सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् पारावारान्तरालामवनिमुपगताः केपि वीतप्रचाराः कारागारान्धकारान्तरमपि रिपवः केचिदुद्भ्रान्तदाराः । आराज्ञाराचधारानिपतनचकिताः केचिदाकृष्टसाराः स्फारामाराध्य धारां मधुन इव कृपां यस्य सम्प्राप्तपाराः ॥८०॥ राव सुर्जन के शत्रुओं में से कोई तो दूर समुद्र के बीच के टापुओं में जा बसे ; कोई अपनी स्त्रियों को घबराहट में छोड़ कर कारागार के अन्धकार में, जहाँ स्वेच्छानुकूल भ्रमण संभव नहीं था, रहने लगे ; और बहुत से शत्रु लोग (युद्धस्थल में) अपने समीप निरन्तर बरसती हुई वाणों की धारा से चकित होकर अपना पराक्रम भूल गये तथा राव सुर्जन शहद के समान मधुर और विस्तृत कृपा की धारा की आराधना करके (विपत्ति-समुद्र से) पार हुये ॥८०॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये त्रयोदयः सर्गः