सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशः सर्गः १४१ सुतमर्जुननामानं नृपस्तस्यामजीजनत् । शुद्धं स्वातीभवो बिन्दुः शुक्तौ मुक्ताफलं यथा ॥२३॥ नर्माद राजा न रानी धारा में अर्जुन नामक पुत्र को जन्म दिया, जैसे स्वाति नक्षत्र का जल- बिन्दु सीप में शुद्ध मोती को जन्म देता है ॥२३॥ कर्णमूर्जितसत्त्वेन जितवन्तममुं जनाः । विजयाभिख्यया दीप्तमर्जुनं साधु मेनिरे ॥२४॥ उत्कृष्ट पराक्रम के कारण कर्ण को जीतने वाले और विजय की शोभा से दीप्त अर्जुन को लोग वास्तव में कर्णविजयी 'विजय' नामक कुन्तीपुत्र अर्जुन ही मानते थे ॥२४॥ सञ्चरन् समराग्रेशु भीमसेनानुगोऽर्जुनः । पश्चाच्चकार नकुलं वाजिशिक्षाविशारदम् ॥२५॥ युद्धभूमि में भीमसेन के पीछे और नकुल के आगे चलने वाले अर्जुन के समान, राजा अर्जुन के आगे भीषण सेना चलती थी और पीछे अश्वविद्याविशारद चलते थे ॥२५॥ क्रमेणाक्रान्तभुवना द्विजेशोपरि