भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 178

१५२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् रुचिरोत्सवोचितपिशङ्गवाससः पटवासपाटलतरावगुण्ठनाः । इतरेतरार्पितकरावलम्बनाः खदिरोपनीतमधुराऽधरश्रियः ॥ ७॥ प्रमदान्मदादपिदृगम्बुजाञ्चलैः परिहासपेशलतया परस्परम् । अवलोकयन्त्य उदितस्मिताः कलं प्रतिसद्म पद्मदललोचना जगुः ॥ ८॥ विवाहोत्सव के योग्य शुभ और सुन्दर पीले वस्त्र पहनने वालीं, मुख पर लगाये गये सुगन्धित चूर्ण (पाउडर) के संसर्ग से गहरे गुलाबी बने हुये घूँघट वालीं, एक दूसरे के हाथ का सहारा लेने वालीं, पान के कत्थे के कारण लाल और सुन्दर अधरों की शोभा वालीं और कमलों के समान सुन्दर नेत्रों वालीं स्त्रियाँ, अत्यन्त हर्ष से और मद से, उपहास में चंचल होकर और अधरों पर मुस्कुराहट लाकर, अपने कमल-नयनों के कोनों से एक दूसरे को देखती हुईं, घर-घर में सुन्दर गीत गा रहीं थीं ॥ ७-८॥ रघुनाथविक्रमकथोपबृंहितं जनकात्मजापरिणयोचितं क्वचित् । क्वचिदिन्दुशेखरविनोदमञ्जुलं गिरिजाविवाहविधिवर्द्धितस्पृहम् ॥ ९॥ मुरवैरिकौशलविशेषितं क्वचिद् विलसद्विदर्भतनयास्वयम्बरम् । जगुरङ्गनाः प्रतिगृहं सुमङ्गलं ननृतुश्च वारवनिताः प्रमोदतः ॥१०॥ कहीं रामचन्द्र के पराक्रम की कथा से शोभित, कहीं सीता के विवाह के वर्णन से पुनीत, कहीं शिव के विनोद से सुन्दर, कहीं पार्वती के विवाह-वर्णन से मनोरंजक, कहीं कृष्ण के कौशल से युक्त और कहीं दमयन्ती के स्वयंवर की कथा से सुन्दर, मंगलमय गीत स्त्रियाँ घर- घर में गा रही थीं और वेश्यायें प्रसन्न होकर नाच रही थीं ॥ ९-१०॥ कलधौतकुम्भविलसत्पयोधरा कदलीप्रकाण्डरुचिरोरुरञ्जिता । निचिता विचित्रतरया पताकया नगरी व्यराजत यथैकनागरी ॥११॥ सुवर्णकलश रूपी सुन्दर स्तनों वाली, कदली रूपी सुन्दर जंघा से शोभित, विचित्रतर पताका से युक्त वह नगरी भी नगर की प्रमुख रमणी के समान सुशोभित हो रही थी ॥११॥ अथ शङ्खमङ्गलमृदङ्गडिण्डिमध्वनिभिर्विशेषितनिरन्तरत्वराः । शुभगन्धतैलमनिशं हरिद्रया निदधुर्वधूवपुषि सत्पुरन्ध्रयः ॥१२॥ शंख, मृदंग, घंटे आदि की मांगलिक ध्वनि के कारण विशेष रूप से निरन्तर जल्दी करने वालीं कुलीन कुटुम्बिनी स्त्रियाँ प्रति दिन वधू के शरीर पर हल्दी और सुगन्धित तेल लगाती थीं ॥१२॥ अवदातशीतलसुगन्धिपावनैः सलिलैः सुवर्णकलशोद्धृतैरिमाम् । विविधौषधीभिरुपनीतमङ्गलाः स्नपयाम्बभूवुरपि ताः समाहिताः ॥१३॥ स्वर्णकलशों में लाये गये शुचि, शीतल, सुगन्धित और पवित्र जल को विविध औषधियों से मांगलिक बनाकर उससे वे कुलीन कुटुम्बिनी स्त्रियाँ सावधान होकर वधू को स्नान कराती थीं ॥१३॥ (७) पटवासेन पिष्टातेन सुगन्धचूर्णेन पाटलतरं रक्तमवगुण्ठनं यासां ताः ।