य कई दुर्गम दुर्गों को भी अपने वश में कर लिया ॥७१॥ सर्वाशाः परिपूरयन् वसुचयैः पद्माकरालम्बनैः सूरः शूरजनश्च तुल्यमुदयं यातः प्रतापोन्नतौ । सूरः पर्वणि सङ्गतः परमवत्येकं द्विजाधीश्वरं नित्यं शूरजनो धिनोति शतशस्तादृग्द्विजाधीश्वरान् ॥७२॥ कमलों के समूह का आलम्बन लेने वाले किरण-समूहों से सारी दिशाओं को व्याप्त करने वाला सूर्य और लक्ष्मी के कोश का आलम्बन लेने वाले धनसमूहों से सारी दिशाओं को परिपूर्ण करने वाले राजा सुर्जन, दोनों ही प्रतापोन्नति के उदयाचल पर समानरूप से आरूढ़ हुये; किन्तु सूर्य तो केवल अमावास्या के दिन ही चन्द्रमा (द्विजाधीश्वर) से मिलकर उसकी रक्षा करता है, लेकिन राजा सुर्जन ने नित्य ही सैकड़ों श्रेष्ठ ब्राह्मणों (द्विजाधीश्वर) का संग करके उनको प्रसन्न किया ॥७२॥ (६८) संचिकाय संजग्राह । (७०) दीनानां नादं नुदति दूरीकरोतीति दीनानादनुत् तेन । (७२) पर्वणि अमायाम् ।

तेषुorजङ्घऽद्रुतेषु? Wait, look at द्रु: Does it have a loop? Wait, could it be ङ्कतेषु? No, has a cross bar. There is no cross bar. Look at:withand->द्रु. Wait, look at द्रुतेषुin Hindi: "भागने वाले" = running = द्रुत! "गतेषु" would just be "जाने वाले". "भागने वाले" is specifically "द्रुतेषु"! So the word in the verse is definitelyद्रुतेषु! And before it is जङ्घand an avagraha-like sign: जङ्घऽद्रुतेषु(orजङ्घ ऽद्रुतेषु). Wait, look at line 12 again: त्रासादाशागजेषु स्खलनपरवशाभुग्नजङ्घऽद्रुतेषु ।Wait, could the avagraha be? Yes, it is literally printed as ऽ`!

Let's read line 13: वल्गत्सामन्तवर्गप्रबलपदभरव्यग्रभोगीन्द्रकम्पा- Let's check the letters: वल्गत् - सा - मन्त - वर्ग - प्रबल - पद - भर - व्यग्र - भोगीन्द्र - कम्

त्रयोदशः सर्गः १४९ कर रखा था) परास्त करके और शीघ्र ही, जैसे भगवान् विष्णु ने नरकासुर को दूर भगा दिया था वैसे ही, मालवा के सुलतान को दूर भगाकर, कूटयन्त्र बनाने में निपुण कारीगरों द्वारा निर्मित और जंगल के कारण दुर्गम तथा कठिन मार्ग वाले कोटा नामक भीषण दुर्ग को अपने अधिकार में कर लिया ॥७६॥ विस्रस्तैः केशहस्तैर्नवसलिलभुवां विभ्रमं दर्शयन्त्यः शम्पाः सम्पादयन्त्यो दिशि दिशि कनकस्निग्धगौरैः प्रतीकैः। धाराभिर्बाष्पवारां धरणिधरधुनीधोरणीः पूरयन्त्यः क्लान्ताः कान्तारसीमन्यहितयुवतयः प्रावृषन्ति स्म यस्य ॥७७॥ अपने बिखरे हुये केशपाशों से नवीन मेघों की छटा दिखलाने वालीं, अपने सोने जैसे चम- चमाते हुये अंगों से सारी दिशाओं में बिजलियाँ चमकाने वालीं और अपने आँसुओं की धाराओं से पर्वतों की नदियों के प्रवाह को पूर्ण करने वालीं तथा जंगलों में घूमने के कारण थक जाने वाली

३. सर्ग ११-२०: काशी प्रवास, धर्म-प्रतिष्ठा, कला-संरक्षण एवं महाकाव्य उपसंहार

१५० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् पारावारान्तरालामवनिमुपगताः केपि वीतप्रचाराः कारागारान्धकारान्तरमपि रिपवः केचिदुद्भ्रान्तदाराः । आराज्ञाराचधारानिपतनचकिताः केचिदाकृष्टसाराः स्फारामाराध्य धारां मधुन इव कृपां यस्य सम्प्राप्तपाराः ॥८०॥ राव सुर्जन के शत्रुओं में से कोई तो दूर समुद्र के बीच के टापुओं में जा बसे ; कोई अपनी स्त्रियों को घबराहट में छोड़ कर कारागार के अन्धकार में, जहाँ स्वेच्छानुकूल भ्रमण संभव नहीं था, रहने लगे ; और बहुत से शत्रु लोग (युद्धस्थल में) अपने समीप निरन्तर बरसती हुई वाणों की धारा से चकित होकर अपना पराक्रम भूल गये तथा राव सुर्जन शहद के समान मधुर और विस्तृत कृपा की धारा की आराधना करके (विपत्ति-समुद्र से) पार हुये ॥८०॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये त्रयोदयः सर्गः

चतुर्दशः सर्गः

जगदुज्ज्वलेन जगमालभूभृता वितरिष्यताऽथ कनकावतीं सुताम् । प्रहितो हितोचितमतिः पुरोहितः परिणेतुरर्जुनसुतस्य सन्निधौ ॥ १ ॥ जगद्विख्यात राजा जगमालने अपनी कुमारी कनकावती का विवाह राव सुर्जन से करने के विषय में शुभचिन्तक बुद्धिमान् पुरोहित को वर के पास भेजा ॥ १ ॥ श्रुतवान् पुरापि कनकावतीगुणान् स्वजनानुरञ्जनकृती नराधिपः । सुचिरं विचार्य सचिवः सबान्धवैर्जननीनिदेशमकरोत् सुमंगलम् ॥ २ ॥ वन्धुवर्ग को आनन्द देने वाले राव सुर्जन ने कनकावती के गुण पहले ही सुन रखे थे; फिर भी मंत्रियों से और बन्धुवर्ग से भलीभाँति परामर्श करके, अपनी माता का मंगलमय आदेश पाकर, सुर्जन ने विवाह के लिये स्वीकृति दे दी ॥ २ ॥ अथ सौम्यमूर्त्तिरतिधीरदुन्दुभिध्वनिनोपहूतपृतनाभिरन्वितः । अचलद् बलाहकवरूथिनीवृतः समयस्तपात्यय इवातिशर्मदः ॥ ३ ॥ तत्पश्चात् सौम्यमूर्ति सुर्जन, अत्यन्त धीर नाद से बजने वाली दुन्दुभियों की ध्वनि से बुलाई गई सेना के साथ, बादलों की सेना से घिरे हुये और गर्मी के बाद अत्यन्त शान्ति देने वाले वर्षा- काल के समान, (जगमाल की राजधानी की ओर) चले ॥ ३ ॥ अधिकत्वरोऽपि मनसा स धीरधीर्जगमालपत्तनविलोकनं प्रति । गमयाञ्चकार कतिचिन्निशीथिनीर्नृपतिर्नृपोचितगतेन वर्त्मनि ॥ ४ ॥ धीरबुद्धि सुर्जन ने, जगमाल की राजधानी को देखने के लिये अत्यन्त उत्सुक होने पर भी, राजोचित गति से चलने के कारण मार्ग में कुछ रातें व्यतीत कीं ॥ ४ ॥ उपशल्यसङ्गतममुञ्च शुश्रुवान् प्रमदेन वंशवहलो जनाधिपः । उपगम्य साधुविहितैः सभाजनैः पुरमानिनाय सहितं पुरोधसा ॥ ५ ॥ बड़े वंश वाले राजा जगमाल ने जब यह सुना कि सुर्जन नगर की सीमा पर आ गये हैं तब वे इष्ट-मित्रों सहित उनका स्वागत करने के लिये पहुँचे और अच्छी तरह उनका आलिंगन, कुशल- प्रश्न आदि से सत्कार करके, पुरोहित के साथ उन्हें नगर में लिवा लाये ॥ ५ ॥ अवधार्य शुद्धमुभयत्र तद्विदो महितं मुहूर्तमथ मेदिनीपतिः । उपचक्रमे रचयितुं क्रमाद्गता दुहितुर्विवाहसमयोचिताः क्रियाः ॥ ६ ॥ राजा जगमाल ने, विद्वान् ज्योतिषी से वर और कन्या उभयपक्ष के लिये शुद्ध शुभ मुहूर्त निकलवा कर, पुत्री के विवाह की कुल-परम्परा के योग्य क्रियायें प्रारंभ कीं ॥ ६ ॥ (५) उपशल्यं ग्रामान्तम् ।

१५२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् रुचिरोत्सवोचितपिशङ्गवाससः पटवासपाटलतरावगुण्ठनाः । इतरेतरार्पितकरावलम्बनाः खदिरोपनीतमधुराऽधरश्रियः ॥ ७॥ प्रमदान्मदादपिदृगम्बुजाञ्चलैः परिहासपेशलतया परस्परम् । अवलोकयन्त्य उदितस्मिताः कलं प्रतिसद्म पद्मदललोचना जगुः ॥ ८॥ विवाहोत्सव के योग्य शुभ और सुन्दर पीले वस्त्र पहनने वालीं, मुख पर लगाये गये सुगन्धित चूर्ण (पाउडर) के संसर्ग से गहरे गुलाबी बने हुये घूँघट वालीं, एक दूसरे के हाथ का सहारा लेने वालीं, पान के कत्थे के कारण लाल और सुन्दर अधरों की शोभा वालीं और कमलों के समान सुन्दर नेत्रों वालीं स्त्रियाँ, अत्यन्त हर्ष से और मद से, उपहास में चंचल होकर और अधरों पर मुस्कुराहट लाकर, अपने कमल-नयनों के कोनों से एक दूसरे को देखती हुईं, घर-घर में सुन्दर गीत गा रहीं थीं ॥ ७-८॥ रघुनाथविक्रमकथोपबृंहितं जनकात्मजापरिणयोचितं क्वचित् । क्वचिदिन्दुशेखरविनोदमञ्जुलं गिरिजाविवाहविधिवर्द्धितस्पृहम् ॥ ९॥ मुरवैरिकौशलविशेषितं क्वचिद् विलसद्विदर्भतनयास्वयम्बरम् । जगुरङ्गनाः प्रतिगृहं सुमङ्गलं ननृतुश्च वारवनिताः प्रमोदतः ॥१०॥ कहीं रामचन्द्र के पराक्रम की कथा से शोभित, कहीं सीता के विवाह के वर्णन से पुनीत, कहीं शिव के विनोद से सुन्दर, कहीं पार्वती के विवाह-वर्णन से मनोरंजक, कहीं कृष्ण के कौशल से युक्त और कहीं दमयन्ती के स्वयंवर की कथा से सुन्दर, मंगलमय गीत स्त्रियाँ घर- घर में गा रही थीं और वेश्यायें प्रसन्न होकर नाच रही थीं ॥ ९-१०॥ कलधौतकुम्भविलसत्पयोधरा कदलीप्रकाण्डरुचिरोरुरञ्जिता । निचिता विचित्रतरया पताकया नगरी व्यराजत यथैकनागरी ॥११॥ सुवर्णकलश रूपी सुन्दर स्तनों वाली, कदली रूपी सुन्दर जंघा से शोभित, विचित्रतर पताका से युक्त वह नगरी भी नगर की प्रमुख रमणी के समान सुशोभित हो रही थी ॥११॥ अथ शङ्खमङ्गलमृदङ्गडिण्डिमध्वनिभिर्विशेषितनिरन्तरत्वराः । शुभगन्धतैलमनिशं हरिद्रया निदधुर्वधूवपुषि सत्पुरन्ध्रयः ॥१२॥ शंख, मृदंग, घंटे आदि की मांगलिक ध्वनि के कारण विशेष रूप से निरन्तर जल्दी करने वालीं कुलीन कुटुम्बिनी स्त्रियाँ प्रति दिन वधू के शरीर पर हल्दी और सुगन्धित तेल लगाती थीं ॥१२॥ अवदातशीतलसुगन्धिपावनैः सलिलैः सुवर्णकलशोद्धृतैरिमाम् । विविधौषधीभिरुपनीतमङ्गलाः स्नपयाम्बभूवुरपि ताः समाहिताः ॥१३॥ स्वर्णकलशों में लाये गये शुचि, शीतल, सुगन्धित और पवित्र जल को विविध औषधियों से मांगलिक बनाकर उससे वे कुलीन कुटुम्बिनी स्त्रियाँ सावधान होकर वधू को स्नान कराती थीं ॥१३॥ (७) पटवासेन पिष्टातेन सुगन्धचूर्णेन पाटलतरं रक्तमवगुण्ठनं यासां ताः ।

२० चतुर्दशः सर्गः १५३ परिधाप्य धौतममलं दुकूलयोर्युगलं मरालमिथुनोपलक्षितम् । अनयन् नितान्तनिपुणा नताननां प्रतिकर्मसद्मनि वधूं पुरन्ध्रयः ॥१४॥ उन अत्यन्त कुशल कुटुम्बिनी स्त्रियों ने (विवाह के दिन तेल लगाकर और स्नान कराकर) वधू को दो धुले हुये निर्मल वस्त्र (लहँगा-ओढ़नी) पहिनाये जिन पर हंस और हंसी का जोड़ा बना हुआ था और फिर वे वधू को, जिसने (लज्जा से) सिर नीचा कर रखा था, शृंगार के कमरे में ले गईं ॥१४॥ अदसीयकुन्तलकदम्बकादधोनिहिताऽगुरुप्रभवधूपधोरणी । अतिकालिमानमपि चारुसौरभं किमतो ग्रहीतुमकरोदुपासनम् ॥१५॥ (शृङ्गारागार में) नीचे रक्खी हुई कालागुरु की (जलती हुई) धूपवत्ती क्या कनकावती के (काले और सुगन्धित) केशपाश से गहरा कालापन और सुन्दर सुगन्ध ग्रहण करने के लिये उपासना कर रही थी ? ॥१५॥ चिकुरेण चामरविशेषचारुणा सितमालया च सुतनुः पताकया । मनसि स्वभर्तुरगमन् मनोभुवः प्रथमाधिकारधृतकेतुयष्टिताम् ॥१६॥ सुन्दर शरीर वाली कनकावती का केशपाश कामदेव का उत्कृष्ट और सुन्दर चँवर था और उसकी शुभ्र माला कामदेव की वैजयन्ती थी; अतः स्वयं कनकावती अपने पति के हृदय में कामदेव के अलंघ्य अधिकार को सूचित करने वाली ध्वज-यष्टि बनकर प्रविष्ट हुई ॥१६॥ स्वत एव हेमशतपत्रसोदरे तदलीकवर्त्तितिलके परिष्कृतम् । हरितालसम्बलिंतरोचनाञ्चितं न विशेषकं रुचिरतां व्यशेषयत् ॥१७॥ कनकावती के ललाट पर सुवर्ण-कमल के पत्ते के समान सुन्दर लाल रंग का स्वाभाविक तिल था, अतः उस तिल के ऊपर लगाया गया हरिताल से मिले हुये गोरोचन का तिलक विशेष शोभा नहीं बढ़ा सका ॥१७॥ प्रकृतिस्थयोरपि तयोर्नेत्रयोर्युगलेन येन विजयी जगत्त्रये । यदधायि तत्र पुनराभिरञ्जनं तदमन्यत स्वमयशो मनोभवः ॥१८॥ कामदेव कनकावती के स्वाभाविक नेत्रों से ही स्वयं को त्रिभुवन-विजयी समझता था, अतः जब उन स्त्रियों ने कनकावती के नेत्रों में काजल लगाया तो कामदेव ने उसे अपना अपयश माना ॥१८॥ निजविभ्रमाभरणयोस्तु तद्भ्रुवोः प्रतिकर्म नान्यदवशिष्यते ध्रुवम् । कुटिलीभवत्यहह यत्र कौतुकात् कुटिलीकरोति न शरासनं स्मरः ॥१९॥ कनकावती की भौंहों के लिये तो उनका विभ्रम ही आभूषण था, अतः उनके लिये किसी अन्य शृङ्गार की निश्चय ही कोई अपेक्षा नहीं थी। उन भौंहों में स्वयं कामदेव ही कुतूहलवश कुटिल बन कर रहता था, अतः उसे अपने धनुष को भी कुटिल करने की कोई आवश्यकता नहीं थी ॥१९॥ (१५) अगुरुजन्यधूपवर्ती । (१७) ललाटस्थतिले ।

१५४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् कलितैकचक्रमतिचक्रधीर्ध्रुवं जनकं जनार्दनमुदीक्ष्य मन्मथः । कनकावतोश्रुतिवतंसचक्रयोर्युगलं दधे तदधिकत्वलब्धये ॥२०॥ प्रखर बुद्धिवाले (जहाँ चक्र काम न दे वहाँ भी इसकी बुद्धि काम देती है) कामदेव (प्रद्युम्न) ने अपने पिता श्रीकृष्ण के पास एक चक्र (सुदर्शन) देखकर उनसे वैशिष्ट्य प्राप्त करने के लिये कनकावती के गोल कर्णाभूषण-रूपी दो चक्र धारण किये ॥२०॥ विनतभ्रुवः श्रवणभूषणच्छलान् मुकुरद्वयं निजमधान् मनोभवः । यदुदीक्षणेन नितरां मुनेरपि द्विगुणो भवेदहह मन्मथभ्रमः ॥२१॥ झुकी हुई भौंहो वाली कनकावती के दोनों कर्णभूषणों के बहाने कामदेव ने अपने दो शीशे रख दिये थे जिनको देखकर जितेन्द्रिय मुनियों के लिये भी कामदेव का भ्रम (भ्रम; विभ्रम) दूना हो जाता था ॥२१॥ अधिनासिकं निहितमच्छमौक्तिकं नितरामशोभत मृगीदृशस्तदा । रदराजिनिर्मलरुचां जिघृक्षया रदनच्छदान्तिकमिवागमत् स्वयम् ॥२२॥ नाक में पहिनी गई नथ का स्वच्छ मोती मृगनयनी कनकावती के स्वच्छ दाँतों की सुन्दर किरणों को ग्रहण करने के लिये स्वयं ही अधर के पास आ गया था ॥२२॥ अधरे कुतूहलवशात् प्रसाधिका बहुधा न्यधत्त नवयावकद्रवम् । सुतनोस्तथापि सहजौऽस्य शोणिमा न मनागपि स्म भजते विशिष्टताम् ।२३। शृङ्गार कराने वाली दासी ने यद्यपि कनकावती के होठों पर काफी यावक (लाख से बनाया गया लाल रंग का पदार्थ) लगाया, किन्तु उससे कनकावती के होठों की स्वाभाविक लाली बढ़ न पाई ॥२३॥ कुचकुम्भसीम्नि मृगनाभिनिर्मिता नितरां रराज मकरी मृगीदृशः । हृदयस्थितस्य मदनस्य केतनं प्रियमभ्युपैतुमिव सम्भृतोद्यमा ॥२४॥ मृगनयनी के पीन स्तनों पर चित्रित कस्तूरी की पत्रमकरी (मगरी की आकृति का चित्र) इस प्रकार अत्यन्त शोभित हो रही थी मानों कनकावती के हृदय में विराजमान कामदेव की ध्वजा में अंकित अपने प्रिय मगर के पास जाने के लिये प्रयास कर रही हो (कामदेव की ध्वजा में मगर का चिह्न बना रहता है, इसीलिये उसे मकरध्वज भी कहते हैं) ॥२४॥ स्तनयोर्मनोरमतनोः सुवृत्तयोरुचितं तथाविधगुणेन सङ्गतम् । असमञ्जसं परममेतदञ्जसा तरलोऽपि यत् कृतपदस्तदन्तरे ॥२५॥ मनोहर शरीरवाली कनकावती के सुवृत्त (गोल; अच्छे चरित्र वाले) स्तनों का गुणवान् (सूत्र में पिरोये गये; गुणी) हार के साथ समागम उचित ही था, किन्तु आश्चर्य इस बात का था कि तरल (हार का बीच में रहने वाला बड़ा मोती; चलचारित्र) ने भी आसानी से ही वहाँ स्थान प्राप्त कर रखा था (गुणी और चरित्रवान् पुरुषों का गुणी पुरुषों से समागम उचित है, किन्तु यदि कोई चंचल और चलचारित्र पुरुष उनके बीच में आसानी से स्थान प्राप्त कर ले तो यह आश्चर्य की बात है ही) ॥२५॥