भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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पृष्ठ 168, कुल 256 में से

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१४२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् आननेनाऽथ निन्दन्ती शारदीनं निशाकरम् । अलकान्तेन कान्तेन क्लेशयन्त्यलिसन्ततिम् ॥३०॥ नेत्रश्रीतर्जिताऽनेकद्राधीयःकेतकीदला । रदनच्छदरागेण रञ्जयन्ती रदान् सितान् ॥३१॥ अनीचस्तनसत्कान्त्या हसन्ती करिणां कटान् । नयन्ती कदलीकाण्डं जघनेन जघन्यताम् ॥३२॥ सरागचरणन्यासहसितस्थलसारसा । जैत्री शक्तिरनङ्गस्य सा चकाशे शरीरिणी ॥३३॥ जयन्ती अपने सुन्दर मुख से शरद्-ऋतु के चन्द्रमा को तिरस्कृत करती थी, अपने सुन्दर बालों से भ्रमरों की पंक्ति को (पराजय की) पीड़ा देती थी, अपने नेत्रों की शोभा से घने और लम्बे पत्तों वाली केतकी को दूर भगाती थी, अपने अधर की लालिमा से शुभ्र दाँतों को भी रक्त बना देती थी, उन्नत स्तनों की सुन्दर कान्ति से हाथियों के गण्डस्थलों का उपहास करती थी, अपनी जंघा की शोभा से केले के स्कन्ध को हेय समझती थी और अपने रंजित चरणों की कलापूर्ण चाल से, भूमि पर चलने वाले सारस पक्षियों का उपहास करती थी ; वह कामदेव की मूर्तिमती विजयशक्ति के समान शोभित होती थी ॥३०-३३॥ स तस्यां वंशधौरेयं सुतमिच्छन् सतां प्रियम् । प्राप पुण्यं सरः शौरेः पदाम्बुजमुपासितुम् ॥३४॥ राजा अर्जुन जयन्ती में वंशवाही और सज्जनों के प्रिय पुत्र प्राप्त करने की इच्छा से भग- वान् विष्णु के पद-कमलों की सेवा करने के लिये किसी पुण्य सरोवर के समीप गये ॥३४॥ संसारसारसरसों स संसार संसारसाम् । सरसः सुरसासाररसासिसुसारसाम् ॥३५॥ वे संसार के सार (जल) से सरस, तथा सुन्दर कमलों (सारस) से शोभित, एवं सरोवर के (सरसः) सुन्दर जल के (सुरसंस्य) बरसते हुये (आसारैः) विन्दुओं से (रसैः) चारों ओर (आ) नाचने वाले (रासिनः) सुन्दर हंसों से युक्त (सुसारसां) सरोवर के पास पहुँचे (ससार) ॥३५॥ अपोढकपटावेशैस्तपोभिः पृथिवीभुजा । नित्यमाराधयाञ्चक्रे पादपद्मं परात्मनः ॥३६॥ निष्कपट तप से राजा अर्जुन ने नित्य भगवान् के चरण-कमलों की आराधना की ॥३६॥ परापरपरेऽपारपापपूररिपौ पुरः । पुपूरेऽपि रमारामे परा प्रेमपरम्परा ॥३७॥ पर (कारण) और अपर (कार्य) दोनों के पारगामी (पर) तथा अपार पापों के समूह (पूर) के शत्रु (रिपु) लक्ष्मीपति (रमाराम) भगवान् विष्णु में राजा की प्रेमपरम्परा पूर्णता को प्राप्त हुई (पुपूरे) ॥३७॥ (३५) ससारसां कमलैः शोभिताम् । सरसः सरोवरस्य सुरसस्य सुन्दरजलस्य आसारैः वर्षद्भिारिव रसैः आ समन्तात् रासिनः क्रीडन्तः सुसारसाः शोभनाः हंसाः यस्यास्ताम् । (३७) परापराभ्यां कार्यकारणाभ्यां परे विचित्रे अतीते इत्यर्थः । अपाराणां पापानां पूरस्य समूहस्य रिपौ निवर्तके । रमारामे लक्ष्मीपतौ । पुपूरे पूर्णतां गता ।

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक) · पृष्ठ 168, कुल 256 में से · BharatKosha