भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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चतुर्दशः सर्गः

जगदुज्ज्वलेन जगमालभूभृता वितरिष्यताऽथ कनकावतीं सुताम् । प्रहितो हितोचितमतिः पुरोहितः परिणेतुरर्जुनसुतस्य सन्निधौ ॥ १ ॥ जगद्विख्यात राजा जगमालने अपनी कुमारी कनकावती का विवाह राव सुर्जन से करने के विषय में शुभचिन्तक बुद्धिमान् पुरोहित को वर के पास भेजा ॥ १ ॥ श्रुतवान् पुरापि कनकावतीगुणान् स्वजनानुरञ्जनकृती नराधिपः । सुचिरं विचार्य सचिवः सबान्धवैर्जननीनिदेशमकरोत् सुमंगलम् ॥ २ ॥ वन्धुवर्ग को आनन्द देने वाले राव सुर्जन ने कनकावती के गुण पहले ही सुन रखे थे; फिर भी मंत्रियों से और बन्धुवर्ग से भलीभाँति परामर्श करके, अपनी माता का मंगलमय आदेश पाकर, सुर्जन ने विवाह के लिये स्वीकृति दे दी ॥ २ ॥ अथ सौम्यमूर्त्तिरतिधीरदुन्दुभिध्वनिनोपहूतपृतनाभिरन्वितः । अचलद् बलाहकवरूथिनीवृतः समयस्तपात्यय इवातिशर्मदः ॥ ३ ॥ तत्पश्चात् सौम्यमूर्ति सुर्जन, अत्यन्त धीर नाद से बजने वाली दुन्दुभियों की ध्वनि से बुलाई गई सेना के साथ, बादलों की सेना से घिरे हुये और गर्मी के बाद अत्यन्त शान्ति देने वाले वर्षा- काल के समान, (जगमाल की राजधानी की ओर) चले ॥ ३ ॥ अधिकत्वरोऽपि मनसा स धीरधीर्जगमालपत्तनविलोकनं प्रति । गमयाञ्चकार कतिचिन्निशीथिनीर्नृपतिर्नृपोचितगतेन वर्त्मनि ॥ ४ ॥ धीरबुद्धि सुर्जन ने, जगमाल की राजधानी को देखने के लिये अत्यन्त उत्सुक होने पर भी, राजोचित गति से चलने के कारण मार्ग में कुछ रातें व्यतीत कीं ॥ ४ ॥ उपशल्यसङ्गतममुञ्च शुश्रुवान् प्रमदेन वंशवहलो जनाधिपः । उपगम्य साधुविहितैः सभाजनैः पुरमानिनाय सहितं पुरोधसा ॥ ५ ॥ बड़े वंश वाले राजा जगमाल ने जब यह सुना कि सुर्जन नगर की सीमा पर आ गये हैं तब वे इष्ट-मित्रों सहित उनका स्वागत करने के लिये पहुँचे और अच्छी तरह उनका आलिंगन, कुशल- प्रश्न आदि से सत्कार करके, पुरोहित के साथ उन्हें नगर में लिवा लाये ॥ ५ ॥ अवधार्य शुद्धमुभयत्र तद्विदो महितं मुहूर्तमथ मेदिनीपतिः । उपचक्रमे रचयितुं क्रमाद्गता दुहितुर्विवाहसमयोचिताः क्रियाः ॥ ६ ॥ राजा जगमाल ने, विद्वान् ज्योतिषी से वर और कन्या उभयपक्ष के लिये शुद्ध शुभ मुहूर्त निकलवा कर, पुत्री के विवाह की कुल-परम्परा के योग्य क्रियायें प्रारंभ कीं ॥ ६ ॥ (५) उपशल्यं ग्रामान्तम् ।