सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् भर्तुः प्रभावातिशयेन भूयसीं समश्नुते वृद्धिमसंशयं जनः । तेजोधिकं बिभ्रति वासराधिपे महत्त्वमुच्चैर्यदवाप वासरः ॥४२॥ लोग अपने स्वामी के अत्युत्कृष्ट प्रभाव के कारण भारी वृद्धि प्राप्त करते हैं; यही कारण था कि दिन के स्वामी सूर्य के (ग्रीष्म-ऋतु में) प्रचण्ड तेजस्वी बन जाने पर दिन भी बहुत बड़ा हो गया ॥ ४२ ॥ स्पर्शं खरोष्णं किल सोढुमक्षमा करैः कठोरैः क्वथितं विवस्वतः । आमूलमुत्सर्पि मृणालविग्रहा मुमोच चाल्पेन पयः सरोजिनी ॥४३॥ कोमल मृणाल शरीरवाली और इसीलिये सूर्य के अत्यन्त उष्ण स्पर्श को सहने में असमर्थ कमलिनी ने सूर्य की गरम किरणों से खौलने वाले और जड़ के आसपास ही फैलने वाले थोड़े से पानी को भी छोड़ दिया ॥ ४३ ॥ जग्मुर्युवानो न तथाऽतिनिर्वृतिं सगन्धसारैर्घनसारशीकरैः । स्नानोत्थितप्राणसमास्तनान्तरप्रसक्तिशीतैर्जलबिन्दुभिर्यथा ॥४४॥ युवकों को चन्दन और कपूर के लेप से उतनी शान्ति नहीं मिली जितनी उन्हें स्नान करके निकली हुईं प्रियतमाओं के स्तनों पर लगे हुये जलबिन्दुओं के शीतल स्पर्श से मिली ॥ ४४ ॥ अश्रान्तनिष्यन्दिजलार्द्रकञ्चुकप्रसन्नपीनस्तनकुम्भविभ्रमम् । धारागृहे रागभृतो मृगीदृशां विलोकयन्तो दिवसानयापयन् ॥४५॥ फौव्वारों के नीचे बैठ कर निरन्तर बरसने वाले जल के कारण गीली चोलियों में से स्पष्ट प्रतीत होने वाले मृगनयनियों के सुडौल स्तनों की शोभा को देख-देख कर प्रेमी युवकों ने गरमी के दिन व्यतीत किये ॥ ४५ ॥ पीताः पुरश्चण्डरुचो मरीचिभिर्निसर्गरूक्षैश्च समीरणैस्ततः । निःशेषितापाः सततं विगाहनै र्जलाशयाः कर्दमशेषतां ययुः ॥४६॥ सरोवरों के जल को पहले तो प्रचण्ड सूर्य की किरणों ने पिया, फिर स्वभाव से ही रूखे गरम पवनों ने पिया, फिर बचा-खुचा जल प्राणियों के निरन्तर स्नान करने के कारण समाप्त हो गया और उनमें कीचड़ ही शेष रह गया ॥ ४७ ॥ आरूढहर्म्याणि हिमाम्बुनिःसृतिप्रकामरम्ये मिथुनानि रात्रिषु । शीतांशुकांतोपलकुट्टिमोदरे शिरीषपुष्पास्तरणे स्म शेरते ॥४७॥ गरमी की रातों में पतिपत्नी महलों के ऊपरी भाग में चन्द्रकान्त मणियों से जड़े हुये फर्श पर, जो (चन्द्रोदय के कारण) बहने वाले शीतल जल से अत्यन्त आनन्ददायक बन रहा था, शिरीष पुष्पों का बिस्तर बिछा कर सोते थे ॥ ४७ ॥ (४३) मृणालशरीरा नलिनी आमूलमल्पेनाल्पतया उत्सर्पि विसारि पयोऽपि मुमोच ।