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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

१५२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् रुचिरोत्सवोचितपिशङ्गवाससः पटवासपाटलतरावगुण्ठनाः । इतरेतरार्पितकरावलम्बनाः खदिरोपनीतमधुराऽधरश्रियः ॥ ७॥ प्रमदान्मदादपिदृगम्बुजाञ्चलैः परिहासपेशलतया परस्परम् । अवलोकयन्त्य उदितस्मिताः कलं प्रतिसद्म पद्मदललोचना जगुः ॥ ८॥ विवाहोत्सव के योग्य शुभ और सुन्दर पीले वस्त्र पहनने वालीं, मुख पर लगाये गये सुगन्धित चूर्ण (पाउडर) के संसर्ग से गहरे गुलाबी बने हुये घूँघट वालीं, एक दूसरे के हाथ का सहारा लेने वालीं, पान के कत्थे के कारण लाल और सुन्दर अधरों की शोभा वालीं और कमलों के समान सुन्दर नेत्रों वालीं स्त्रियाँ, अत्यन्त हर्ष से और मद से, उपहास में चंचल होकर और अधरों पर मुस्कुराहट लाकर, अपने कमल-नयनों के कोनों से एक दूसरे को देखती हुईं, घर-घर में सुन्दर गीत गा रहीं थीं ॥ ७-८॥ रघुनाथविक्रमकथोपबृंहितं जनकात्मजापरिणयोचितं क्वचित् । क्वचिदिन्दुशेखरविनोदमञ्जुलं गिरिजाविवाहविधिवर्द्धितस्पृहम् ॥ ९॥ मुरवैरिकौशलविशेषितं क्वचिद् विलसद्विदर्भतनयास्वयम्बरम् । जगुरङ्गनाः प्रतिगृहं सुमङ्गलं ननृतुश्च वारवनिताः प्रमोदतः ॥१०॥ कहीं रामचन्द्र के पराक्रम की कथा से शोभित, कहीं सीता के विवाह के वर्णन से पुनीत, कहीं शिव के विनोद से सुन्दर, कहीं पार्वती के विवाह-वर्णन से मनोरंजक, कहीं कृष्ण के कौशल से युक्त और कहीं दमयन्ती के स्वयंवर की कथा से सुन्दर, मंगलमय गीत स्त्रियाँ घर- घर में गा रही थीं और वेश्यायें प्रसन्न होकर नाच रही थीं ॥ ९-१०॥ कलधौतकुम्भविलसत्पयोधरा कदलीप्रकाण्डरुचिरोरुरञ्जिता । निचिता विचित्रतरया पताकया नगरी व्यराजत यथैकनागरी ॥११॥ सुवर्णकलश रूपी सुन्दर स्तनों वाली, कदली रूपी सुन्दर जंघा से शोभित, विचित्रतर पताका से युक्त वह नगरी भी नगर की प्रमुख रमणी के समान सुशोभित हो रही थी ॥११॥ अथ शङ्खमङ्गलमृदङ्गडिण्डिमध्वनिभिर्विशेषितनिरन्तरत्वराः । शुभगन्धतैलमनिशं हरिद्रया निदधुर्वधूवपुषि सत्पुरन्ध्रयः ॥१२॥ शंख, मृदंग, घंटे आदि की मांगलिक ध्वनि के कारण विशेष रूप से निरन्तर जल्दी करने वालीं कुलीन कुटुम्बिनी स्त्रियाँ प्रति दिन वधू के शरीर पर हल्दी और सुगन्धित तेल लगाती थीं ॥१२॥ अवदातशीतलसुगन्धिपावनैः सलिलैः सुवर्णकलशोद्धृतैरिमाम् । विविधौषधीभिरुपनीतमङ्गलाः स्नपयाम्बभूवुरपि ताः समाहिताः ॥१३॥ स्वर्णकलशों में लाये गये शुचि, शीतल, सुगन्धित और पवित्र जल को विविध औषधियों से मांगलिक बनाकर उससे वे कुलीन कुटुम्बिनी स्त्रियाँ सावधान होकर वधू को स्नान कराती थीं ॥१३॥ (७) पटवासेन पिष्टातेन सुगन्धचूर्णेन पाटलतरं रक्तमवगुण्ठनं यासां ताः ।

२० चतुर्दशः सर्गः १५३ परिधाप्य धौतममलं दुकूलयोर्युगलं मरालमिथुनोपलक्षितम् । अनयन् नितान्तनिपुणा नताननां प्रतिकर्मसद्मनि वधूं पुरन्ध्रयः ॥१४॥ उन अत्यन्त कुशल कुटुम्बिनी स्त्रियों ने (विवाह के दिन तेल लगाकर और स्नान कराकर) वधू को दो धुले हुये निर्मल वस्त्र (लहँगा-ओढ़नी) पहिनाये जिन पर हंस और हंसी का जोड़ा बना हुआ था और फिर वे वधू को, जिसने (लज्जा से) सिर नीचा कर रखा था, शृंगार के कमरे में ले गईं ॥१४॥ अदसीयकुन्तलकदम्बकादधोनिहिताऽगुरुप्रभवधूपधोरणी । अतिकालिमानमपि चारुसौरभं किमतो ग्रहीतुमकरोदुपासनम् ॥१५॥ (शृङ्गारागार में) नीचे रक्खी हुई कालागुरु की (जलती हुई) धूपवत्ती क्या कनकावती के (काले और सुगन्धित) केशपाश से गहरा कालापन और सुन्दर सुगन्ध ग्रहण करने के लिये उपासना कर रही थी ? ॥१५॥ चिकुरेण चामरविशेषचारुणा सितमालया च सुतनुः पताकया । मनसि स्वभर्तुरगमन् मनोभुवः प्रथमाधिकारधृतकेतुयष्टिताम् ॥१६॥ सुन्दर शरीर वाली कनकावती का केशपाश कामदेव का उत्कृष्ट और सुन्दर चँवर था और उसकी शुभ्र माला कामदेव की वैजयन्ती थी; अतः स्वयं कनकावती अपने पति के हृदय में कामदेव के अलंघ्य अधिकार को सूचित करने वाली ध्वज-यष्टि बनकर प्रविष्ट हुई ॥१६॥ स्वत एव हेमशतपत्रसोदरे तदलीकवर्त्तितिलके परिष्कृतम् । हरितालसम्बलिंतरोचनाञ्चितं न विशेषकं रुचिरतां व्यशेषयत् ॥१७॥ कनकावती के ललाट पर सुवर्ण-कमल के पत्ते के समान सुन्दर लाल रंग का स्वाभाविक तिल था, अतः उस तिल के ऊपर लगाया गया हरिताल से मिले हुये गोरोचन का तिलक विशेष शोभा नहीं बढ़ा सका ॥१७॥ प्रकृतिस्थयोरपि तयोर्नेत्रयोर्युगलेन येन विजयी जगत्त्रये । यदधायि तत्र पुनराभिरञ्जनं तदमन्यत स्वमयशो मनोभवः ॥१८॥ कामदेव कनकावती के स्वाभाविक नेत्रों से ही स्वयं को त्रिभुवन-विजयी समझता था, अतः जब उन स्त्रियों ने कनकावती के नेत्रों में काजल लगाया तो कामदेव ने उसे अपना अपयश माना ॥१८॥ निजविभ्रमाभरणयोस्तु तद्भ्रुवोः प्रतिकर्म नान्यदवशिष्यते ध्रुवम् । कुटिलीभवत्यहह यत्र कौतुकात् कुटिलीकरोति न शरासनं स्मरः ॥१९॥ कनकावती की भौंहों के लिये तो उनका विभ्रम ही आभूषण था, अतः उनके लिये किसी अन्य शृङ्गार की निश्चय ही कोई अपेक्षा नहीं थी। उन भौंहों में स्वयं कामदेव ही कुतूहलवश कुटिल बन कर रहता था, अतः उसे अपने धनुष को भी कुटिल करने की कोई आवश्यकता नहीं थी ॥१९॥ (१५) अगुरुजन्यधूपवर्ती । (१७) ललाटस्थतिले ।

१५४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् कलितैकचक्रमतिचक्रधीर्ध्रुवं जनकं जनार्दनमुदीक्ष्य मन्मथः । कनकावतोश्रुतिवतंसचक्रयोर्युगलं दधे तदधिकत्वलब्धये ॥२०॥ प्रखर बुद्धिवाले (जहाँ चक्र काम न दे वहाँ भी इसकी बुद्धि काम देती है) कामदेव (प्रद्युम्न) ने अपने पिता श्रीकृष्ण के पास एक चक्र (सुदर्शन) देखकर उनसे वैशिष्ट्य प्राप्त करने के लिये कनकावती के गोल कर्णाभूषण-रूपी दो चक्र धारण किये ॥२०॥ विनतभ्रुवः श्रवणभूषणच्छलान् मुकुरद्वयं निजमधान् मनोभवः । यदुदीक्षणेन नितरां मुनेरपि द्विगुणो भवेदहह मन्मथभ्रमः ॥२१॥ झुकी हुई भौंहो वाली कनकावती के दोनों कर्णभूषणों के बहाने कामदेव ने अपने दो शीशे रख दिये थे जिनको देखकर जितेन्द्रिय मुनियों के लिये भी कामदेव का भ्रम (भ्रम; विभ्रम) दूना हो जाता था ॥२१॥ अधिनासिकं निहितमच्छमौक्तिकं नितरामशोभत मृगीदृशस्तदा । रदराजिनिर्मलरुचां जिघृक्षया रदनच्छदान्तिकमिवागमत् स्वयम् ॥२२॥ नाक में पहिनी गई नथ का स्वच्छ मोती मृगनयनी कनकावती के स्वच्छ दाँतों की सुन्दर किरणों को ग्रहण करने के लिये स्वयं ही अधर के पास आ गया था ॥२२॥ अधरे कुतूहलवशात् प्रसाधिका बहुधा न्यधत्त नवयावकद्रवम् । सुतनोस्तथापि सहजौऽस्य शोणिमा न मनागपि स्म भजते विशिष्टताम् ।२३। शृङ्गार कराने वाली दासी ने यद्यपि कनकावती के होठों पर काफी यावक (लाख से बनाया गया लाल रंग का पदार्थ) लगाया, किन्तु उससे कनकावती के होठों की स्वाभाविक लाली बढ़ न पाई ॥२३॥ कुचकुम्भसीम्नि मृगनाभिनिर्मिता नितरां रराज मकरी मृगीदृशः । हृदयस्थितस्य मदनस्य केतनं प्रियमभ्युपैतुमिव सम्भृतोद्यमा ॥२४॥ मृगनयनी के पीन स्तनों पर चित्रित कस्तूरी की पत्रमकरी (मगरी की आकृति का चित्र) इस प्रकार अत्यन्त शोभित हो रही थी मानों कनकावती के हृदय में विराजमान कामदेव की ध्वजा में अंकित अपने प्रिय मगर के पास जाने के लिये प्रयास कर रही हो (कामदेव की ध्वजा में मगर का चिह्न बना रहता है, इसीलिये उसे मकरध्वज भी कहते हैं) ॥२४॥ स्तनयोर्मनोरमतनोः सुवृत्तयोरुचितं तथाविधगुणेन सङ्गतम् । असमञ्जसं परममेतदञ्जसा तरलोऽपि यत् कृतपदस्तदन्तरे ॥२५॥ मनोहर शरीरवाली कनकावती के सुवृत्त (गोल; अच्छे चरित्र वाले) स्तनों का गुणवान् (सूत्र में पिरोये गये; गुणी) हार के साथ समागम उचित ही था, किन्तु आश्चर्य इस बात का था कि तरल (हार का बीच में रहने वाला बड़ा मोती; चलचारित्र) ने भी आसानी से ही वहाँ स्थान प्राप्त कर रखा था (गुणी और चरित्रवान् पुरुषों का गुणी पुरुषों से समागम उचित है, किन्तु यदि कोई चंचल और चलचारित्र पुरुष उनके बीच में आसानी से स्थान प्राप्त कर ले तो यह आश्चर्य की बात है ही) ॥२५॥

चतुर्दशः सर्गः १५५ रशनागुणेन सुतनोः सखीजनः किम योजयज्जघनमण्डलं पुनः । वसता हि तत्र सततं मनोभुवा स्वधनुर्गुणेन सगुणीकृतं यतः ॥२६॥ सखियों ने कनकावती के जघन को करधनी के गुण से सजाने का प्रयत्न क्यों किया ? वहाँ निरन्तर रहने वाले कामदेव ने पहले ही उस जघन को अपने धनुष की प्रत्यंचा से सगुण (प्रत्यंचा- युक्त ; गुणवान्) बना रखा था ॥२६॥ नवपत्रपाटलमलक्तकद्रवैर्विरराज राजदुहितुः पदद्वयम् । युगलं सुजातसरसीरुहोर्यथा किरणैर्नवোদিতमयूखमालिनः ॥२७॥ उस राजकुमारी के मेंहदी से रंगे हुये गुलाब की नवीन पंखुड़ियों के समान लाल पैर नवो- दित सूर्य की किरणों से रञ्जित लाल कमलों के समान शोभित हो रहे थे ॥२७॥ इति सज्जिता जितमनोजकामिनीतनुकान्तिरन्तिकनिवेशितं पुरः । निभृतं निरीक्ष्य मुकुरं चचाल सा घटिकानिवेदकनिनादनोदिता ॥२८॥ इस प्रकार सजी हुई कनकावती कामदेव की प्रिया रति के शरीरसौन्दर्य को जीत कर तथा सामने रक्खे हुये शीशे में अपनी छवि को एकटक देखकर, समय बतलाने वाली घड़ी के शब्द को सुनकर, (विवाहमंडप की ओर) चली ॥२८॥ स तदाऽर्जुनस्य तनयोऽपि नोतिमानुपपादिताखिलयथोचितक्रियः । अभिमन्त्रितं तदुपयोगि ऋग्विदा जगृहे सुगन्धिसुमाक्षतादिकम् ॥२९॥ उस समय अर्जुन-पुत्र नीतिकुशल सुर्जन ने भी, सम्पूर्ण उचित क्रियाओं से सुसज्जित होकर, ऋग्वेद में निष्णात याज्ञिक द्वारा दिये गये मन्त्रों से पुनीत और उस समय के योग्य सुगन्धित पुष्प और अक्षत आदि ग्रहण किये ॥२९॥ विविधाङ्गरागरुचिरैः स निर्बभौ × × × × × × × × ॥३०॥ समये च तत्र मिलने समुत्सुकावभिवीक्ष्य वासरमणिर्वधूवरौ । अनुपालयन्निव तयोर्मनोरथं चरमक्षमाधरसमीपमीयिवान् ॥३१॥ परस्पर जीवनसहचर बनने के लिये विवाह के शुभ मुहूर्त की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करने वाले उन वरवधू को देखकर भगवान् सूर्य भी, उनका मनोरथ पूर्ण करने के लिये, अस्ताचल के समीप चले गये ॥३१॥ गगनद्रुमस्य चरमाशया क्षणं तलशाखया स्थगितमर्कमण्डलम् । परिणामपाटलमधोमुखं पुरः पतनोन्मुखं फलमिव व्यभासत ॥३२॥ उस समय सूर्य आकाशरूपी वृक्ष की पश्चिम दिशा-रूपी शाखा में उलटे लटकने वाले तथा पक जाने के कारण लाल और शीघ्र ही गिरने वाले फल के समान शोभित हुए ॥३२॥

रु णीम् = ऽ । ऽ (ज + ग if it's । ऽ । ऽ: but वा is guru!) Wait, why is Pada 2 ending in बत निषेव्य वारुणीम्? ब(।) त(।) नि(।) षे(ऽ) व्य(।) वा(ऽ) रु(।) णीम्(ऽ) = 9 syllables! Then before 'बत': 13 - 9 = 4 syllables! 4 syllables before बत: स-न्न-ति-रा-ग-तो (6 syllables? + 9 = 15?) Wait, count: ... बत निषेव्य वारुणीम्: ब (1) त (2) नि (3) षे (4) व्य (5) वा (6) रु (7) णीम् (8) 8 syllables! Then Pada 2 has 13 syllables, so the beginning must be 13 - 8 = 5 syllables! What 5 syllables? Wait, if it's 13 syllables: स-न्न-ति-रा-ग-तो = 6 syllables! 6 + 8 = 14? Wait, look at verse 34: वशगो बभूव बिसिनीसुहृत् तथा (11 syllables? Wait, earlier I counted 13: व-श-गो (3) ब-भू-व (3) बि-सि-नी (3) सु-हृत् (2) त-था (2) = 13 syllables!) Let's re-scan verse 34, pada 1: व (।) श (।) गो (ऽ) - स-गण ब (।) भू (ऽ) व (।) - ज-गण बि (।) सि (।) नी (ऽ) - स-गण सु (।) हृ (guru because of त्) त् त (laghu? No, तथा has tha guru) सु (।) हृत्त (ऽ) था (ऽ)? Wait, सु (।) हृत्(ऽ) त(।) था(ऽ) = । ऽ । ऽ = ज + ग! Yes! 13 syllables! Every pada has 13 syllables! Now let's check verse 34, pada 2: वरुणस्य हन्त हरितोऽङ्कमाश्रितः (13 syllables): व (।) रु (।) ण (guru because of स्य) = व रु णस्य ( । । ऽ ) - स-गण ह (।) न्त (ऽ) ह (।) = ज-गण रि (।) तो (ऽ) ऽङ्क (ऽ)? Wait: रि (।) तो (ऽ) ङ्क (guru)? म (।) न्त? Let's count syllables: व-रु-ण-स्य ह-न्त ह-रि-तो-ऽङ्क-मा-श्रि-तः 1: व 2: रु 3: ण्ड (ण) 4: स्य (हन्त makes स्य guru? ह makes it guru?) Wait, count individual vowel-bearing syllables: 1 व, 2 रु, 3 ण, 4 स्य, 5 ह, 6 न्त, 7 ह, 8 रि, 9 तो, 10 ऽङ्क (मा), 11 श्रि, 12 तः Wait: व(1) रु(2) ण्ड(3) स्य(4) ह(5) न्त(6) ह(7) रि(8) तो(9) ऽङ्क(10) मा(11) श्रि(12) तः(13) = 13! Yes, exactly 13!

Now let's check verse 33 Pada 2 again: ... बत निषेव्य वारुणीम्: If Pada 2 has 13 syllables: What are the 13 syllables? Count from end: 13: णीम् 12: रु 11: वा 10: व्य 9: षे 8: नि 7: त 6: ब 5: तो 4: ग 3: रा 2: ति / त 1: न / न्न? Where does Pada 2 start?! Look at line 2: उररोकृताखिलवसुव्ययोऽपि सन्नतिरागतो बत निषेव्य वारुणीम् । Wait! Look at the first word: "उररीकृताखिलवसुव्ययोऽपि" - wait, does it say "उररो"? The first word has: उ - र - रो (or री? There's an e-matra on top? No, it's उ - र - री, the curve is like र followed by ी). Wait, look at : "उररीकृताखिल..." wait, look at the first 'र', then second 'र': it has a stroke going left and right? It's 'रो'? No, 'उररीकृत' is a famous idiom meaning 'स्वीकृत' (accepted, admitted)! Look at the Hindi translation: "अपनी सारी किरणों को खर्च करना स्वीकार करके"! "स्वीकार करके" = "उररीकृत्य / उररीकृता"! The printer printed 'उररीकृत' or 'उररीकृता...'? Wait, in the image, above the second र, there is an o-matra? It looks like 'उररीकृता' but with a broken type, or 'उररीकृता'.

Now look at: "सन्नतिरागतो" Wait, why does Hindi translate: "और उत्कट राग के कारण"? "उत्कट राग के कारण" = "सन्नतिरागतो"? Wait! Could it be "सन्ततिरागतो"? सन्तति = continuous? Wait, what if it's "सन्नतिरागतो"? No, look at the characters: स न्न ति रा ग तो Look closely at the letters: स (sa) न्न (nna) ति (ti) - wait, is there an i-matra? Look above: there is no i-matra, but wait, look at the letter between 'न्न' and 'रा': It has a loop to the left: 'ति'? No, that's a 'ति' or 'त'? Wait, is it "सन्नतिरागतो"? Let's look at the print: 'स', 'न्न', 'ति' or 'त'? Wait, is it "सन्नतिरागतो"? Yes, in the printed image, it literally says: "सन्नतिरागतो" or "सन्ततिरागतो" or "सन्नतरागतो"? Wait, look at 'त' in 'रागतो': the top bar goes down and loops left. Now look at the letter before 'रा': it is identical to 'त'! It is 'त'! Wait, is there an 'ि' matra? No! Is there an 'े' matra? No! Wait, what is before that 'त'? It is 'न्न'! So is it: स - न्न - त - रा - ग - तो = "सन्नत-रागतो"? Wait! "सन्नत" means bowed down / setting! Wait, what if it's "सन्नतरागतो"? Wait, does "सन्नत" mean bowed down (setting sun)? Wait, why does the Hindi say "और उत्कट राग के कारण"? "उत्कट राग" - "सान्द्रतर"? But the Sanskrit has "सन्नति" / "सन्नत"? Wait! Look at the Hindi: "और उत्कट राग के कारण वरुण की पश्चिम दिशा का उपभोग करके अब विवश होकर क्षितिज पर गिरने वाले सूर्य ने आकाश तक को छोड़ना प्रारंभ कर दिया, जैसे कोई शराबी अपना सारा द्रव्य खर्च करके तथा उत्कट अनुराग के कारण मदिरा पीकर बेहोश होकर धरती पर गिरता हुआ अपने वस्त्र तक को खोल दे ॥३३॥" Wait! "उत्कट अनुराग के कारण" in the shloka: "राग" = अनुराग! What means "उत्कट"? "सन्तत"? "सन्ततरागतो"? Look at the conjunct: could it be 'न्त'? In 'हन्त' , the 'न्त' has: horizontal stroke, vertical stroke with a loop. Look at this glyph in : It has: 'न' attached to 'त'! Wait! Is it 'न्त'? Yes! If it is 'न्त', then: स + न्त + त = "सन्ततरागतो"! Wait, "सन्तत" (santata) = continuous, intense, uninterrupted! In Hindi: "उत्कट"! Wait, but is it 'सन्तत' or 'सन्नति'? Wait, let's look at: स - न्त - त - रा - ग - तो. Wait, count the letters:

  1. ˜त / न्त / न्न ?
  2. त ? Wait, if it is 'सन्तत', why is there no anusvara? In Sanskrit printing, 'न्त' is written as 'न्' + 'त' or with anusvara? Often written as 'सन्तत'! Wait, if the first conjunct is 'न्त', then why is there another 'त'? Wait, look at the glyph again: Is it 'स' then 'न्न' then 'ति'? Wait, look at the image really, really closely: Letter 1: स Letter 2: न्न (two नs vertically or horizontally? Horizontally: न् + न = न्न) Letter 3: त (ta) with an i-matra? Wait, above 'त', is there an i-matra curve? No, the line above 'ति' is clean. Wait, what if it's 'सन्नतिरागतो'? Let's re-read the glyph: Wait! Could it be "सन्नतिरागतो"? Let's transcribe what is PRINTED. In Devanagari, whether it's 'सन्नतिरागतो' or 'सन्ततरागतो': Look at the third character: it is 'ति'? No, look at 'ति' in 'क्षितिज' in Hindi: the matra goes to the left of त! Here, there is NO stroke to the left of the third letter! Wait, is there a 'ि' to the left? Look between glyph 2 and glyph 3: No, there is a space, no vertical line of 'ि'. Wait, what about the stroke on top? There is none. Wait, is glyph 2 and 3: Look at: स (sa) न्न (nna) ति (ti) -- wait! Is it 'सन्नति'? Wait, look at 'स', then 'न्' with 'न' below? It's 'न्न'. Then 'त' (ta). Wait, look at 'सन्नतिरागतो': could it be 'सन्नतिरागतो'? Some fonts have 'ति' with the matra going behind? No, in Devanagari 'ि' is always before. Wait, is the letter 'त'? Yes, it's 'त'! Wait, is the letter before it 'न'? No, look at: 'स' + 'न' + 'न'? Wait, look at: स - न्न - त - रा - ग - तो -> सन्नत-रागतो? Wait, what about meter? If it's: उ-र-री-कृ-ता-खि-ल-व-सु-व्य-यो-ऽपि (12) स-न्न-त-रा-ग-तो (6) ब-त (2) नि-षे-व्य (3) वा-रु-णीम् (3) Total = 12 + 6 + 2 + 3 + 3 = 26 syllables in line 1! 26 / 2 = 13 syllables per pada! Pada 1 = 13 syllables! Pada 2 = 13 syllables! Wait! 12 + 6 + 2 + 3 + 3 = 26! If each pada is 13 syllables: Pada 1 = 13 syllables! Pada 2 = 13 syllables! Pada 1 ends at: 13th syllable! 12 syllables is: उ-र-री-कृ-ता-खि-ल-व-सु-व्य-यो-ऽपि (12) So the 13th syllable MUST BE: "स"! Wait! "स" alone is 1 syllable! Then Pada 2 has: न्न-त-रा-ग-तो (5?) - wait, 'न्न' cannot start a word! Wait! Is Pada 1: "उररीकृताखिलवसुव्ययोऽपि सन्" ? If the word is "सन्" (13th syllable)! Then Pada 2 starts with: "नतिरागतो"? Wait! Look at the word! Is it: स न् + न ... Wait! "सन्नतिरागतो" = "सन्" + "नतिरागतो" or "सन्नतिरागतो"? Wait, why would Pada 2 start with 'नतिरागतो'? Does "नतिरागतो" make sense? Wait! "नतिराग"? No, the Hindi says: "और उत्कट राग के कारण" - wait, where does "उत्कट" come from? Wait! In Sanskrit, "अतिराग" = उत्कट राग! अतिराग = excessive passion! "सन्नतिरागतो" = सन् + अतिरागतो = सन्नतिरागतो! सन् (being / having done so) + अतिरागतः (due to excessive passion / deep redness)! सन् + अतिरागतः = सन्नतिरागतः! Because सन् ends in 'न्', and 'अतिरागतो' begins with 'अ'! When 'न्' is preceded by a short vowel and followed by a vowel, it doubles (ङमो ह्रस्वादचि ङमुन्नित्यम्): सन् + अतिरागतो = सन्नतिरागतो! BINGO! ABSOLUTELY BRILLIANT! सन् (laghu? No, सन् preceded by short vowel 'पि' in व्ययोऽपि सन्: ऽपि is laghu, सन् has 'न्' which doubles to न्न before अ: ऽपिन् + न + ति + रा + ग + तो)! Wait: व्य-यो-ऽपि (। ऽ ।) सन् (ऽ) -> 13th syllable of Pada 1! Then Pada 2 begins with: अतिरागतो -> with doubling: न-ति-रा-ग-तो! न (।) ति (।) रा (ऽ) = स-गण! ग (।) तो (ऽ) ब (।) = ज-गण! त नि षे ( । । ऽ ) = स-गण! व्य वा रु णीम् ( । ऽ । ऽ ) = ज-गण + ग! IT FITS THE METER 1000% PERFECTLY! "सन्नतिरागतो" = सन् + अतिरागतो! And अतिराग = "उत्कट राग"! Everything is completely solved and crystal clear!

Now let's check all the lines and transcribe meticulously.

Line : १५६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्

Line : उररोकृताखिलवसुव्ययोऽपि सन्नतिरागतो बत निषेव्य वारुणीम् । Wait, is the first word "उररो..." or "उररी..."? Look at the first word: 'उ' 'र' 'रो' or 'री'? Look at the stroke above the second 'र': It has a loop to the left and a curve down to the right, wait, does it have a top stroke like 'ो'? Look at 'उररी': Wait, in , the first letter is उ, second is र, third is र with a matra. Wait, let's zoom in on that third letter: Is it 'रो' or 'री'? It looks like 'रो': there is an e-matra on top and an aa-matra to the right! Wait, look at 'रो' in 'रागतो': it has the exact same top slant! Wait, did the typesetter make a typo 'उररोकृताखिल...' or is it 'उररीकृताखिल...'? Wait, look at 'री' in 'वारुणीम्': the 'ी' matra has a curve to the left at the top. Look at 'उररो...': there is a vertical line after र, and a stroke on top slanting to the left, which is 'ो'! Wait, is it a typo in the book? Yes! The book actually printed "उररोकृताखिलवसुव्ययोऽपि" (a printing error for उररीकृताखिलवसुव्ययोऽपि, or maybe it is 'उररो'?). Let's look closely at the image: It is definitely printed as "उररोकृताखिलवसुव्ययोऽपि" (with a 'ो' matra). Wait, let's look again: Is that an 'ो' or a 'री'? Wait, the vertical bar after र: above it, the curve goes to the left, like a standard Devanagari 'ी' matra? But there is also an e-stroke? No, wait! Look at 'री' in 'वारुणीम्': the matra is a vertical stem with a top curve going to the left. Now look at 'उररो': it has a vertical stem with a stroke on top, but the stroke doesn't loop all the way over to र; it just slants left, like an 'े' on the vertical stem! That makes it 'ो'! Wait, but could it be intended as 'उररी'? The prompt says: "Transcribe ... line by line into pure, clean Markdown in Unicode Devanagari." Usually, if it's an obvious misprint or if it's 'उररोकृता...', wait, look at 'उररी': in many old fonts, the 'ी' matra on 'र' was sometimes set oddly, but wait, look at 'दिनमणिर्महीतले': 'री' is not there, but 'ही' has a standard loop. Wait, look at : is that 'उररो' or 'उररी'? Wait, look at the footnote: (३३) वसुः किरणः । वसु धनम् । वारुणी पश्चिमा दिक् मदिरा च । Let's see if we should transcribe what is printed: It looks very much like "उररोकृताखिलवसुव्ययोऽपि". But wait, could it be 'उररीकृताखिलवसुव्ययोऽपि'? Let's look at the top curve: it has a circle at the top? No, it's an 'ो'. Let's look at whether it's 'उररो' or 'उररी'. I'll write 'उररोकृताखिलवसुव्ययोऽपि' or 'उररीकृताखिलवसुव्ययोऽपि'? In Hindi translation: "स्वीकार करके", which is strictly the meaning of "उररीकृत्य / उररीकृत". But in text, it has 'रो'. Wait, let's look at the pixel level: Wait, the left of the loop: the stroke goes up from the vertical bar, curves up and left, and touches nothing. That is 'ो'! So it's printed "उररोकृताखिलवसुव्ययोऽपि". Wait, let me check if someone could read it as 'उररो' or 'उररी'. Let's look closely: wait, it actually looks like an 'ो' or 'ौ'? Just 'ो'.

Line : विवशः पतन् दिनमणिर्महीतले परिमोक्तुमम्बरमपि प्रचक्रमे ॥३३॥ (Note: प्रचक्रमे ॥ ३३॥)

Line : अपनी सारी किरणों को खर्च करना स्वीकार करके और उत्कट राग के कारण वरुण की

Line : पश्चिम दिशा का उपभोग करके अब विवश होकर क्षितिज पर गिरने वाले सूर्य ने आकाश

Line : तक को छोड़ना प्रारंभ कर दिया, जैसे कोई शराबी अपना सारा द्रव्य खर्च करके तथा उत्कट

Line : अनुराग के कारण मदिरा पीकर बेहोश होकर धरती पर गिरता हुआ अपने वस्त्र तक को

Line : खोल दे ॥३३॥

Line : वशगो बभूव बिसिनीसुहृत् तथा वरुणस्य हन्त हरितोऽङ्कमाश्रितः ।

Line : इतरासु दिक्षु भगवानयं यथा न करप्रसारणविधावपि क्षमः ॥३४॥

Line : वरुण की दिशा (पश्चिम) की गोद में जाकर सूर्य भगवान् उसके इतने अधीन हो गये

Line : कि अन्य दिशाओं की ओर कर (हाथ; किरणों) बढ़ाने का सामर्थ्य भी उनमें नहीं रहा ॥३४॥

Line : जगतीषु योतिमहितो महःपतिर्महसां भरेण दुरवापदर्शनः ।

Line : अवलोकते स्म सुखदृश्यमप्यमुं विधिना व्यपेतविभवं न कश्चन ॥३५॥

Line : जो सूर्य संसार में अत्यन्त महान् तथा समृद्ध थे और जिनके तेज के कारण उनकी ओर देखना

Line : तक कठिन था वे ही अब विधिवश ऐश्वर्य खो बैठे और अब सुलभ-दर्शन होने पर भी उनकी ओर

Line : कोई देखता तक नहीं ॥३५॥

Line : अथ वारुणीभजनजातकल्मषं परिमार्ष्टुमुद्यत इव त्विषां पतिः ।

Line : भृगुपातसाहसरसे दधन् मनः शिखरं जगाम चरमक्षमाभृतः ॥ ३६॥

Line : वारुणी (वरुण की स्त्री अर्थात् पश्चिम दिशा; मदिरा) का उपभोग करने के कारण उत्पन्न

Line : पाप का प्रायश्चित्त करने के लिये ही मानों सूर्य ऊँचे स्थान से गिरकर (अपना कलुषित शरीर

Line : छोड़ देने के लिये ) अस्ताचल के शिखर पर चढ़े ॥३६॥

Line : खरकालखड्गदलितस्य निर्दयं प्रशमं दिनस्य सहसा गमिष्यतः । Wait, look at line 23: "खरकालखड्गदलितस्य निर्दयं प्रशमं दिनस्य सहसा गमिष्यतः ।" Wait, above 'सहसा', there is a handwritten correction/mark? There is a small mark above 'ह', like a caret or blot. But the word is clearly 'सहसा'. Wait, check meter of verse 37: ख र का ( । । ऽ ) ल ख ड्ग ( । ऽ । - wait: ल is laghu, खड् is guru, ग is laghu = । ऽ । ) द लि त ( । । ऽ ) - wait: त is followed by स्य, so तस्य is guru! द लि तस्य ( । । ऽ ) नि र्द यं ( । ऽ । ) - नि(laghu? No, निर् is guru. Wait: ख-र-का ( । । ऽ ) ल-ख-ड्ग ( । ऽ । ) द-लि-त ( । । ऽ ) ? No, दलितस्य: द(।) लि(।) तस्य(ऽ) = स-गण! नि-र्द्र-यं? निर्दयं: निर्(ऽ) द(।) यं(ऽ)? But we need ज-गण ( । ऽ । )! Wait, why would निर्दयं be । ऽ ।? Is the word 'निदयं'? No, 'निर्दयं' is printed. Wait, let's look at the next pada: रुधिरा Titan... रुधिरा Titan? No! "रुधिरारुणं शिर इवार्कमण्डलं न्यपतत् पयःसु चरमस्य नीरधेः ॥३७॥" रु धि रा ( । । ऽ ) - स रु णं शि ( । ऽ । ) - ज र इ वा ( । । ऽ ) - स र्क म ण्ड लं ( । ऽ । ऽ ) - ज + ग! न्य प तत् ( । । ऽ ) - स प यः सु ( । ऽ । ) - ज च र म ( । । ऽ ) - स स्य नी र धेः ( । ऽ । ऽ ) - ज + ग! Every pada is मञ्जुभाषिणी!

Line : रुधिरारुणं शिर इवार्कमण्डलं न्यपतत् पयःसु चरमस्य नीरधेः ॥३७॥

Line : काल की तीक्ष्ण तलवार से निर्दयतापूर्वक काटे गये और रुधिर से लाल दिन के सिर के

Line : समान लगने वाला सूर्यबिम्ब पश्चिमी समुद्र के जल में गिर पड़ा ॥३७॥

Line : उचितं तदेव यदतीव मत्सरा स्थितिमाससाद न चिरं पितृप्रसूः ।

Line : स्फुटमन्तरायितमकारणं यया बत यामिनीदिवसयोः समागमे ॥३८॥

Line : यह अच्छा ही हुआ कि अत्यन्त ईर्ष्यालु सन्ध्या, जो निष्कारण ही दिन और रात्रि के समागम

Line : में रोड़ा बन रही थी, अधिक देर नहीं टिक सकी, जैसे कोई अत्यन्त ईर्ष्यालु दादी-सास, जो

Line : निष्कारण ही अपने पौत्र-पौत्रवधू के समागम में रोड़ा बन जाती है, वृद्धावस्था के कारण

Line : अधिक दिन जीवित नहीं रहती ॥३८॥

Line : (३३) वसुः किरणः । वसु धनम् । वारुणी पश्चिमा दिक् मदिरा च ।

Line : (३८) पितृप्रसूः सन्ध्या पितामही च ।

Wait, let's check the bottom: There is an illustration of a bird/swan and text: "Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi". Do we need to include this? Prompt says: "Include all historical narratives, verses, genealogy, battle accounts, dialogues, Hindi translation, and footnotes. Prefix each line with line marker like , ." Usually we don't need the collection stamp, but let's see. The prompt says "Include all historical narratives, verses, genealogy, battle accounts, dialogues, Hindi translation, and footnotes." So the collection watermark/stamp at the bottom is not part of the text, but the footnotes are!

Let's double-check all words in the verses and translations:

Verse 33: उररोकृताखिलवसुव्ययोऽपि (or उररीकृताखिलवसुव्ययोऽपि? In the text it is clearly 'उररोकृताखिलवसुव्ययोऽपि', wait, look at 'उररी' vs 'उररो': let's write what is printed: 'उररोकृताखिलवसुव्ययोऽपि') सन्नतिरागतो बत निषेव्य वारुणीम् । विवशः पतन् दिनमणिर्महीतले परिमोक्तुमम्बरमपि प्रचक्रमे ॥ ३३॥

Hindi 33: अपनी सारी किरणों को खर्च करना स्वीकार करके और उत्कट राग के कारण वरुण की पश्चिम दिशा का उपभोग करके अब विवश होकर क्षितिज पर गिरने वाले सूर्य ने आकाश तक को छोड़ना प्रारंभ कर दिया, जैसे कोई शराबी अपना सारा द्रव्य खर्च करके तथा उत्कट अनुराग के कारण मदिरा पीकर बेहोश होकर धरती पर गिरता हुआ अपने वस्त्र तक को खोल दे ॥३३॥

Verse 34: वशगो बभूव बिसिनीसुहृत् तथा वरुणस्य हन्त हरितोऽङ्कमाश्रितः । इतरासु दिक्षु भगवानयं यथा न करप्रसारणविधावपि क्षमः ॥३४॥

Hindi 34: वरुण की दिशा (पश्चिम) की गोद में जाकर सूर्य भगवान् उसके इतने अधीन हो गये कि अन्य दिशाओं की ओर कर (हाथ ; किरणों) बढ़ाने का सामर्थ्य भी उनमें नहीं रहा ॥३४॥ Wait, is there a space before the semicolon? "(हाथ; किरणों)" or "(हाथ ; किरणों)"? It's "(हाथ ; किरणों)" or "(हाथ; किरणों)". Looks like "(हाथ; किरणों)".

Verse 35: जगतीषु योतिमहितो महःपतिर्महसां भरेण दुरवापदर्शनः । Wait, is it "योतिमहितो" or "द्योतिमहितो"? Look at the first word of : "जगतीषु योतिमहितो" or "द्योतिमहितो"? Wait! Look at the first letter after जगतीषु: It is: 'यो' or 'द्यो'? Wait! "जगतीषु" ends in षु. Next word: Does it have 'द्य'? Look at the character: It has a 'य' with 'ो'? Wait, is there a 'द' attached to 'य'? In Sanskrit typography, 'द्य' often looks like 'द' + 'य' or just a special glyph. But here, look at 'द्य': Look at "उद्यत": the 'द्य' has a loop with a tail! Look at : It is 'यो'! Wait, why 'योतिमहितो'? Wait, what meter is verse 35? मञ्जुभाषिणी: ज ग ती ( । । ऽ ) - स-गण! षु यो ति ( । ऽ । ) - ज-गण! म हि तो ( । । ऽ ) - स-गण! म हः प ( । ऽ । ) - ज-गण! तिर् (ऽ) - wait, महःपतिर्महसां: Let's count: ज-ग-ती-षु (4) यो-ति-म-हि-तो (5) म-हः-प-ति-र्म-ह-सां (7) That's 16 syllables! That's too many! WAIT! Look at line 13: जगतीषु योतिमहितो महःपतिर्महसां भरेण दुरवापदर्शनः । Wait, let's count syllables:

  1. ती
  2. षु
  3. यो
  4. ति
  5. हि
  6. तो
  7. हः
  8. तिर्
  9. सां
  10. रे
  11. दु
  12. वा
  13. र्श
  14. नः Total = 26 syllables in line 13! Line 13 contains TWO PADAS! (13 + 13 = 26 syllables!) Pada 1: जगतीषु योतिमहितो महःपतिर् (13 syllables!) Pada 2: महसां भरेण दुरवापदर्शनः (13 syllables!) Line 14 contains TWO PADAS: Pada 3: अवलोकते स्म सुखदृश्यमप्यमुं (13 syllables!) Pada 4: विधिना व्यपेतविभवं न कश्चन (13 syllables!) ॥३५॥

YES! Pada 1 is: "जगतीषु योतिमहितो महःपतिर्" (13 syllables): 1 ज, 2 ग, 3 ती, 4 षु, 5 यो, 6 ति, 7 म, 8 हि, 9 तो, 10 म, 11 हः, 12 प, 13 तिर्! Wait, look at "योतिमहितो": Does it say "योतिमहितो" or "द्योतिमहितो"? Wait, if it was 'द्यो', 'षु' would become guru before 'द्य'! If 'षु' became guru, then 'षु द्यो ति' would be ऽ ऽ । which is NOT ज-गण ( । ऽ । )! Because षु is followed by single 'य', षु remains LAGHU! So: षु(।) यो(ऽ) ति(।) = ज-गण ( । ऽ । )! Wait, but is there a word "योति"? Wait! What does Hindi say? "जो सूर्य संसार में अत्यन्त महान् तथा समृद्ध थे और जिनके तेज के कारण..." Wait! "जो" = "यः"! Wait, "यः" + "अतिमहितः" = "योऽतिमहितो"! YES! "योऽतिमहितो"! Look at the text: It is: "यो" then an avagraha? Look between 'यो' and 'ति': Wait! Is that 'ति' or 'ऽति'? Look closely at: "यो" then... wait, is it 'ऽति'? No, look at the glyph: it's 'ति'! Wait, where did the avagraha go? Old presses often elided the avagraha! यः + अतिमहितः = योऽतिमहितः -> printed without avagraha: "योतिमहितो"! "योतिमहितो" = यः अतिमहितः (जो अत्यन्त महान् थे)! "अतिमहित" = अत्यन्त महान्! Look at the Hindi translation: "जो सूर्य संसार में अत्यन्त महान् तथा समृद्ध थे"! "जो" = यः (यो) "अत्यन्त महान्" = अतिमहितः (तिमहितो)! "समृद्ध थे" = महःपतिः! Everything makes 100% sense! And it is printed as: "योतिमहितो"!

Let's check : अवलोकते स्म सुखदृश्यमप्यमुं विधिना व्यपेतविभवं न कश्चन ॥३५॥ Hindi -: जो सूर्य संसार में अत्यन्त महान् तथा समृद्ध थे और जिनके तेज के कारण उनकी ओर देखना तक कठिन था वे ही अब विधिवश ऐश्वर्य खो बैठे और अब सुलभ-दर्शन होने पर भी उनकी ओर कोई देखता तक नहीं ॥३५॥

Verse 36 -: अथ वारुणीभजनजातकल्मषं परिमार्ष्टुमुद्यत इव त्विषां पतिः । भृगुपातसाहसरसे दधन् मनः शिखरं जगाम चरमक्षमाभृतः ॥ ३६॥

Hindi -: वारुणी (वरुण की स्त्री अर्थात् पश्चिम दिशा; मदिरा) का उपभोग करने के कारण उत्पन्न पाप का प्रायश्चित्त करने के लिये ही मानों सूर्य ऊँचे स्थान से गिरकर (अपना कलुषित शरीर छोड़ देने के लिये ) अस्ताचल के शिखर पर चढ़े ॥३६॥ (Notice space before ')' in "लिये )").

Verse 37 -: खरकालखड्गदलितस्य निर्दयं प्रशमं दिनस्य सहसा गमिष्यतः । रुधिरारुणं शिर इवार्कमण्डलं न्यपतत् पयःसु चरमस्य नीरधेः ॥३७॥

Hindi -: काल की तीक्ष्ण तलवार से निर्दयतापूर्वक काटे गये और रुधिर से लाल दिन के सिर के समान लगने वाला सूर्यबिम्ब पश्चिमी समुद्र के जल में गिर पड़ा ॥३७॥

Verse 38 -: उचितं तदेव यदतीव मत्सरा स्थितिमाससाद न चिरं पितृप्रसूः । स्फुटमन्तरायितमकारणं य

चतुर्दशः सर्गः १५७ विकलं वियोज्य मिथुनं रथाङ्गयोस्तमसेऽवकाशमचिराद् वितन्वती । अवमत्य सम्भृतपुटाञ्जलीन् द्विजांश्चपला पलायत जवात् पितृप्रसूः ॥३९॥ व्याकुल चक्रवाकमिथुन का परस्पर वियोग करके (रात्रि में चकवा-चकवी साथ-साथ नहीं रहते, ऐसा कवियों का समय है) तथा अन्धकार को शीघ्र आने का मार्ग देकर और हाथ जोड़े हुये दीन ब्राह्मणों के समान लगने वाले, चोंचों को बन्द करके घोंसलों में बैठे हुये पक्षियों की अवज्ञा करके चंचल संध्या वेग से भाग गई ॥३९॥ उदयं प्रयाति नियतं तमोहरो हरिवाहनस्य हरितोऽङ्कमास्थितः । इति रोषतः किमु तमः समुत्तभन्मलिनीचकार पुर एव तन्मुखम् ॥४०॥ इन्द्र की दिशा (पूर्व दिशा) की गोद का आलिंगन करके चन्द्रमा उदय हो रहा है, इस क्रोध के कारण ही उत्तेजित होकर मानों अन्धकार ने (परपुरुष का समागम करने वाली) पूर्व दिशा के मुख को मलिन बना दिया ॥४०॥ व्यसनेन वासरमणेर्विमूर्च्छितां नलिनीं निमीलितसरोजलोचनाम् । विधुरालिधोरणिरधीरपक्षतिक्ष्व्यजनैरवीजयदथोच्चनिस्वना ॥४१॥ प्रियतम सूर्य के वियोग में अपने कमल-नयनों को बन्द करके मूर्च्छित पड़ी हुई कमलिनी को चिल्लाती हुई व्याकुल भ्रमरों की पंक्ति, सखियों के समान, अपने अधीर पंखों से हवा कर रही थी ॥४१॥ कुशलः स्वकीयसुखकृत्य एव यः स मुदा जगाम मधुपः कुमुद्वतीम् । अपरः पुनः परवशोडतिसौहृदात् कमलोदरेषु सहते स्म बन्धनम् ॥४२॥ जिसे केवल अपने ही सुख का ध्यान था वह भ्रमर तो कुमुदिनी के पास चला गया, किन्तु जो सच्चे प्रेम के वश में था उस भ्रमर ने कमलिनी के उदर में बन्धन भी सहा ॥४२॥ इतरेतरं घटितकन्धरं दधावधिचञ्चु चञ्चुमनिमेषलोचनम् । तदपि व्ययुज्यत युगं रथाङ्गयो नियतिं निवर्तयति नैव पौरुषम् ॥४३॥ जो परस्पर कन्धे से कन्धा और चोंच से चोंच मिलाकर एक दूसरे को निर्निमेष-दृष्टि से देख रहा था, उस चकवा-चकवी के जोड़े को भी वियोग का कष्ट सहना पड़ा ! हाय ! पौरुष भी दुर्भाग्य को नहीं हटा पाता ॥४३॥ निरगुर्गभीरगिरिगह्वरोदरात् तरसा तमांसि सहितानि कौशिकैः । दुरितं दृशोः श्रवणयोश्च देहिनां समकालमेव फलितं तदाभवत् ॥४४॥ पहाड़ों की गहरी गुफाओं के अन्दर से अन्धकार और उल्लू साथ-साथ निकले। उस समय लोगों के आँखों और कानों के पाप एक साथ फलीभूत हुये (आँखों के पाप के कारण अन्धकार में दृष्टि काम न दे सकी और कानों के पाप के कारण उल्लुओं के शब्द सुनने पड़े) ॥४४॥

१५८ सुर्र्जनचरितमहाकाव्यम् अवशिष्टसान्ध्यकिरणात् त्रसन्निव द्विषतोऽस्तगस्य करपातशङ्कया । इतरा निरुध्य हरितः समन्ततश्चरमं रुरोध चरमां तमश्चयः ॥४५॥ अस्त होनेवाले अपने शत्रु सूर्य के कर पात की शंका के कारण बची-खुची सांध्य किरणों से भयभीत अन्धकार ने अन्य दिशाओं को घेरकर अब पश्चिम दिशा को भी अच्छी तरह घेर लिया ॥४५॥ विरलं तमः प्रथममुद्गतं क्वचिज्जनयत् तदाकृतिषु तत् तथा भ्रमम् । निबिडीभवत्तु निखिलं विधाय तन्नयनातिगं भ्रमकथां न्यवर्तयत् ॥४६॥ पहले अन्धकार कहीं-कहीं प्रकट हुआ जिससे लोगों को विविध पदार्थों की आकृति में भ्रम होने लगा, किन्तु जब अन्धकार घना होकर छा गया और इसलिये दृष्टिप्रसार का प्रसंग ही नहीं रहा तो आकृतिभ्रम का भी कोई प्रश्न न रहा ॥४६॥ किमशीतरोचिषि परोक्षतां गते हरितोऽपि तस्य सरणीमशिश्रियन् । विरहादमुष्य

चतुर्दशः सर्गः १५९ अवलम्ब्य दण्डमुपयास्यता पुरो विधुतं स्मरेण विधुताऽन्यभीतिना । ययुरेव दूरमपि यावदीप्सितं मुषितेक्षणेऽपि तिमिरेऽभिसारिकाः ॥५२॥ जिस प्रकार अपने आगे चलने वाले किसी स्वस्थ नेत्र वाले व्यक्ति द्वारा एक सिरे से पकड़ी गई लाठी का दूसरा सिरा पकड़कर उसके पीछे पीछे निर्भय चलकर अन्धा भी अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँच जाता है, उसी प्रकार अन्य वस्तुओं (अन्य व्यक्तियों अथवा सर्पादिक जन्तुओं) द्वारा उत्पन्न भय को नष्ट कर देने वाले तथा अपने आगे-आगे चलने वाले कामदेव द्वारा पकड़ी गई लाठी का सहारा लेकर दृक्शक्ति को नष्ट कर देने वाले निविड़ अन्धकार में भी अभिसारि- कायें दूर तक अपने गन्तव्य संकेत स्थानों पर जा पहुँचीं ॥ यदि 'विधुताऽन्यभीतिना' के स्थान पर 'विधुनान्यभीतिना' पाठ हो, तो यह अर्थ होगा :- अन्य से (राहु, सूर्य आदि से) भयभीत चन्द्रमा शुक्लपक्ष में भी, (अपने मित्र) कामदेव के आगे-आगे रहने के कारण साहस करके, किसी प्रकार बड़ी कठिनता से अपनी किरणों-रूपी दण्ड का सहारा लेकर टिका रहता है; किन्तु अभिसारिकाओं की विशेषता देखिये कि वे निर्भय होकर कृष्णपक्ष के निविड़ अन्धकार में भी, जब दृक्शक्ति नष्ट हो जाती है, अकेली ही, अपने दूर के संकेत स्थानों तक चली जाती हैं ॥५२॥ निबिडाधिनिर्दलितहृद्विनिःसृतैरिव कोकयोर्विरहवर्हिषः कणैः । तिमिरोच्चयस्य तनुकण्टकैरिव स्फुरितं तमोमणिभिरम्बरास्तरे ॥५३॥ चकवा-चकवी के गहरे शोक से दले हुये हृदयों में से निकले हुये विरहाग्नि के स्फुलिंगों के समान लगने वाले और अन्धकार के रोमाञ्चों के समान शोभित होने वाले खद्योत (जुगनू) आकाश में चमक रहे थे ॥५३॥ निलये निलीय मुखनेत्रमुद्रणमवलम्ब्य कालविभुतां विभावन् । शुककोकिलप्रभृतिरन्धमूकवच्छ्रुतवानुलूककुलदीर्घडम्बरम् ॥५४॥ तोते और कोयल इत्यादि अपने-अपने घोंसलों में छिपकर तथा मुंह और आँखें बन्द करके गूंगे और अन्धे बने हुये, समय की महिमा का विचार करके, उल्लुओं की लम्बी चीखें सुन रहे थे ॥५४॥ अधिमूलमिन्द्रककुभोऽथ लोचनैरविभावितस्फुटविशेषमुन्मुखैः । तिमिरोर्म्मुराशिसपुलिनोपमं पुरः किमपीक्ष्यते स्म शबलोज्ज्वलाकृति ॥५५॥ तब पूर्व दिशा के नीचे एक ऐसी वस्तु (चन्द्रमा), जिसकी विशेष आकृति उन्मुख नेत्रों द्वारा भी स्पष्ट नहीं दिखाई दे रही थी, जो अन्धकाररूपी समुद्र के किनारे चमकती हुई रेत के ढेर के समान लग रही थी और जो कुछ-कुछ धुंधलेपन से चमक रही थी, दिखाई दी ॥५५॥ (५२) 'विधुनाऽन्यभीतिना' इति पाठान्तरम् । विधुता निवारिता अन्येभ्यः सर्पगतस्खलनादिभ्यो भीतिः भयं अर्थात् अभिसारिकाणां येन तेन पुरः अग्रे उप समीपे यास्यता गच्छतेत्यर्थः स्मरेण कामेन विधुतं दण्डमवलम्ब्य अभिसारिकाः अन्धवत् सूचीभेद्येऽपि तमसि यथेच्छं दूरमपि किमुत समीपं ययुरेव। 'विधुनाऽन्य- भीतिना' इति पाठे त्वयमर्थः—अन्येभ्यः राहुसूर्यादिभ्यो भीतिर्यस्य तादृशेन विधुना चन्द्रेण कर्त्रा पुरः अग्रे उप समीपे यास्यता गच्छतेत्यर्थः स्मरेण कामेन हेतुना दण्डं किरणस्वरूपमवलम्ब्य विधुतं कथमपि अवस्थितं भावे क्तः। अभिसारिकास्तु घनान्धकारेऽपि ययुरेव। अत्र शुक्लदलोदितात् चन्द्रात् अभिसारिकाणां व्यतिरेको दर्शितः। तथा हि विधुरन्येभ्यो बिभेति अभिसारिकास्तु निर्भयाः, तस्य स्मरः सहायकः इमास्तु निःसहायाः, स तु दण्डावलम्बी इमास्तु निर्दण्डाः, स

१६० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अभिरेजुरुज्ज्वलितशक्रदिङ्मुखां हिमरोचिषः कतिपये मरीचयः । चकितञ्चकोरनयनाभिरीक्षिता जयवैजयन्त्य इव पुष्पधन्वनः ॥५६॥ फिर चन्द्रमा की, पूर्व दिशा के मुख को प्रकाशित करने वालीं कुछ किरणें, जिनकी ओर चकोर चकित होकर देख रहे थे, कामदेव की विजय-पताकाओं के समान शोभित हुईं ॥५६॥ दयितस्य तूर्णतरभाविसङ्गमं कथयन्त्यतिस्फुटमुखप्रसादतः । प्रियदूतिकेव पुरुहूतदिक् पुरः शिथिलीचकार तम उल्वणं निशः ॥५७॥ पूर्व दिशा-रूपी प्रिय दूती ने अपने मुख की प्रसन्नता (उज्ज्वलता) से प्रिय चन्द्र-रूपी नायक के शीघ्र होने वाले समागम को सूचित करते हुये, रात्रि-रूपी नायिका के उग्र अन्धकार-रूपी दुःख को कम कर दिया ॥५७॥ परिरभ्य पार्श्वमिलितां पुरो दिशं कृतकानुरागकलितः कलानिधिः । अदिशद् दिवोऽङ्कमनुकुङ्कुमारुणान् क्रमशः करानभिमुखप्रसारितान् ॥५८॥ कलानिधि चन्द्रमा ने दिखावटी प्रेम का प्रदर्शन करके समीप आई हुई पूर्व दिशा का गाढ़ आलिंगन किया और अपने केसर जैसे लाल कर क्रमशः आगे बढ़ाकर उसके वक्षःस्थल पर धर दिये ॥५८॥ प्रथमानुरागविगमेन पूर्वदिक्परिरम्भमुज्झितवता हिमत्विषा । शमितप्रदोषतमसा प्रसेदुषा सुरवर्त्मनि स्थितिरकारि निर्मले ॥ ५९ ॥ जब दिखावटी प्रेम का पहला उफ़ान ठंडा पड़ गया तब चन्द्रमा ने पूर्व दिशा का आलिंगन छोड़ दिया और अन्धकार-रूपी (परस्त्रीसंभोगजन्य) पाप को दूर करके प्रसन्न होने वाले चन्द्रमा देवताओं के निर्मल मार्ग में (आकाश में) स्थित हुये ॥५९॥ उदितः समग्रकलया कलानिधिस्तपनस्य पादहतिभिः प्रपीडिताम् । चिरकालमुद्रितमुखों कुमुद्वतीं व्यतनोत् प्रबोधयितुमायतां रुचिम् ॥६०॥ फिर सम्पूर्ण कलाओं से उदित होकर चन्द्रमा ने सूर्य के पैरों से रौंदी हुई और चिर काल से . मुरझाये हुये मुख से पड़ी हुई कुमुदिनी को जगाने के लिये (प्रफुल्लित करने के लिये) अपनी प्रीति को विस्तृत किया ॥६०॥ अमृतद्रवेण जगती कृतार्थिता द्रवताञ्च येन दृषदोऽपि लम्भिता । उदये स्वभर्तुरपि तस्य जज्वलुः किमहो महौषधिगणाः प्रतिक्षपम् ॥६१॥ जिस चन्द्रमा ने अपनी अमृत वर्षा से संसार को कृतार्थ किया और जिसने पत्थरों (चन्द्र- कान्त मणियों) तक के हृदयों को पिघला दिया, आश्चर्य है कि अपने ऐसे स्वामी के उदय होने पर ओषधि-समूह रात्रि में जल उठा (चमकने लगा) ! ॥६१॥ विहितौ तुषारकिरणस्य धामभिर्मकरध्वजावतितरङ्गितावुभौ । स्थितिमेक एव न जहौ यथोचितामपरः परस्थितिमपि व्यलोपयत् ॥६२॥ चन्द्रमा की किरणों के प्रकाश ने दोनों मकरध्वजों को (समुद्र को और कामदेव को) अत्यन्त तरंगित कर दिया । उनमें से एक ने (समुद्र ने) तो (ज्वार आ जाने के कारण) अपनी उचित (६२) मकरध्वजौ समुद्रकामदेवौ ।

२१ चतुर्दशः सर्गः १६१ स्थिति (मर्यादा) को ही छोड़ा, किन्तु दूसरे ने (कामदेव ने) तो (अतनु होने के कारण) न केवल अपनी ही स्थिति (शरीर) छोड़ी, अपितु दूसरों की (विरह-पीड़ितों की) स्थिति (मर्यादा) का भी लोप कर दिया ॥६२॥ यदि चन्द्रिकाऽपि मिथुनं रथाङ्गयोरदहन्न तत्र शशिनोऽनुयोज्यता । विरहाग्निदग्धमनसां हि कामिनामपि जीवितं व्रजति वज्रकीलताम् ॥६३॥ यदि शीतल चन्द्रिका ने भी चकवा-चकवी के जोड़ों को (विरह के कारण) जला दिया, तो इसमें चन्द्रमा की कोई प्रेरणा नहीं थी (और न चन्द्रिका का ही कोई दोष था) क्योंकि जिन लोगों का हृदय विरहाग्नि से जल जाता है उनको तो अपना ही जीवन वज्र के समान पीड़ा देने लग जाता है (विरही विरहाग्नि से जले, चाँदनी से नहीं; और जब उनका जीवन ही उन्हें पीड़ा देने लगा तो उन्हें चाँदनी भी कष्ट दे तो इसमें कौन सा आश्चर्य है) ॥६३॥ उदितः कलानिधिरहासि कैरवैः ककुभः प्रसेदुरुदजृम्भि सागरैः । बिसिनी तु बन्धुविरहेण मूर्च्छिता जगदेव वेद तमसा तिरोहितम् ॥६४॥ कलानिधि चन्द्रमा उदित हुये; कुमुद हँसने लगे; दिशायें प्रसन्न हो उठीं; सागर तरंगित होने लगे; किन्तु विचारी कमलिनी के लिये तो, जो अपने प्रियतम सूर्य के विरह में मूर्च्छित थी, सारे संसार में अँधेरा ही छा रहा था ॥६४॥ उदिते कलाभृति कुतूहलान्वितैः कृतमङ्गलः प्रथममग्रजन्मभिः । परिवारितः परिजनैरथार्जुनिः स जगाम धाम जगमालभूभृतः ॥६५॥ चन्द्रमा के उदित होने पर कुतूहलयुक्त ब्राह्मणों ने पहले मंगलाचरण किया और फिर अर्जुन- पुत्र सुर्जन, अपने परिजनों से घिरे हुये, राजा जगमाल के महल में गये ॥६५॥ वरसङ्गिमङ्गलमृदङ्गनिखनः क्रमशः समीपतरवर्त्तितां व्रजन् । पुलकैश्चकार नितरां वधूवपुः सहसा प्रगाढपरिरम्भकञ्चुकम् ॥६६॥ वर के साथ-साथ चलने वाले मांगलिक मृदंग का शब्द जैसे-जैसे क्रमशः समीप आता गया वैसे-वैसे ही खूब कसी हुई चोली वाला वधू का शरीर सहसा पुलकित होता गया ॥६६॥ दधिचन्दनाईकलशोपशोभितं विलसद्विचित्रतरचारुतोरणम् । पवमाननर्तितपताकमुच्चकैरविशद् वितानविततं स मण्डपम् ॥६७॥ दही, चन्दन और गीले कलशों से शोभित, मनोहर विविध चित्रों से युक्त सुन्दर तोरण वाले, पवन से नचाई गईं पताका वाले तथा ऊँचे विस्तृत शामियाने से शोभित मण्डप भवन में सुर्जन ने प्रवेश किया ॥६७॥ धृतचारुमङ्गलपटावगुण्ठनां कनकासने विनिहितां कुमारिकाम् । परिणेतुमानतमुखीमुपानयन्नहमप्रिकाभिरुचिताप्तबान्धवाः ॥६८॥ सुन्दर मांगलिक वस्त्र का घूंघट निकाले नीचा सिर करके सुवर्ण के सिंहासन पर बैठी हुई राजकुमारी को श्रेष्ठ बन्धुवर्ग, "मैं आगे चलूँ" "मैं आगे चलूँ" ऐसी इच्छा रखनेवाली (सखियों) द्वारा, (मण्डपभवन में) विवाह के लिये लिवा लाया ॥६८॥

१६२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् चिरकालमुत्सुकतया धृतात्मनोरनयोः परस्परवलोकनं प्रति । अभवद् विशालतरशैलसन्निभः क्षणमन्तरालविततीकृतः पटः ॥६९॥ वर-वधू की चिरकाल से एक दूसरे को देखने की तीव्र उत्कण्ठा थी, किन्तु उन दोनों के बीच में विस्तृत पर्दा कुछ देर के लिये एक बड़े भारी पहाड़के समान लग रहा था ॥६९॥ अपसारिते जवनिकापवारणे मिलितं कुमारमिथुनं परस्परम् । मनसोरिवात्तगुणयोः सुवाससोः कुसुमस्त्रजोर्विनिमयं विनिर्ममे ॥७०॥ जब पर्दा हटा लिया गया तो वर-वधू आपस में मिले और उन्होंने सूत्र में गूंथी गई सुगन्धित पुष्पमालाओं के साथ-साथ मानों अपने गुणवान् मन भी परस्पर बदल लिये ॥७०॥ हुतहव्यवाहपुरतः पुरोधसा समयोजि पाणियुगलं तयोर्मिथः । हृदयं तु पुष्पधनुषो निदेशतः प्रणयेन तत् प्रथममेव योजितम् ॥७१॥ यज्ञाग्नि की साक्षी में पुरोहित ने उन दोनों के हाथ एक दूसरे से मिला दिये, किन्तु उन दोनों के हृदयों को तो कामदेव के आदेश से प्रेम पहले ही मिला चुका था ॥७१॥ यदसुस्रुवन् करसरोजयोस्तयोरनिवारिताः सपदि घर्मबिन्दवः । समरोपयन् सपदि तत्र दूषणं हुतजातवेदसि जनाः सभासदः ॥७२॥ उन दोनों के करकमलों से शीघ्र (सात्विक भाव के कारण) जो अनिवार्यित पसीने की बूंदें निकलीं उसका दोष सभासद लोगों ने झट यज्ञाग्नि को दिया ॥७२॥ शिखिनः प्रदक्षिणविधेरनन्तरं गुरुणार्पिता हवनलाजमुष्टयः । अनवाप्य कम्प्रकरसम्पुटं तयोर्व्यवधिं विनैव पतिता हुताशने ॥७३॥ अग्नि की प्रदक्षिणा करने के बाद गुरु ने हवन करने के लिये जो लावे मुट्ठी में लेकर वर- वधू को दिये वे उनके कम्पित करसम्पुट में न ठहरने के कारण बिना व्यवधान के ही अग्नि में गिर गये ॥७३॥ अवलोकितुं पतिमुखेन्दुमादराद् वदनं मुहुर्गुरुजनेन यन्त्रिता । दरमुन्नमय्य भृशमानतं शिरः क्षणमक्षिपद्ममुदमुद्रयद् वधूः ॥७४॥ पति के मुखचन्द्र को देखने की उत्कण्ठा के कारण वधू ने, गुरुजनों की उपस्थिति से बारबार संकुचित होकर भी, (किसी न किसी प्रकार) अपने मुख को थोड़ा सा उठाकर पति का अत्यन्त चौड़ा सिर देखा और क्षण भर के लिये अपने नेत्र-कमलों की शोभा को विकसित किया ॥७४॥ अधिरोपिता नववधूः शिलातलं हृदयं निजञ्च परिणायकेन सा । प्रथमं कठोरतरमस्पृशत् पदा चरमे ममज्ज करुणास्रदीयसि ॥७५॥ नववधू को पति ने शिलातल पर और अपने हृदय पर आरूढ़ कराया, जिसमें से पहले को (शिलातल को), अत्यन्त कठोर होने के कारण वधू ने पैर से छुआ और दूसरे में, करुणा से कोमल होने के कारण, वह स्वयं डूब गई ॥७५॥

दयितस्तु सन्ततमभूत् कथापरः ।" Wait, is it "वधूर्दयितस्तु" or "वधूर्वदयितस्तु"? Look at the word: "वधूर्दयितस्तु" - wait, there is an extra letter or repha: व - धू - र् - द - यि - त - स्तु Wait, look at image line 27: "प्रतिवाचमीरयतु वा न वा वधूर्दयितस्तु सन्ततमभूत् कथापरः ।" Wait, look at "वधूर्दयितस्तु": There is व, धू with repha on... wait, on the next letter? Let's zoom in: "व धू र्द यि त स्तु" -> yes, "वधूर्दयितस्तु"! Next line of verse 82 (line 28): "अदस्रीयलोचनयुगं विलोकयन् वचनश्रुतौ सुचिरमुत्तरङ्गितम् ॥८२॥" Wait, "अदस्रीयलोचनयुगं" or "अदसीयलोचनयुगं"? Look at line 28: "अदसीयलोचनयुगं विलोकयन् वचनश्रुतौ सुचिरमुत्तरङ्गितम् ॥८२॥" Wait, let's look at the first word: अ - द - सी - य - लो - च - न - यु - गं Yes, "अदसीय

१६४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शनकैर्विधृत्य करपल्लवं मुहुः सुतनोर्विधूनयति कौतुकात् प्रिये । निजकङ्कणक्वणितभाजि सा त्रपाचकितं दधे प्रतिगवाक्षमक्षिणी ॥८४॥ जब प्रियतम ने धीरे से प्रिया का कोमल हाथ पकड़ कर कुतूहलवश उसे हिलाया, तब अपने कंकणों की ध्वनि के कारण लज्जा से चकित होकर प्रिया झरोखे की ओर झाँकने लगी ॥८४॥ उपचीयमानविभवेन सन्ततं निबिडानुरागरुचिरेण सुभ्रुवः । अतिशयितां शिथिलयन्त्यथ त्रपा मदनेन सन्धिविधिमैहत स्वयम् ॥८५॥ निरन्तर बढ़ने वाले वैभव से युक्त तथा गहरे प्रेम के कारण सुन्दर कामदेव के साथ सुन्दर भौंहों वाली नायिका की लज्जा ने, अपने आधिक्य को ढीला करके, स्वयं सन्धि करना चाहा ॥८५॥ परिचुम्बनेच्छुरलमावृणोन्मुखं परिरिप्सुरङ्गमधिकं जुगूह सा । नियतं च नेतिपदमोरितं तया सुचिरं रहःसु विधिवाचकं प्रिये ॥८६॥ यद्यपि प्रिया स्वयं चुम्बन करना चाहती थी, तो भी चुम्बन के समय वह अपने मुख को काफी छिपा लेती थी ; यद्यपि उसकी इच्छा स्वयं आलिंगन करने की थी, तो भी आलिंगन के समय वह अपने शरीर को अधिक सिकोड़ लेती थी ; और एकान्त में प्रिय के प्रति बहुत देर तक वह निषेधात्मक पद (न कार) का उच्चारण करती थी, यद्यपि वह निषेध निश्चय ही विधि- वाचक (स्वीकृति सूचक) था ॥८६॥ उपगूहनानि चकिता नखक्षतादपि चुम्बनानि रदना॑र्पितव्रणात् ॥ स्फुरितस्पृहाऽपि दयितस्य सङ्गमे न तदाऽन्वमोदत नवोढकामिनी ॥८७॥ प्रिय के समागम के समय वह नवोढा वधू, अपनी इच्छा होने पर भी, नखक्षत के भय से आलिंगन का और दन्तक्षत के भय से चुम्बन का अनुमोदन नहीं कर सकी ॥८७॥ नवसौहृदं मृदुनयेन पालयन् मदनोपदेशमपि नातिलङ्घयन् । कियतीभिरेव रजनीभिरर्जुनिः सुतनोः स विश्वसितपात्रतां ययौ ॥८९॥ कोमलता की नीति से नये प्रेम की पालना करते हुये और कामदेव के उपदेश का भी अधिक उल्लंघन न करते हुये वे अर्जुन-पुत्र सुर्जन, कुछ रातों में ही, प्रिया के विश्वासपत्र बन गये ॥८८॥ उपनाभि चञ्चलकरे नरेश्वरे प्रतिषेधवाचकमसर्वमीरितम् । मदनस्य मङ्गलऋचस्तदाऽभवत् प्रणवो नवोढहरिणीदृशो वचः ॥८९॥ प्रियतम के नाभि के समीप चंचल हाथ बढ़ाने पर नवोढा प्रिया ने जिस निषेधात्मक पद (ऊँ ऊँ ऊँ) का अपूर्ण उच्चारण किया, वह उस समय कामदेव की मंगल ऋचाओं (मंत्रों) के प्रणव अर्थात् ओंकार (ऊँ) के समान सुशोभित हुआ ॥८९॥ न चकार चुम्बनविधौ विरोधितां न जुगूह देहमुपगूहनेष्वपि । उपनीविसञ्चरणचञ्चलं वधूः करपल्लवं रतिगुरोरवारयत् ॥९०॥ अब प्रिया चुम्बन का विरोध नहीं करती थी और न आलिंगन के समय अपने शरीर को सिकोड़ती थी ; अब वह रतिकलाप्रवीण पति के अपनी नाभि के पास चंचल हाथ को ही हटाती थी ॥९०॥

चतुर्दशः सर्गः १६५ चिरनिर्गतास्वपि सखीषु मन्दिरात् मदिरेक्षणा क्षणमवाङ्मुखी स्थिता । भृशमाचकाङ्क्ष शयनाधिरोहणे दयितेन पाणितलकर्षणं बलात् ॥९१॥ रतिगृह से सखियों के चले जाने के बाद भी बहुत देर तक मादकनयनी प्रिया नीचा मुख किये खड़ी रही क्योंकि उसकी प्रबल इच्छा थी कि प्रियतम ही उसका हाथ पकड़कर उसे बलपूर्वक शय्या पर खींच लें ॥९१॥ नवसौहृदस्य परिपालनोत्सुका चकिता पुरः प्रणयभङ्गवैशसात् । उररीचकार निजखेदमप्यसौ हृदयेश्वरस्य हृदयानुवृत्तये ॥९२॥ नवीन प्रणय का उत्सुकता से पालन करने की इच्छा के कारण प्रेम के भंग के भय से घबरा कर प्रिया ने, हृदयेश्वर के मनोनुकूल कार्य करने के लिये कुछ कष्ट पाना भी स्वीकार कर लिया ॥९२॥ इति निर्विशन् विषयसम्भवं सुखं प्रमनाः समं वसुमतीशकन्यया । दिवसानि वंशबहुलानि वासिनां कतिचित् ततान सुकृतो सकौतुकम् ॥९३॥ इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक पुण्यात्मा राजा सुर्जन ने राजकुमारी कनकावती के साथ विषय सुख भोगते हुये, अपने बड़े वंश वाले ससुराल के लोगों में मिल कर कुछ दिन कुतूहलवश व्यतीत किये ॥९३॥ जिगमिषुः स्वपुरं स पुरस्कृतः सुकृतिनां नृपतिः सह भार्यया । अनुमतिं मतिमान् सुखमग्रहीद् विनयतो जगमालमहीपतेः ॥९४॥ पुण्यशील पुरुषों में अग्रगण्य राजा सुर्जन ने धर्मपत्नी के साथ अपनी नगरी में लौट जाने के लिये, विनय के कारण आसानी से, राजा जगमाल की स्वीकृति प्राप्त कर ली ॥९४॥ प्रतिष्ठासुः प्रातर्निजनगरमागामिनि दिने समेतः सम्बन्धव्यतिकरितमैत्रीमधुरितैः । कथानामाभोगैः प्रणयविनयोद्रेकपिशुनै- रनैषीदासीनः क्षणमिव निशां तां नरपतिः ॥९५॥ दूसरे दिन प्रातःकाल अपनी नगरी की ओर प्रस्थान करने वाले राव सुर्जन ने, विवाह सम्बन्ध और मित्रता दोनों के मेल से मधुर लोगों के साथ बैठ कर प्रेम और विनय के उत्कर्ष को सूचित करने वाली कथाओं के विस्तार से उस रात्रि को पल के समान व्यतीत कर दिया ॥९५॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये चतुर्दशः सर्गः

(९३) वासिनां तत्रत्यानां जनानां येषु बहुलानि वंशानि कुलानि संमिलन्ति स्म तादृशानि दिवसानि । (९५) सम्बन्धेन विवाहसम्बन्धेन व्यतिकरिता समृद्धा मैत्री तया मधुरितैः मनोहरैः ।

पञ्चदशः सर्गः नाथः कलानामथ कालयन्त्रितां विभावरीं यानमुखीं विभावयन् । छायाव्यपायाद् वहति स्म धूसरं वियोगिनारीवदनोपमं वपुः ॥ १ ॥ काल से नियमित रात्रि को जाते हुये देख कर कान्तिहीन चन्द्रमा ने विरहिणी स्त्री के मुख के समान पीला शरीर धारण किया ॥ १ ॥

  • यो वर्धयत्यम्बुनिधीन् दिवौकसां बिभर्ति कुक्षिं वपुषो व्ययेन यः । जीवातुराद्योऽस्य जगत्त्रयस्य यः स दुर्दशाया दशनान्तरं गतः ॥ २ ॥ जो समुद्रों के हृदयों को उछालता है, जो अपने शरीर तक को अर्पण करके देवताओं का पेट भरता है (देवगण चन्द्रमा की अमृतमयी कलाओं का उपभोग करते हैं) और जो तीनों लोकों के लिये जीवनौषधि है, वह चन्द्रमा भी दुर्भाग्य के मुंह में चला गया ! ॥ २ ॥ पीतारुणेनाक्षिगतेन कौमुदी जगाम लक्ष्मीर्मुदिताब्जकाननम् । कुत्रापि याता प्रथमं निशीथिनी कलङ्कशेषः पतितः कलाधिपः ॥ ३ ॥ लाल अरुण (सूर्य-सारथि) के उदित होने पर प्रसन्न कुमुद-लक्ष्मी कमलों के समूह में चली गई; रात्रि तो पहले ही कहीं चली गई थी। अतः अकेला चन्द्रमा भी, जिसका (कान्तिहीन होने के कारण और अपनी स्त्रियों के अन्यत्र भाग जाने के कारण) केवल कलंक ही शेष रह गया था, अस्त हो गया ॥ ३ ॥ दोषाः परं वृद्धिमयन्ति सन्ततं गुणास्तु मुञ्चन्ति विपत्सु पूरुषम् । कान्त्या विहीनस्य विधोः पतिष्यतः कलङ्क एवोद्भटतां जगाम यत् ॥ ४ ॥ विपत्ति में पुरुष के दोष बढ़ जाते हैं और गुण उसे छोड़ जाते हैं; अस्त होने वाले कान्तिहीन चन्द्रमा का कलंक ही बढ़ता गया ॥ ४ ॥ उद्यन्ननूरुर्मुखरञ्जनं पुरा दिशो विधाय क्षणमङ्गरागजाम् । लक्ष्मीं समग्रां निदधे निरत्ययामुदञ्चिताङ्गीषु सरोजराजिषु ॥ ५ ॥ उदय होने वाले अरुण ने पूर्वदिशा का शृङ्गार करने के लिये उसके मुख पर लाल उबटन लगाया और बचे-खुचे लाल उबटन की सारी शोभा को विकसित अंगों वाली कमलपंक्तियों पर फेंक दिया ॥ ५ ॥ कामं कलाभिः परिपूर्णमण्डलो धुनोतु धाम्ना तिमिराणि चन्द्रमाः । धाम्नां निधेरग्रसरेऽपि यद् बलं तमोनिरासे न भवेत् तदन्यतः ॥ ६ ॥ भले ही पूर्णविम्ब वाला चन्द्रमा अपनी सारी कलाओं के प्रकाश से अन्धकार को नष्ट करे, किन्तु अन्धकार को नष्ट करने की जो शक्ति सूर्य के सारथी में भी है वह अन्यत्र नहीं है ॥ ६ ॥

पञ्चदशः सर्गः १६७ शोणैः करैः संक्रमयन् मनोगतं पतङ्गकान्तेष्वनलं रथाङ्गयोः । सौभाग्यलक्ष्मीं गलहस्तयन् पुरः कुमुद्वतीनामुदगान् मरीचिमान् ॥ ७ ॥ चकवा-चकवी की विरहाग्नि को अपने लाल करों से सूर्यकान्त मणियों में सरकाते हुये और कुमुदिनी की सौभाग्यलक्ष्मी को गर्दन पकड़ कर बाहर निकालते हुये, भगवान् सूर्य उदित हुये ॥७॥ वातायनेभ्यः पतिता नभोमणेर्मरीचयो गैरकरागरोचिषः । मर्माण्यभिन्दन् नितरां भुजान्तराद् विमोचयन्तो दयितान् नतभ्रुवाम् ॥८॥ सूर्य की खिड़कियों की जालियों में से आनेवाली गेरू के समान लाल किरणों ने कामिनियों के बाहुपाश से प्रियतमों को छुड़ा कर उन्हें मर्मान्तिक कष्ट दिया ॥ ८ ॥ पद्माकराणां विरलाः शनैः शनैस्तरङ्गलेखा गणयन्निवोदिताः । सौरभ्यसारं सरसीरुहां हरन् समीरणः सञ्चरति स्म मन्थरम् ॥ ९ ॥ [L1

१६८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् नवोढवध्वा नमदाननश्रीयो नवीनमापीनकुचप्रसाधनम् । अन्योन्यमक्षिभ्रुवविभ्रमेङ्गितैर्नखक्षतं निर्दिदिशुर्मृगीदृशः ॥१४॥ लज्जा से नतमस्तक नई दुलहिन के सुडौल स्तनों पर नये आभूषण के समान सुशोभित, प्रियतम के नखक्षत को, मृगनयनी सखियों ने एक दूसरी को आँखों ही आँखों के कलापूर्ण इशारों से दिखाया ॥१४॥ इत्थं प्रवृत्ते दिवस्य सम्भ्रमे समाप्य कृत्यं कृतिनां पुरःसरः । देवान् द्विजातीन् मिलितान् गुरून्नपि प्रतिष्ठते स्म प्रयतः प्रणम्य सः ॥१५॥ इस प्रकार प्रातःकाल हो जाने पर कर्मठ-श्रेष्ठ सुर्जन ने, नित्य-कृत्य से निवृत्त होकर, देवताओं को, ब्राह्मणों को और एकत्रित गुरुवर्ग को सविनय सावधानीपूर्वक प्रणाम किया ॥१५॥ भूयिष्ठभूषामपि नव्यभूषणैः प्रसाध्य भूयः कनकावतीं सुताम् । यानोन्मुखीं

२२ पञ्चदशः सर्गः १६९ देवद्विजन्मातिथिदुर्गतान् मुहुः प्रयत्नतः प्रीणय तत्तदर्हणैः । मुक्त्वा मुखम्लानिमनीचमानसा वनीयकेभ्यो वितरोचितं वसु ॥२१॥ देव, ब्राह्मण, अतिथि और विपद्ग्रस्त व्यक्तियों को वार वार प्रयत्न से विविध सेवाओं द्वारा प्रसन्न करना और प्रसन्नमुख तथा विशालहृदय होकर याचकों को उचित धन देना ॥ २१ ॥ शुश्रूषमाणा गुरुवर्गमुद्गतश्रमा यदि स्याः सुकुमारभावतः । निर्वेदखेदं खलु तत्र मा कृथाः कृतार्थतामेव ततोऽवधारय ॥२२॥ यदि गुरुजनों की सेवा करते समय, सुकुमार होने के कारण, तुम थक भी जाओ, तो उससे कष्ट का अनुभव मत करना, किन्तु उस सेवा के कारण अपने आपको धन्य समझना ॥ २२ ॥ आम्रेडनं चेत् कुरुते गुरुः स्वयं प्रसन्नचेताः सुकुमारभाषितैः । भवेस्तदायासभिदे त्वदीशितुः सभाजनार्थं शुभवेशपेशला ॥२३॥ जब गुरुजन तुम्हारी सेवा से प्रसन्नचित्त होकर प्रेमपूर्ण कोमल वचनों से परिश्रम दूर करने के लिये तुमसे दो-तीन बार कहें ('तुम थक गई हो, अब भीतर जाओ' इस प्रकार दो-तीन बार कहें) तब सुन्दर वेश और शृङ्गार से सुसज्जित होकर अपने पति के सत्कार के लिये जाना ॥२३॥ चेष्टाभिरिष्टाभिरुदारभाषितैरकृत्रिमप्रेमपवित्रया धिया । सर्वास्ववस्थास्वपि सर्वतोमुखी विवर्धनीया दयितेऽनुकूलता ॥२४॥ प्रिय कर्मों से, उदार वचनों से और निश्छल प्रेम द्वारा पवित्र मन से, सब अवस्थाओं में सब प्रकार से, पति के प्रति अनुकूलता बढ़ाना ॥ २४ ॥ पत्यौ प्रतीपेऽपि तिरोहितव्यथा हिताय तस्याऽऽहितमानसा भव । विरुद्धभाषिण्यपि तत्र सत्रपा कृपानिदानं वद दैन्यवद् वचः ॥२५॥ पति के प्रतिकूल होने पर भी अपनी व्यथा को छिपा कर सदा उनके हित के लिये मन लगाना और पति के तुम्हारे विरुद्धवचन बोलने पर भी तुम लजीली और दीन बनकर उनको प्रसन्न करने वाले वचन बोलना ॥ २५ ॥ ईर्ष्यातिरेकोत्थवितर्कविभ्रमान् न चानुसन्धेयममुष्यदूषणम् । मा श्रद्दधीथाः श्रुतमप्युपेक्षया प्रतीतमप्यात्मतुदं विदूरय ॥२६॥ ईर्ष्या के आधिक्य से उत्पन्न तर्क-वितर्क के कारण पति के दूषण ढूँढ़ने का प्रयत्न मत करना । यदि उनके दोष सुन भी लो तो भी उनकी उपेक्षा कर देना और उनका विश्वास मत करना एवं यदि तुम स्वयं पति की कष्टदायक प्रतिकूलता का अनुभव करो तो भी उसे भुला देना ॥२६॥ निर्याति नो चेन् मनसस्तदुद्भटं प्रकाशनीयं न च दूषणं प्रिये । लौल्यात् प्रमादादथ चेत् प्रकाशितं निवेशनीयं परिहासभाषिते ॥२७॥ यदि पति का उग्र दोष मन से निकाला न जा सके तो भी उसे कभी पति के सामने प्रकट मत करना और यदि चापल्य से अथवा भूल से उसे प्रकट कर दो तो उसका समावेश हँसी में कर देना ॥ २७ ॥ (२३) आम्रेडनं द्विस्त्रिरुक्तम् ।

१७० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् बुद्ध्यां विनिधाय च भर्तुराशयं बिभर्ति येनायमवारितां मुदम् । तेन प्रबन्धेन मनोऽस्य सन्ततं स्वतन्त्रमाराधय वीतमत्सरा ॥२८॥ पति के हृदयगत भावों को सोच-समझकर जिन बातों से उनको अत्यन्त प्रसन्नता मिले उन बातों से, सदा ईर्ष्यारहित होकर, पति के स्वतन्त्र मन को प्रसन्न रखना ॥ २८ ॥ द्रागुद्वहन्तं वनितामथापरामसूयया खेदय माऽवनीपतिम् । भूयिष्ठभार्या हि भवन्ति भूभृतस्त्ववापि तावच्छ्रुतिगोचरं गताः ॥२९॥ यदि तुम्हारे पति शीघ्र किसी अन्य स्त्री से भी विवाह कर लें तो भी ईर्ष्यालु बन कर उन्हें कष्ट मत देना। यह तो तुमने भी सुना ही है कि राजाओं के अनेक रानियाँ होती हैं ॥ २९ ॥ भवन्ति भार्याः शतशो महीभृतां गुणैर्भवत्येकतमा प्रतिष्ठिता । ताराः कलत्राण्यखिलाः कलाभृतो न रोहिणीसाम्यमुपैति काचन ॥३०॥ भले ही राजाओं के अनेक रानियाँ हों, किन्तु गुणों के कारण एक पटरानी ही प्रतिष्ठित होती है; चन्द्रमा के अनेक तारा-रूपी स्त्रियाँ हैं, किन्तु कोई भी रोहिणी की बराबरी नहीं कर सकती ॥ ३० ॥ मर्मस्पृशाप्यन्यगिरा निपीडिता न पीडयेस्तं प्रतिकूलचेष्टितैः । पत्युः प्रसादातिशयेऽपि पुत्रिके! न लङ्घनीयो विनयोचितः क्रमः ॥३१॥ अन्य (सपत्नी) की मर्मस्पर्शी वाणी से पीड़ित होकर भी तुम प्रतिकूल चेष्टाओं से उसे कष्ट मत देना। पुत्रि! पति के अत्यन्त प्रसन्न होने पर भी विनयोचित क्रम का उल्लंघन मत करना ॥ ३१ ॥ एवंविधैस्त्वं पतिदेवताव्रतैर्वितन्वती विश्वजनानुरञ्जनम् । सीमन्तिनीनामुपगम्य मौलितां स्वबान्धवानां मुखमुज्वलीकुरु ॥३२॥ इस प्रकार पतिव्रताधर्मों से तुम सब लोगों को आनन्द देती हुई स्त्रियों में शिरोभूत (श्रेष्ठ) बनकर अपने बन्धुओं का मुंह उजला करना ॥ ३२ ॥ एवं ब्रुवाणा विनयानताननां दृगम्बुपूरैः स्नपयन्त्यशीतलैः । मूर्धन्युपाघ्रायभृशोपगूहतां मुमोच कृच्छ्रेण कृशोदरीं प्रसूः ॥३३॥ विनय से नतमुख कृशोदरी कनकावती को पूर्वोक्त उपदेश देकर अपने गरम आँसुओं की धारा से उसे नहलाती हुई माता ने उसका गाढ़ आलिंगन करके और मस्तक सूंघकर बड़ी कठिनता से उसे छोड़ा ॥ ३३ ॥ मान्यास्तथान्या मिलिताः कुटुम्बिनीः क्रमेण सम्भाव्य पदाभिवन्दनैः । ताभिः कृताशीर्भिरथानुमोदिता नरेन्द्रपुत्रीनरयानमागमत् ॥३४॥ कनकावती ने (माता से विदा लेकर) अन्य एकत्रित सम्मान्य कुटुम्बिनी स्त्रियों को उनके पैर छूकर प्रणाम किया और उनसे शुभाशीर्वाद तथा आज्ञा लेकर वह राजकुमारी पालकी पर चढ़ गई ॥ ३४ ॥

Here is the line-by-line transcription of the page into Devanagari Markdown:

पञ्चदशः सर्गः १७१ यानान्तरं यातमन्वन्तरं नृपः समेतबन्धुर्गुणसिन्धुरन्वगात् । प्राप्तः पुरं शूरजनोऽपि सम्भृतप्रभूतमङ्गल्यमनोज्ञमण्डनम् ॥३५॥ बन्धुवर्ग से घिरे हुये गुणसमुद्र राव सुर्जन दूसरे यान पर चढ़कर पालकी के साथ-साथ चले और अनेक एकत्रित मांगलिक सुन्दर पदार्थों से सुसज्जित अपनी नगरी में पहुँच गये ॥ ३५ ॥ ऋद्धां समासाद्य पुरीं प्रथीयसा प्रतापजालेन तिरोहिताऽहितः । कालं कियन्तं कनकावतीसखो विहारभूमिं भ्रमति स्म भूपतिः ॥३६॥ प्रबल प्रताप से शत्रुओं को छिपा देने वाले राव सुर्जन अपनी समृद्ध नगरी में आकर कुछ समय तक कनकावती के साथ विहारभूमि में भ्रमण करते रहे ॥ ३६ !! पुंस्कोकिलालापपरिष्कृतिव्रतैः स वीज्यमानो मलयाद्रिमारुतैः । तल्पे नवीनाम्रदलोपकल्पिते निनाय रम्या मधुयामिनीरसौ ॥३७॥ [L12