भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 256 में से

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पृष्ठ 197

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पञ्चदशः सर्गः १७१ यानान्तरं यातमन्वन्तरं नृपः समेतबन्धुर्गुणसिन्धुरन्वगात् । प्राप्तः पुरं शूरजनोऽपि सम्भृतप्रभूतमङ्गल्यमनोज्ञमण्डनम् ॥३५॥ बन्धुवर्ग से घिरे हुये गुणसमुद्र राव सुर्जन दूसरे यान पर चढ़कर पालकी के साथ-साथ चले और अनेक एकत्रित मांगलिक सुन्दर पदार्थों से सुसज्जित अपनी नगरी में पहुँच गये ॥ ३५ ॥ ऋद्धां समासाद्य पुरीं प्रथीयसा प्रतापजालेन तिरोहिताऽहितः । कालं कियन्तं कनकावतीसखो विहारभूमिं भ्रमति स्म भूपतिः ॥३६॥ प्रबल प्रताप से शत्रुओं को छिपा देने वाले राव सुर्जन अपनी समृद्ध नगरी में आकर कुछ समय तक कनकावती के साथ विहारभूमि में भ्रमण करते रहे ॥ ३६ !! पुंस्कोकिलालापपरिष्कृतिव्रतैः स वीज्यमानो मलयाद्रिमारुतैः । तल्पे नवीनाम्रदलोपकल्पिते निनाय रम्या मधुयामिनीरसौ ॥३७॥ [L12

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक) · पृष्ठ 197, कुल 256 में से · BharatKosha