सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशः सर्गः पूर्वो हम्मीरदेवस्य सप्तमः शत्रुमर्दनः । शहाबुद्दीनमान्धोऽपि कुण्ठबाणेन योऽवधीत् ॥ १ ॥ पृथ्वीराजस्य तस्यैव समो भ्राता जयत्यजः । माणिक्यराजो मतिमानंशेन बुभुजे महीम् ॥ २ ॥ हम्मीरदेव के शत्रु को रौंदने वाले सातवें पूर्वज पृथ्वीराज के, जिन्होंने अन्धे होने पर भी कुण्ठित बाण से शहाबुद्दीन को मार दिया था, छोटे भाई बुद्धिमान् माणिक्यराज, जो अपने भाई के समान थे, अपने भाग की पृथ्वी पर शासन करते रहे ॥१-२॥ सदाऽरुणदरात्तीनां स दारुणधियां पुरम् । तमाऽऽहितधियः साधु तमाराहितकरं विदुः ॥ ३ ॥ माणिक्यराज दारुण बुद्धिवाले शत्रुओं के नगरों को सदा नष्ट-भ्रष्ट करते रहे। बुद्धिमान् लोग उनको अन्धकार को नष्ट करने वाले सूर्य के समान अथवा राहु के शत्रु भगवान् विष्णु के समान मानते थे ॥ ३ ॥ नित्यमाश्रित्य नृत्यन्ती सद्वंशालम्बिनो गुणान् । खेलति स्म निरालम्बे रङ्गे यत्कीर्तिनर्तकी ॥ ४ ॥ उत्तम वंश में उत्पन्न राजा माणिक्यराज के गुणों का आश्रय लेकर नाचती हुई उनकी कीर्ति रूपी नर्तकी आकाश में खेल किया करती थी, जैसे उत्तम बाँस में बाँधे हुये रस्सों का सहारा लेकर नाचती हुई नटी आकाश में अपने खेल दिखाया करती है ॥ ४ ॥ चक्रे न पात्रमालिन्यं पतङ्गे मित्रतामधात् । अतः प्रतापदीपोऽस्य जगदुत्तरतां गतः ॥ ५ ॥ (दीपक अपने पात्र को मलिन बना देता है और सूर्य से उसकी शत्रुता है क्योंकि सूर्योदय होते ही वह बुझ जाता है, किन्तु) माणिक्यराज का प्रताप-रूपी दीपक अलौकिक है क्योंकि वह कभी पात्रमालिन्य नहीं करता (अर्थात् सुपात्र पुरुषों के हृदयों को कभी मलिन नहीं करता) और सूर्य से उसकी मित्रता है (अर्थात् वह सूर्य के समान तेजस्वी है) ॥ ५ ॥ चण्डराजस्तनूजोऽस्य चण्डभानुसमप्रभः । चण्डराजकपद्मानांमचण्डकिरणोऽभवत् ॥ ६ ॥ माणिक्यराज के प्रचण्ड सूर्य के समान तेजस्वी चण्डराज नामक पुत्र हुये जो शत्रुराजाओं रूपी कमलों के लिये अचण्डकिरण चन्द्रमा के समान थे (जैसे चन्द्रोदय के समय कमल मुकुलित हो जाते हैं वैसे ही इनको देखकर शत्रु मुरझा जाते थे) ॥ ६ ॥ स पुत्रं भीमविक्रान्तं भीमराजमजीजनत् । भीमसेनसमः स्थाम्ना भीमसेनासमृद्धिमान् ॥ ७ ॥ उनके भयंकर पराक्रमी भीमराज नामक पुत्र हुये जो भीमसेन के समान पुष्ट थे और बल- वती सेना की समृद्धि से युक्त थे ॥ ७ ॥