सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ पञ्चदशः सर्गः १६९ देवद्विजन्मातिथिदुर्गतान् मुहुः प्रयत्नतः प्रीणय तत्तदर्हणैः । मुक्त्वा मुखम्लानिमनीचमानसा वनीयकेभ्यो वितरोचितं वसु ॥२१॥ देव, ब्राह्मण, अतिथि और विपद्ग्रस्त व्यक्तियों को वार वार प्रयत्न से विविध सेवाओं द्वारा प्रसन्न करना और प्रसन्नमुख तथा विशालहृदय होकर याचकों को उचित धन देना ॥ २१ ॥ शुश्रूषमाणा गुरुवर्गमुद्गतश्रमा यदि स्याः सुकुमारभावतः । निर्वेदखेदं खलु तत्र मा कृथाः कृतार्थतामेव ततोऽवधारय ॥२२॥ यदि गुरुजनों की सेवा करते समय, सुकुमार होने के कारण, तुम थक भी जाओ, तो उससे कष्ट का अनुभव मत करना, किन्तु उस सेवा के कारण अपने आपको धन्य समझना ॥ २२ ॥ आम्रेडनं चेत् कुरुते गुरुः स्वयं प्रसन्नचेताः सुकुमारभाषितैः । भवेस्तदायासभिदे त्वदीशितुः सभाजनार्थं शुभवेशपेशला ॥२३॥ जब गुरुजन तुम्हारी सेवा से प्रसन्नचित्त होकर प्रेमपूर्ण कोमल वचनों से परिश्रम दूर करने के लिये तुमसे दो-तीन बार कहें ('तुम थक गई हो, अब भीतर जाओ' इस प्रकार दो-तीन बार कहें) तब सुन्दर वेश और शृङ्गार से सुसज्जित होकर अपने पति के सत्कार के लिये जाना ॥२३॥ चेष्टाभिरिष्टाभिरुदारभाषितैरकृत्रिमप्रेमपवित्रया धिया । सर्वास्ववस्थास्वपि सर्वतोमुखी विवर्धनीया दयितेऽनुकूलता ॥२४॥ प्रिय कर्मों से, उदार वचनों से और निश्छल प्रेम द्वारा पवित्र मन से, सब अवस्थाओं में सब प्रकार से, पति के प्रति अनुकूलता बढ़ाना ॥ २४ ॥ पत्यौ प्रतीपेऽपि तिरोहितव्यथा हिताय तस्याऽऽहितमानसा भव । विरुद्धभाषिण्यपि तत्र सत्रपा कृपानिदानं वद दैन्यवद् वचः ॥२५॥ पति के प्रतिकूल होने पर भी अपनी व्यथा को छिपा कर सदा उनके हित के लिये मन लगाना और पति के तुम्हारे विरुद्धवचन बोलने पर भी तुम लजीली और दीन बनकर उनको प्रसन्न करने वाले वचन बोलना ॥ २५ ॥ ईर्ष्यातिरेकोत्थवितर्कविभ्रमान् न चानुसन्धेयममुष्यदूषणम् । मा श्रद्दधीथाः श्रुतमप्युपेक्षया प्रतीतमप्यात्मतुदं विदूरय ॥२६॥ ईर्ष्या के आधिक्य से उत्पन्न तर्क-वितर्क के कारण पति के दूषण ढूँढ़ने का प्रयत्न मत करना । यदि उनके दोष सुन भी लो तो भी उनकी उपेक्षा कर देना और उनका विश्वास मत करना एवं यदि तुम स्वयं पति की कष्टदायक प्रतिकूलता का अनुभव करो तो भी उसे भुला देना ॥२६॥ निर्याति नो चेन् मनसस्तदुद्भटं प्रकाशनीयं न च दूषणं प्रिये । लौल्यात् प्रमादादथ चेत् प्रकाशितं निवेशनीयं परिहासभाषिते ॥२७॥ यदि पति का उग्र दोष मन से निकाला न जा सके तो भी उसे कभी पति के सामने प्रकट मत करना और यदि चापल्य से अथवा भूल से उसे प्रकट कर दो तो उसका समावेश हँसी में कर देना ॥ २७ ॥ (२३) आम्रेडनं द्विस्त्रिरुक्तम् ।