सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 163, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ द्वादशः सर्गः १३७ नालक्ष्यन्त क्षिप्रकर्तुः पृषत्काश्छिन्दन्तस्ते वातवेगा अरातीन् । उन्नीयन्ते पात्यमानैः शरीरैः स्फारां धारां रौधिरीमुद्वमद्भिः ॥७३॥ अत्यन्त शीघ्रता से बाण चलाने वाले हम्मीरदेव के वायु के समान गतिशील बाण शत्रुओं को काटते हुये दिखाई नहीं देते थे ; रक्त की विस्तृत धारा को उगलने वाले गिरते हुए शरीरों द्वारा उन बाणों का अनुमान किया जाता था ॥७३॥ म्लेच्छाधीशोऽप्यस्य मूर्च्छत्प्रतापः पत्रिव्रातैरातुदत् कुञ्जरेन्द्रान् । तैरत्यर्थं मर्मविद्धोऽपि युद्धे तस्थौ पक्षे रोद्धुराधोरणस्य ॥७४॥ म्लेच्छपति अलाउद्दीन भी हम्मीरदेव के बाण-समूहों के कारण मूर्छित प्रताप वाला बन गया और उसने अपने हाथियों को हम्मीर की सेना पर आक्रमण के लिये प्रेरित किया । किन्तु जब वह स्वयं हम्मीर के बाणों से युद्ध में मर्मविद्ध होने लगा तो उसे आक्रमण रोकने वाले महावत के पीछे छिपना पड़ा ॥७४॥ विश्राम्यन्ती तत्र शुभ्रातपत्रच्छायासीना स्वैरमेवोभयत्र । भूयो भूयो भूभृतोः सञ्चरन्ती पार्श्वं प्रापन्नैव खेदं जयश्रीः ॥७५॥ युद्धस्थल में, वीर हम्मीरदेव और अलाउद्दीन इन दोनों राजाओं के शुभ्र छत्रों की छाया में यथेच्छ बैठने वाली विजय-लक्ष्मी कभी हम्मीरदेव के और कभी अलाउद्दीन के पास जाती हुई खिन्न नहीं होती थी ॥७५॥ नागात् तस्मात् पतितात् यावदन्यं नागाद् वेगाद् वाहनं चाहुवाणः । तावद् भिन्दन् भिन्दिपालेन वक्षश्चिक्षेपैनं वीरतल्पे विपक्षः ॥७६॥ अपने मारे गये हाथी को छोड़कर ज्यों ही हम्मीरदेव चौहान दूसरे हाथी पर चढ़ने लगे उसी समय शत्रु ने भिन्दिपाल (बन्दूक ?) नामक शस्त्र से उनका वक्षःस्थल भेद कर उन्हें वीर-शय्या पर सुला दिया ॥७६॥ सुचिरमथविपक्षक्षोणिपानीकिनीनां क्षतजमयनदीभिः क्षोणिमाप्लाव्य कृत्स्नाम् । तनुमनुपमरूपां स्थेयसीं कीर्तिरूपामविशदसमतेजा वीरहम्मीरदेवः ॥७७॥ इस प्रकार सम्पूर्ण युद्धभूमि को बहुत देर तक शत्रु राजा की सेनाओं के घावों से बहने वाली रुधिर की नदियों से पाट कर, अद्वितीय तेजस्वी वीर हम्मीरदेव ने (अपने क्षणभंगुर पार्थिव शरीर को छोड़कर) अनुपम शोभायुक्त चिरस्थायी यशःशरीर में प्रवेश किया ॥७७॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये द्वादशः सर्गः (७६) भिन्दिपालः प्रायेण 'गुलेल' इति ख्यातः परन्तु नालिकास्त्रेऽपि अस्य शब्दस्य प्रयोगो दृश्यते । अत्र तु औचित्यवशात् नालिकास्त्रं 'बन्दूक' इति ख्यातमेव प्रतीयते ।