भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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२० चतुर्दशः सर्गः १५३ परिधाप्य धौतममलं दुकूलयोर्युगलं मरालमिथुनोपलक्षितम् । अनयन् नितान्तनिपुणा नताननां प्रतिकर्मसद्मनि वधूं पुरन्ध्रयः ॥१४॥ उन अत्यन्त कुशल कुटुम्बिनी स्त्रियों ने (विवाह के दिन तेल लगाकर और स्नान कराकर) वधू को दो धुले हुये निर्मल वस्त्र (लहँगा-ओढ़नी) पहिनाये जिन पर हंस और हंसी का जोड़ा बना हुआ था और फिर वे वधू को, जिसने (लज्जा से) सिर नीचा कर रखा था, शृंगार के कमरे में ले गईं ॥१४॥ अदसीयकुन्तलकदम्बकादधोनिहिताऽगुरुप्रभवधूपधोरणी । अतिकालिमानमपि चारुसौरभं किमतो ग्रहीतुमकरोदुपासनम् ॥१५॥ (शृङ्गारागार में) नीचे रक्खी हुई कालागुरु की (जलती हुई) धूपवत्ती क्या कनकावती के (काले और सुगन्धित) केशपाश से गहरा कालापन और सुन्दर सुगन्ध ग्रहण करने के लिये उपासना कर रही थी ? ॥१५॥ चिकुरेण चामरविशेषचारुणा सितमालया च सुतनुः पताकया । मनसि स्वभर्तुरगमन् मनोभुवः प्रथमाधिकारधृतकेतुयष्टिताम् ॥१६॥ सुन्दर शरीर वाली कनकावती का केशपाश कामदेव का उत्कृष्ट और सुन्दर चँवर था और उसकी शुभ्र माला कामदेव की वैजयन्ती थी; अतः स्वयं कनकावती अपने पति के हृदय में कामदेव के अलंघ्य अधिकार को सूचित करने वाली ध्वज-यष्टि बनकर प्रविष्ट हुई ॥१६॥ स्वत एव हेमशतपत्रसोदरे तदलीकवर्त्तितिलके परिष्कृतम् । हरितालसम्बलिंतरोचनाञ्चितं न विशेषकं रुचिरतां व्यशेषयत् ॥१७॥ कनकावती के ललाट पर सुवर्ण-कमल के पत्ते के समान सुन्दर लाल रंग का स्वाभाविक तिल था, अतः उस तिल के ऊपर लगाया गया हरिताल से मिले हुये गोरोचन का तिलक विशेष शोभा नहीं बढ़ा सका ॥१७॥ प्रकृतिस्थयोरपि तयोर्नेत्रयोर्युगलेन येन विजयी जगत्त्रये । यदधायि तत्र पुनराभिरञ्जनं तदमन्यत स्वमयशो मनोभवः ॥१८॥ कामदेव कनकावती के स्वाभाविक नेत्रों से ही स्वयं को त्रिभुवन-विजयी समझता था, अतः जब उन स्त्रियों ने कनकावती के नेत्रों में काजल लगाया तो कामदेव ने उसे अपना अपयश माना ॥१८॥ निजविभ्रमाभरणयोस्तु तद्भ्रुवोः प्रतिकर्म नान्यदवशिष्यते ध्रुवम् । कुटिलीभवत्यहह यत्र कौतुकात् कुटिलीकरोति न शरासनं स्मरः ॥१९॥ कनकावती की भौंहों के लिये तो उनका विभ्रम ही आभूषण था, अतः उनके लिये किसी अन्य शृङ्गार की निश्चय ही कोई अपेक्षा नहीं थी। उन भौंहों में स्वयं कामदेव ही कुतूहलवश कुटिल बन कर रहता था, अतः उसे अपने धनुष को भी कुटिल करने की कोई आवश्यकता नहीं थी ॥१९॥ (१५) अगुरुजन्यधूपवर्ती । (१७) ललाटस्थतिले ।