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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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१७६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् धारातिपाताच्चकिता कृशोदरी करेण यावत् पिहिताननेक्षणा । तावत् प्रियः पार्श्वगतां तथापरामसिञ्चदाशुस्मितपूर्वमम्बुभिः ॥६९॥ प्रियतम द्वारा फेंके गये जल की अधिक धाराओं के गिरने से चकित कृशोदरी ने जैसे ही अपने हाथों से मुँह और आँखें ढक लीं वैसे ही प्रियतम ने पास में खड़ी दूसरी प्रिया को, मुस्कुरा कर, शीघ्र पानी से सींचना शुरू किया ॥ ६९ ॥ दन्तच्छदं दन्तपदैर्यावकं गतानुलेपौ नखरक्षतैः स्तनौ । रागेण वीताञ्जनमीक्षणद्वयं व्यरोचयद् वारिचयो वरस्त्रियाः ॥७०॥ जिस प्रकार प्रियतम (चुम्बन के समय) प्रिया के अधर की लाक्षादिजन्य लालिमा को अपने दाँतों से हटा देता है, स्तनों के (चन्दन केसर आदि के) लेप को नखक्षत से दूर कर देता है और नेत्रों के अञ्जन को (चुम्बन, करस्पर्श आदि से) मिटा देता है, उसी प्रकार नदी के जल ने भी श्रेष्ठ काम

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