सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशः सर्गः १३९ असौ विजयराजाख्यं राजा विजयशालिनम् । तनयं जनयामास जनरञ्जनचेष्टितम् ॥ ८ ॥ भीमराज के विजयराज नामक विजयशाली पुत्र उत्पन्न हुये जो प्रजा को प्रसन्न रखने का प्रयत्न किया करते थे ॥ ८ ॥ रयणस्तनयस्तस्य रयनर्तितविक्रमः । स्मयमानोद्धतानेकः स्मयमानोजयत् परान् ॥ ९ ॥ उनके रयण नामक पुत्र हुये जो अपने वेग से पराक्रम को नचाया करते थे और जो अकेले ही, गर्व और अभिमान से उद्धत शत्रुओं को हँसते हुये जीत लेते थे ॥ ९ ॥ तस्मान् महार्घनिःसीमगुणरत्नमहोदधेः । कोह्लणः कुलकल्हारकलानिधिरजायत ॥१०॥ उन बहुमूल्य और असीम गुणरत्नों के समुद्र रयण के कोह्लण नामक पुत्र हुये जो अपने कुल- कुमुद के लिये चन्द्रमा के समान थे ॥१०॥ विनीतो नीतिशास्त्रेषु विनीतोल्बणदूषणः । स्वनये सोऽभवत् ख्यातः स्वनयेऽस्य यथारिपुः ॥११॥ वे नीतिशास्त्रों में निष्णात थे और उन्होंने उग्र दोषों को दूर कर रक्खा था। जिस प्रकार उनके शत्रु अपनी अनीति में कुख्यात थे उसी प्रकार वे अपनी नीति में विख्यात थे ॥११॥ गङ्गदेवोऽभवत् तस्माद् भुवं गोपायति स्म यः । भ्रूभङ्गोद्धतदृक्पातः क्लृप्तभङ्गो विरोधिनाम् ॥१२॥ उन कोह्लण के गंगदेव उत्पन्न हुये जिन्होंने अपनी भृकुटी के क्रुद्ध कटाक्ष से शत्रुओं को नष्ट करके पृथ्वी पर शासन किया ॥१२॥ देवसिंहः सुतोऽस्यासीद् देवोपमपराक्रमः । नरदेवो नृणामिन्दुः शरदेवोपरञ्जितः ॥१३॥ गंगदेव के देवसिंह नामक पुत्र हुये जो देवता के समान पराक्रमी थे। वे नरदेव लोगों को शरद् ऋतु से शोभित पूर्ण चन्द्र के समान (सुन्दर और शीतल) प्रतीत होते थे ॥१३॥ तस्मात् समरसिंहोऽभूद् यथार्थामभिधां दधत् । कीर्तिहंसीमुखे यस्य विपच्छैवालमञ्जरी ॥१४॥ देवसिंह के समरसिंह नामक यथार्थनामा पुत्र हुये क्योंकि वे समर में वास्तव में सिंह के समान पराक्रमी थे। विपत्ति रूपी शैवालमंजरी उनकी कीर्ति-रूपी हंसी के मुख में रहती थी अर्थात् वे विपत्ति नष्ट करने में विख्यात थे ॥१४॥ नरपालमयं नाम्ना पुत्रं प्राप प्रतिष्ठितम् । नापोहति स्म यं लक्ष्मीनरपालक्रमा गता ॥ १५॥ समरसिंह के नरपाल (नापाजी) नामक प्रतिष्ठित पुत्र उत्पन्न हुये जिनको राजपरम्परा- गत लक्ष्मी ने कभी नहीं छोड़ा ॥१५॥