सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् स्वेदोदबिन्दुस्तिमितं मृगीदृशो वपुर्वहन्त्यास्तपतापनिःसहम् । गाढं ललाग स्फुटरागि कञ्चुकं स्वत्याजनत्रस्तमिव स्तनद्वये ॥५५॥ ग्रीष्म की गरमी को न सह सकने वाले सुकुमार शरीर वाली मृगनयनी की पसीने की बूंदों से गीली और इसलिये प्रकटित राग (लाली; अनुराग) वाली चोली, उतार कर फेंक दिये जाने के भय से, स्तनों से कस कर चिपक गई ॥५५॥ ग्रीष्मानुरोधादनुभूय भूपतिः स वारिधारा जलयन्त्रनिर्गताः । वारां विहारैश्चकमे निषेचनं विलासिनीनां करयन्त्रधारया ॥५६॥ ग्रीष्म के कारण राजा ने फौव्वारों से निकलने वाली जल की धाराओं का सेवन करके, जल-क्रीड़ा द्वारा करयन्त्र की धारा से कामिनियों को भिगोने की इच्छा की ॥५६॥ हंसान् हसन्त्यो गमनैरथालसैः सखीकरालम्बनलब्धसाहसाः । पेतुः पतङ्गांशुनिपातकातरास्तरङ्गिणीं त्रस्तकुरङ्गलोचनाः ॥५७॥ अपनी मन्द चाल से हंसों की हंसी उड़ाने वाली और भयभीत हिरणों की सी आँखों वाली तथा सूर्य की किरणों के गिरने से व्याकुल स्त्रियों ने, सखियों के हाथों के सहारे के कारण साहस करके, नदी में प्रवेश किया ॥५७॥ आकर्ण्य तारं कलनूपुरध्वनि पुराङ्गनानां पतगाः सितच्छदाः । आपेतुरुत्तानितदीर्घकन्धराः स्वयूथ्यनादभ्रमतः ससम्भ्रमाः ॥५८॥ उन रमणियों के सुन्दर नूपुरों की उच्च ध्वनि को सुनकर, अपने झुण्डों के शब्द के भ्रम से, सफेद पंखों वाले हंस, चकित होकर और अपनी लम्बी गर्दनें तान कर, आये ॥५८॥ सीमन्तिनीनां कलमेखलारवैर्जितस्वराः सारसपत्रिपंक्तयः । द्रागेव जग्मुः सलिलाशयान्तरं पराभवोद्भूतह्रियैव ताडिताः ॥५९॥ रमणियों की रशनाओं के सारसों के स्वरों को जीतने वाले स्वरों से परास्त होकर सारस पक्षियों की पंक्तियाँ मानों पराजय की लज्जा के कारण शीघ्र जलाशय के भीतर घुस गईं ॥५९॥ दूरादहंपूर्विकया समागतास्तटावधि प्रौढकुतूहलेरिताः । तोयावगाहे क्षणजातसम्भ्रमा नतभ्रुवस्तद्विपरीततां दधुः ॥६०॥ अत्यन्त कुतूहल से प्रेरित हुई रमणियाँ दूर से तट तक तो "मैं पहले चलूँ", "मैं पहले चलूँ" इस प्रकार की स्पर्धा से आईं, किन्तु जल में उतरने के समय, क्षण भर चकित होकर, "तुम पहले उतरो", "तुम पहले उतरो" कहने लगीं ॥६०॥ कामं समर्थापि पुरो नितम्बिनी नितम्बदघ्नेम्भसि साध्वसादिव । हस्तावलम्बे दयितस्य सस्पृहा निवर्तितुं सम्बवृते पराङ्मुखी ॥६१॥ नितम्ब तक आने वाले जल में उतरने के लिये समर्थ होने पर भी कोई कामिनी, प्रियतम के हाथ के सहारे को पाने की इच्छा के कारण, मानों भय से विमुख होकर लौटने लगी ॥६१॥