भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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चतुर्दशः सर्गः १५५ रशनागुणेन सुतनोः सखीजनः किम योजयज्जघनमण्डलं पुनः । वसता हि तत्र सततं मनोभुवा स्वधनुर्गुणेन सगुणीकृतं यतः ॥२६॥ सखियों ने कनकावती के जघन को करधनी के गुण से सजाने का प्रयत्न क्यों किया ? वहाँ निरन्तर रहने वाले कामदेव ने पहले ही उस जघन को अपने धनुष की प्रत्यंचा से सगुण (प्रत्यंचा- युक्त ; गुणवान्) बना रखा था ॥२६॥ नवपत्रपाटलमलक्तकद्रवैर्विरराज राजदुहितुः पदद्वयम् । युगलं सुजातसरसीरुहोर्यथा किरणैर्नवোদিতमयूखमालिनः ॥२७॥ उस राजकुमारी के मेंहदी से रंगे हुये गुलाब की नवीन पंखुड़ियों के समान लाल पैर नवो- दित सूर्य की किरणों से रञ्जित लाल कमलों के समान शोभित हो रहे थे ॥२७॥ इति सज्जिता जितमनोजकामिनीतनुकान्तिरन्तिकनिवेशितं पुरः । निभृतं निरीक्ष्य मुकुरं चचाल सा घटिकानिवेदकनिनादनोदिता ॥२८॥ इस प्रकार सजी हुई कनकावती कामदेव की प्रिया रति के शरीरसौन्दर्य को जीत कर तथा सामने रक्खे हुये शीशे में अपनी छवि को एकटक देखकर, समय बतलाने वाली घड़ी के शब्द को सुनकर, (विवाहमंडप की ओर) चली ॥२८॥ स तदाऽर्जुनस्य तनयोऽपि नोतिमानुपपादिताखिलयथोचितक्रियः । अभिमन्त्रितं तदुपयोगि ऋग्विदा जगृहे सुगन्धिसुमाक्षतादिकम् ॥२९॥ उस समय अर्जुन-पुत्र नीतिकुशल सुर्जन ने भी, सम्पूर्ण उचित क्रियाओं से सुसज्जित होकर, ऋग्वेद में निष्णात याज्ञिक द्वारा दिये गये मन्त्रों से पुनीत और उस समय के योग्य सुगन्धित पुष्प और अक्षत आदि ग्रहण किये ॥२९॥ विविधाङ्गरागरुचिरैः स निर्बभौ × × × × × × × × ॥३०॥ समये च तत्र मिलने समुत्सुकावभिवीक्ष्य वासरमणिर्वधूवरौ । अनुपालयन्निव तयोर्मनोरथं चरमक्षमाधरसमीपमीयिवान् ॥३१॥ परस्पर जीवनसहचर बनने के लिये विवाह के शुभ मुहूर्त की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करने वाले उन वरवधू को देखकर भगवान् सूर्य भी, उनका मनोरथ पूर्ण करने के लिये, अस्ताचल के समीप चले गये ॥३१॥ गगनद्रुमस्य चरमाशया क्षणं तलशाखया स्थगितमर्कमण्डलम् । परिणामपाटलमधोमुखं पुरः पतनोन्मुखं फलमिव व्यभासत ॥३२॥ उस समय सूर्य आकाशरूपी वृक्ष की पश्चिम दिशा-रूपी शाखा में उलटे लटकने वाले तथा पक जाने के कारण लाल और शीघ्र ही गिरने वाले फल के समान शोभित हुए ॥३२॥