सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् बुद्ध्यां विनिधाय च भर्तुराशयं बिभर्ति येनायमवारितां मुदम् । तेन प्रबन्धेन मनोऽस्य सन्ततं स्वतन्त्रमाराधय वीतमत्सरा ॥२८॥ पति के हृदयगत भावों को सोच-समझकर जिन बातों से उनको अत्यन्त प्रसन्नता मिले उन बातों से, सदा ईर्ष्यारहित होकर, पति के स्वतन्त्र मन को प्रसन्न रखना ॥ २८ ॥ द्रागुद्वहन्तं वनितामथापरामसूयया खेदय माऽवनीपतिम् । भूयिष्ठभार्या हि भवन्ति भूभृतस्त्ववापि तावच्छ्रुतिगोचरं गताः ॥२९॥ यदि तुम्हारे पति शीघ्र किसी अन्य स्त्री से भी विवाह कर लें तो भी ईर्ष्यालु बन कर उन्हें कष्ट मत देना। यह तो तुमने भी सुना ही है कि राजाओं के अनेक रानियाँ होती हैं ॥ २९ ॥ भवन्ति भार्याः शतशो महीभृतां गुणैर्भवत्येकतमा प्रतिष्ठिता । ताराः कलत्राण्यखिलाः कलाभृतो न रोहिणीसाम्यमुपैति काचन ॥३०॥ भले ही राजाओं के अनेक रानियाँ हों, किन्तु गुणों के कारण एक पटरानी ही प्रतिष्ठित होती है; चन्द्रमा के अनेक तारा-रूपी स्त्रियाँ हैं, किन्तु कोई भी रोहिणी की बराबरी नहीं कर सकती ॥ ३० ॥ मर्मस्पृशाप्यन्यगिरा निपीडिता न पीडयेस्तं प्रतिकूलचेष्टितैः । पत्युः प्रसादातिशयेऽपि पुत्रिके! न लङ्घनीयो विनयोचितः क्रमः ॥३१॥ अन्य (सपत्नी) की मर्मस्पर्शी वाणी से पीड़ित होकर भी तुम प्रतिकूल चेष्टाओं से उसे कष्ट मत देना। पुत्रि! पति के अत्यन्त प्रसन्न होने पर भी विनयोचित क्रम का उल्लंघन मत करना ॥ ३१ ॥ एवंविधैस्त्वं पतिदेवताव्रतैर्वितन्वती विश्वजनानुरञ्जनम् । सीमन्तिनीनामुपगम्य मौलितां स्वबान्धवानां मुखमुज्वलीकुरु ॥३२॥ इस प्रकार पतिव्रताधर्मों से तुम सब लोगों को आनन्द देती हुई स्त्रियों में शिरोभूत (श्रेष्ठ) बनकर अपने बन्धुओं का मुंह उजला करना ॥ ३२ ॥ एवं ब्रुवाणा विनयानताननां दृगम्बुपूरैः स्नपयन्त्यशीतलैः । मूर्धन्युपाघ्रायभृशोपगूहतां मुमोच कृच्छ्रेण कृशोदरीं प्रसूः ॥३३॥ विनय से नतमुख कृशोदरी कनकावती को पूर्वोक्त उपदेश देकर अपने गरम आँसुओं की धारा से उसे नहलाती हुई माता ने उसका गाढ़ आलिंगन करके और मस्तक सूंघकर बड़ी कठिनता से उसे छोड़ा ॥ ३३ ॥ मान्यास्तथान्या मिलिताः कुटुम्बिनीः क्रमेण सम्भाव्य पदाभिवन्दनैः । ताभिः कृताशीर्भिरथानुमोदिता नरेन्द्रपुत्रीनरयानमागमत् ॥३४॥ कनकावती ने (माता से विदा लेकर) अन्य एकत्रित सम्मान्य कुटुम्बिनी स्त्रियों को उनके पैर छूकर प्रणाम किया और उनसे शुभाशीर्वाद तथा आज्ञा लेकर वह राजकुमारी पालकी पर चढ़ गई ॥ ३४ ॥