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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

CC0. In Public Domain, Digitizagtion by eGangotri २३ पञ्चदशः सर्गः १७७ पत्रालिलीना मकरी मृगीदृशां स्तनाचलेभ्यः पतिता ह्रदाम्भसि । रागोपि तावज्जडसङ्गिनोऽङ्गतः प्रसन्नमन्तर्विशति स्म तत्क्षणम् ।।७५।। मृगनयनियों के स्तनों पर चित्रित मकरी स्तनरूपी पर्वतों से सरोवर के जल में कूद पड़ी (मगर जल में रहते ही हैं) । (केसर और चन्दन आदि से) स्तनों पर चित्रित मकराकार चिह्न के जल से धुल जाने पर उसका राग (लालिमा) जल के संग के कारण शरीर से हट कर, उसी समय प्रसन्नतापूर्वक अन्तःकरण में प्रवेश कर गया, जिस प्रकार मूर्ख के साथ संभोग (जडसंग) करते समय विदग्ध नायिका का राग शरीर से हट कर अन्तःकरण में चला जाता है अर्थात् नायक के मूर्ख होने के कारण नायिका का शरीर राग (हावभाव) का प्रदर्शन नहीं करता, केवल अन्तः- करण ही अनुरागपूर्ण रहता है ।। ७५ ।। प्रेम्णा प्रियेणाम्बुजमम्बुजेक्षणकराम्बुजे यत् प्रथमं निवेशितम् । शङ्के तदेवास निवासभूः श्रियस्तदाश्रये श्रीरधिका यतोऽभवत् ।।७६।। पहले पहल कमलनयनी के कर-कमल में प्रियतम ने प्रेम से जो कमल दिया उस कमल में ही मानों लक्ष्मी जी रहती थीं क्योंकि उसको पाकर कमलनयनी की लक्ष्मी (शोभा) अधिक हो गई ।। ७६ ।। कीर्णं क्वचिन्मर्दितपुष्पदामभिः क्वचिच्च किञ्जल्कभरः सरोरुहाम् । पर्याविलं क्वापि हतैर्विलेपनैरभूत् तदम्भः सुदृशां विगाहनात् ।।७७।। उन कामिनियों के स्नान के कारण जल में कहीं तो मसली हुई फूलमालायें बिखर रही थीं, कहीं कमलों के केसर-समूह पड़े थे और कहीं कहीं वह जल घुले हुये लेपों के कारण मटमैला बन गया था ।। ७७ ।। प्रतिप्रतीपं विनिभालयन्ती द्राग् द्राघयन्ती क्वचिदम्बरान्तम् । लग्नाईवस्त्रप्रकटोच्चनीचे निलीयमानेव निजे शरीरे ।।७८।। भुजायुगस्वस्तिकया नितान्तं निपीडितोत्तुङ्कतरस्तनान्ता । काचिद् व्रजन्ती सरितस्तटान्तं कामेऽपि तन्वी तनुते स्म कामम् ।।७९।। जलक्रीड़ा के बाद नदी के प्रवाह से तीर की ओर आने वाली कामिनी, कभी प्रत्येक सपत्नी की ओर (तिरस्कार से) देखती थी, कभी हाथ बढ़ा कर साड़ी को खूब फैला लेती थी ताकि शरीर के अंग दिखाई न दें, गीले वस्त्र के शरीर से चिपक जाने के कारण उसके अंगों का उतार-चढ़ाव स्पष्ट प्रतीत हो रहा था और कभी वह झुक कर लज्जावश इस प्रकार चलती थी मानों अपने शरीर में ही छिप जाना चाहती हो, कभी वह अपने स्तनों को छिपाने के लिये (बायें हाथ को दाहिने कंधे पर और दाहिने हाथ को बायें कंधे पर रख कर) अपने दोनों हाथों को स्वस्तिक के आकार का बनाकर उनसे अपने अत्यन्त उच्च स्तनों के अग्रभाग को खूब दबाती हुई चलती थी; वह कामदेव को भी कामविह्वल बना रही थी ।। ७८-७९ ।। (७८) प्रतिप्रतीपं प्रतीपं प्रतीपं प्रति, एकैकाः सपत्नीः पश्यन्तीत्यर्थः । (७९) भुजायुगस्वस्तिकया स्वस्तिकाकारेण बाहुयुगलेन । Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi