भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पञ्चदशः सर्गः १७३ पान्थो युवा पाटलपुष्पमुद्गतं मनोभुवो गन्धवहं स्म मन्यते । तन्निर्गता गन्धवहाः सुगन्धयोऽप्यमूर्च्छयन् मानसमस्य यन्मुहुः ॥४८॥ युवक पथिक ने गुलाब के विकसित पुष्प को कामदेव के अभिमान को धारण करने वाला माना क्योंकि उसमें से निकलने वाले (उसका स्पर्श करके आने वाले) सुगन्धित पवनों ने भी उसके मन को बार बार मूच्छित कर दिया ॥४८॥ झङ्कारिणः क्वापि गता मधुव्रताः स्वनप्रसङ्गोऽपि पिकस्य न क्वचित् । धिग् दैवमाम्रस्य फले पचेलिमे शुकस्य काकस्य च तुल्यभागिता ॥४९॥ (वसन्त में) गूँजनेवाले वे भ्रमर (अब ग्रीष्म में) पता नहीं कहाँ चले गये और अब तो कहीं कोयल की कूक भी सुनाई नहीं देती । धिक्कार है उस विधाता को जो आम के पके फल में तोते को और कौवे को बराबर भाग दे रहा है ! ॥४९॥ भ्राम्यन् पिपासुः पथि मारवे मुहुर्मरीचिकावोचिनिरुद्धनिर्गमे । अम्भोविहीने गहने तपोरयैः पपात सिन्धाविव विक्लवोऽध्वगः ॥५०॥ गर्मी के वेग से गहन, जलविहीन, मारवाड़ के रेतीले मार्ग में, जिसमें से मृगमरीचिका की लहरों के कारण निकलने का कोई चारा नहीं था, घूमता हुआ प्यासा पथिक व्याकुल होकर गिर पड़ा, मानों समुद्र में कूद पड़ा हो ॥५०॥ भ्रान्त्वाऽतिदूरं तरुगुल्मसंवृतं मृगः समासाद्य मितं पयः क्वचित् । आवृत्य तस्थौ तृषितोऽपि कातरां शनैश्चलन्तीं प्रतिपालयन् मृगीम् ॥५१॥ बहुत दूर तक इधर-उधर दौड़धूप करने वाले एक हिरण को किसी झाड़ी के नीचे थोड़ा-सा पानी मिल गया । प्यासा होने पर भी वह धीरे-धीरे चलने वाली (प्यास से) व्याकुल मृगी की प्रतीक्षा करते हुये उस जल को ढक कर बैठ गया ॥५१॥ एकस्य पाथोजदलस्य पार्श्वतो निलीय नेतुं तपतीव्रमातपम् । छायामदीर्घामपि सेवितुं समं रथाङ्गयुग्मं यतते स्म मौग्ध्यतः ॥५२॥ एक कमलदल के पास छिप कर, भयंकर गर्मी को बिताने के लिये, चकवा-चकवी का जोड़ा, मूढ़ता के कारण, उसकी छोटी-सी छाया में बराबर बराबर बैठने का यत्न कर रहा था ॥५२॥ कुञ्जोदरे वा तरुकोटरे वा निलीय कुत्रापि विनीय वासरम् । अस्तं गते घर्मघृणौ शनैः शनैः विनिर्ययौ कौशिकवत् पृथग्जनः ॥५३॥ किसी कुञ्ज के भीतर अथवा किसी वृक्ष की कोटर में छिप कर और किसी प्रकार दिन भर बिता कर, ग्रीष्म ऋतु के सूर्य के अस्त हो जाने पर, तुच्छ पुरुष, उल्लुओं की तरह, धीरे धीरे बाहर निकले ॥५३॥ सूक्ष्मान्तरीये जघने घनस्तनी सहा न वोढुं रशनाकलापकम् । उत्फुल्लमल्लीकुसुमस्त्रजः परं नितम्बशोभां नितरामुपानयत् ॥५४॥ विशाल स्तनवाली कामिनी ने, पतले वस्त्र से शोभित नितम्ब पर करधनी का भार न सह सकने के कारण, विकसित मल्लिका के पुष्पों की माला से ही अपने नितम्ब की शोभा बढ़ाई ॥५४॥ (५३) घर्मघृणौ ग्रीष्मर्तुसूर्ये ।