सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् नवोढवध्वा नमदाननश्रीयो नवीनमापीनकुचप्रसाधनम् । अन्योन्यमक्षिभ्रुवविभ्रमेङ्गितैर्नखक्षतं निर्दिदिशुर्मृगीदृशः ॥१४॥ लज्जा से नतमस्तक नई दुलहिन के सुडौल स्तनों पर नये आभूषण के समान सुशोभित, प्रियतम के नखक्षत को, मृगनयनी सखियों ने एक दूसरी को आँखों ही आँखों के कलापूर्ण इशारों से दिखाया ॥१४॥ इत्थं प्रवृत्ते दिवस्य सम्भ्रमे समाप्य कृत्यं कृतिनां पुरःसरः । देवान् द्विजातीन् मिलितान् गुरून्नपि प्रतिष्ठते स्म प्रयतः प्रणम्य सः ॥१५॥ इस प्रकार प्रातःकाल हो जाने पर कर्मठ-श्रेष्ठ सुर्जन ने, नित्य-कृत्य से निवृत्त होकर, देवताओं को, ब्राह्मणों को और एकत्रित गुरुवर्ग को सविनय सावधानीपूर्वक प्रणाम किया ॥१५॥ भूयिष्ठभूषामपि नव्यभूषणैः प्रसाध्य भूयः कनकावतीं सुताम् । यानोन्मुखीं