भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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१४० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् हम्मीरस्तनयस्तस्य समीरणसखप्रभः । अजनिष्ट प्रतापेन जनिताऽनिष्टकृज्ज्वरः ॥११६॥ उनके हम्मीर (हामा जी) नामक अग्नि के समान तेजस्वी पुत्र हुये जिनके प्रताप के कारण शत्रुओं को ज्वर आ जाता था ॥११६॥ वरसिंहः सुतस्तस्य वरसिंहपराक्रमः । अभीरोषाञ्चकारारीन् वैरोपहितवैशसैः ॥११७॥ उनके वरसिंह नामक श्रेष्ठ सिंह (नरसिंह) के समान पराक्रमी पुत्र हुये जिन्होंने निर्भय होकर शत्रुता के कारण प्रवृद्ध क्रोधाग्नि से शत्रुओं को जला दिया॥ ११७॥ भारमल्लोऽभवत् तस्माद् भारमग्र्यं दधद् भुवः । स भारोचितदिग्वीरसभारोहणविश्रुतः ॥११८॥ उनसे भारमल्ल उत्पन्न हुये जो (अपने बलिष्ठ कंधों पर) पृथ्वी का भारी भार उठाते थे और प्रभायुक्त दिग्वीरों की सभा के स्वामी होने के कारण विख्यात थे ॥११८॥ तस्मान् नर्मदनामाऽभून् नृपधर्मधुरन्धरः । मर्मस्पृक् समरेऽरीणां शरैर्वर्मभृतामपि ॥११९॥ उनके राज-धर्म के पारंगत नर्मद नामक पुत्र हुये जो युद्ध में कवचधारी शत्रुओं के मर्मस्थलों को भी अपने बाणों से भेद देते थे ॥११९॥ तीक्ष्णकौशेयकस्तस्य वैरिवामदृशां दृशाम् । धारामश्रुमयीं दत्त्वा कज्जलश्रियमाददे ॥१२०॥ उनकी तेज (काली) तलवार शत्रुस्त्रियों के नेत्रों को आँसुओं की धारा देकर उनसे कज्जल की कालिमा ग्रहण कर लेती थी ॥१२०॥ धर्मपत्नी बभूवाऽस्य धारानाम्नी धरापतेः । अनतिक्रान्तमर्यादा यथा धारा महोदधेः ॥१२१॥ नर्मद राजा के धारा नामक धर्मपत्नी थीं जिन्होंने समुद्र की धारा के समान कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया ॥१२१॥ नर्मदस्य महीभर्तुर्महिषी तनुमध्यमा । उचितं नर्मदा साऽपि महावंशभवा यतः ॥१२२॥ नर्मद राजा की सुमध्यमा और अच्छे कुल में उत्पन्न रानी भी वास्तव में नर्मदा (आनन्द देने वाली) थीं । (रानी महान् वंश में उत्पन्न थीं और नर्मदा नदी के तट पर बड़े-बड़े बाँस उत्पन्न होते हैं) ॥१२२॥


(१७) अभीः निर्भयः । ओषाञ्चकार ददाह । वैशसं क्रोधः ।