भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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१५४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् कलितैकचक्रमतिचक्रधीर्ध्रुवं जनकं जनार्दनमुदीक्ष्य मन्मथः । कनकावतोश्रुतिवतंसचक्रयोर्युगलं दधे तदधिकत्वलब्धये ॥२०॥ प्रखर बुद्धिवाले (जहाँ चक्र काम न दे वहाँ भी इसकी बुद्धि काम देती है) कामदेव (प्रद्युम्न) ने अपने पिता श्रीकृष्ण के पास एक चक्र (सुदर्शन) देखकर उनसे वैशिष्ट्य प्राप्त करने के लिये कनकावती के गोल कर्णाभूषण-रूपी दो चक्र धारण किये ॥२०॥ विनतभ्रुवः श्रवणभूषणच्छलान् मुकुरद्वयं निजमधान् मनोभवः । यदुदीक्षणेन नितरां मुनेरपि द्विगुणो भवेदहह मन्मथभ्रमः ॥२१॥ झुकी हुई भौंहो वाली कनकावती के दोनों कर्णभूषणों के बहाने कामदेव ने अपने दो शीशे रख दिये थे जिनको देखकर जितेन्द्रिय मुनियों के लिये भी कामदेव का भ्रम (भ्रम; विभ्रम) दूना हो जाता था ॥२१॥ अधिनासिकं निहितमच्छमौक्तिकं नितरामशोभत मृगीदृशस्तदा । रदराजिनिर्मलरुचां जिघृक्षया रदनच्छदान्तिकमिवागमत् स्वयम् ॥२२॥ नाक में पहिनी गई नथ का स्वच्छ मोती मृगनयनी कनकावती के स्वच्छ दाँतों की सुन्दर किरणों को ग्रहण करने के लिये स्वयं ही अधर के पास आ गया था ॥२२॥ अधरे कुतूहलवशात् प्रसाधिका बहुधा न्यधत्त नवयावकद्रवम् । सुतनोस्तथापि सहजौऽस्य शोणिमा न मनागपि स्म भजते विशिष्टताम् ।२३। शृङ्गार कराने वाली दासी ने यद्यपि कनकावती के होठों पर काफी यावक (लाख से बनाया गया लाल रंग का पदार्थ) लगाया, किन्तु उससे कनकावती के होठों की स्वाभाविक लाली बढ़ न पाई ॥२३॥ कुचकुम्भसीम्नि मृगनाभिनिर्मिता नितरां रराज मकरी मृगीदृशः । हृदयस्थितस्य मदनस्य केतनं प्रियमभ्युपैतुमिव सम्भृतोद्यमा ॥२४॥ मृगनयनी के पीन स्तनों पर चित्रित कस्तूरी की पत्रमकरी (मगरी की आकृति का चित्र) इस प्रकार अत्यन्त शोभित हो रही थी मानों कनकावती के हृदय में विराजमान कामदेव की ध्वजा में अंकित अपने प्रिय मगर के पास जाने के लिये प्रयास कर रही हो (कामदेव की ध्वजा में मगर का चिह्न बना रहता है, इसीलिये उसे मकरध्वज भी कहते हैं) ॥२४॥ स्तनयोर्मनोरमतनोः सुवृत्तयोरुचितं तथाविधगुणेन सङ्गतम् । असमञ्जसं परममेतदञ्जसा तरलोऽपि यत् कृतपदस्तदन्तरे ॥२५॥ मनोहर शरीरवाली कनकावती के सुवृत्त (गोल; अच्छे चरित्र वाले) स्तनों का गुणवान् (सूत्र में पिरोये गये; गुणी) हार के साथ समागम उचित ही था, किन्तु आश्चर्य इस बात का था कि तरल (हार का बीच में रहने वाला बड़ा मोती; चलचारित्र) ने भी आसानी से ही वहाँ स्थान प्राप्त कर रखा था (गुणी और चरित्रवान् पुरुषों का गुणी पुरुषों से समागम उचित है, किन्तु यदि कोई चंचल और चलचारित्र पुरुष उनके बीच में आसानी से स्थान प्राप्त कर ले तो यह आश्चर्य की बात है ही) ॥२५॥