भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पञ्चदशः सर्गः १७५ कान्तेन सिक्तं प्रथमं पृथुस्तनी विपक्षमालोक्य विवृद्धवेपथुः । शीतातिरेकं प्रतिपाद्य कोपना जवादुदस्थाज्जलवेणिमध्यतः ॥६२॥ प्रियतम ने पहले सपत्नी पर जल छिड़का, यह देखकर किसी विशाल स्तनवाली कामिनी को क्रोध से रोमाञ्च हो गया और वह काफी सर्दी लगने का बहाना बना कर वेग से जल के प्रवाह से बाहर जाने के लिये उठ खड़ी हुई ॥ ६१ ॥ कान्ताभिषेकाय पुरः समुद्यता भुजद्वयाऽऽन्दोलननर्तितस्तनी । दोर्मूललोलेक्षणमेनमुन्मुखी विलोक्य भूयिष्ठमसिञ्चदक्षिणी ॥६३॥ प्रियतम पर दोनों हाथों से जल फेंकने के कारण भुजाओं के हिलने से नाचने वाले स्तनों वाली रमणी ने जब मुँह उठा कर देखा कि प्रियतम तो उसकी भुजाओं के मूल पर दृष्टि जमाये हैं, तो उसने प्रियतम की आँखों पर गहरा पानी फेंकना प्रारम्भ किया ॥ ६३ ॥ लग्नं कुचे केसरमम्बुजन्मनो विदूरयामीति नखक्षतस्पृशम् । सीत्काररुद्धस्मितमाक्षिपत् प्रियं सरोरुहाक्षी कटुसाचिवीक्षणैः ॥६४॥ 'तुम्हारे स्तन पर कमल का केसर लग गया है, इसे हटा देता हूँ'—यह कहकर नखक्षत का स्पर्श करने वाले प्रियतम पर, कमलनयनी ने, जिसकी मुस्कान को सीत्कार ने रोक दिया था, बनावटी क्रोध से टेढ़ी नजर डाली ॥ ६४ ॥ गत्वा कियद्दूरमुदीक्ष्य कौतुकाद् ग्रहीतुकामा कमलानि कामिनी । आलम्बितुं नालमुदग्रनालकं विदूनपाणिः परिगाढकण्टकैः ॥६५॥ कोई कामिनी कुतूहलवश कमलों को देख कर उनको तोड़ने के लिये कुछ दूर तक गई, किन्तु उठे हुये कमल-नाल के घने काँटों से हाथ छिलने के कारण उसे नहीं पकड़ सकी ॥ ६५ ॥ विम्बाधराक्रान्तिवितीर्णवेदनैर्निरुध्यमाना परितो मधुव्रतैः । त्रासादिव स्रस्तदुकूलमाकुला प्रियं सपत्नीपुरतोपि सस्वजे ॥६६॥ बिम्बाधर पर आक्रमण से कष्ट देने वाले भ्रमरों से चारों ओर घिरी हुई कामिनी ने, जिसका दुकूल गिर गया था, भय से घबरा कर सपत्नी के सामने ही प्रिय का आलिंगन कर लिया ॥ ६६ ॥ कस्याश्चिदम्भःस्नपितं नतभ्रुवः क्षणादसंलक्षितसूक्ष्मकञ्चुकम् । वक्षोजयुग्मं द्रुतहेमपूर्णयोर्ववाह कान्तिं किल काचकुम्भयोः ॥६७॥ किसी सुभ्रू के स्तन, जिनकी पतली चोली, कुछ समय के लिये, पानी से भींग जाने के कारण दिखाई नहीं दे रही थी, पिघले हुये सोने से भरे हुये काच के घड़ों के समान लगे ॥ ६७ ॥ दष्टाधरा मुग्धवधूर्मधुव्रतैः प्रियेण साकूतसहासमीक्षिता । तत्कालयोग्यप्रतिपत्तिकातरा विनष्टबाधेव नतानना स्थिता ॥६८॥ किसी मुग्धा को, जिसके अधर को भ्रमरों ने काट लिया था, प्रियतम ने हँस कर साभिप्राय देखा, इसलिये उस समय क्या करना चाहिये यह न सोच सकने के कारण, वह नीचा मुख करके इस प्रकार खड़ी हो गई मानों उसे पीड़ा ही न हो रही हो ॥ ६८ ॥