सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
पञ्चदशः सर्गः १७३ पान्थो युवा पाटलपुष्पमुद्गतं मनोभुवो गन्धवहं स्म मन्यते । तन्निर्गता गन्धवहाः सुगन्धयोऽप्यमूर्च्छयन् मानसमस्य यन्मुहुः ॥४८॥ युवक पथिक ने गुलाब के विकसित पुष्प को कामदेव के अभिमान को धारण करने वाला माना क्योंकि उसमें से निकलने वाले (उसका स्पर्श करके आने वाले) सुगन्धित पवनों ने भी उसके मन को बार बार मूच्छित कर दिया ॥४८॥ झङ्कारिणः क्वापि गता मधुव्रताः स्वनप्रसङ्गोऽपि पिकस्य न क्वचित् । धिग् दैवमाम्रस्य फले पचेलिमे शुकस्य काकस्य च तुल्यभागिता ॥४९॥ (वसन्त में) गूँजनेवाले वे भ्रमर (अब ग्रीष्म में) पता नहीं कहाँ चले गये और अब तो कहीं कोयल की कूक भी सुनाई नहीं देती । धिक्कार है उस विधाता को जो आम के पके फल में तोते को और कौवे को बराबर भाग दे रहा है ! ॥४९॥ भ्राम्यन् पिपासुः पथि मारवे मुहुर्मरीचिकावोचिनिरुद्धनिर्गमे । अम्भोविहीने गहने तपोरयैः पपात सिन्धाविव विक्लवोऽध्वगः ॥५०॥ गर्मी के वेग से गहन, जलविहीन, मारवाड़ के रेतीले मार्ग में, जिसमें से मृगमरीचिका की लहरों के कारण निकलने का कोई चारा नहीं था, घूमता हुआ प्यासा पथिक व्याकुल होकर गिर पड़ा, मानों समुद्र में कूद पड़ा हो ॥५०॥ भ्रान्त्वाऽतिदूरं तरुगुल्मसंवृतं मृगः समासाद्य मितं पयः क्वचित् । आवृत्य तस्थौ तृषितोऽपि कातरां शनैश्चलन्तीं प्रतिपालयन् मृगीम् ॥५१॥ बहुत दूर तक इधर-उधर दौड़धूप करने वाले एक हिरण को किसी झाड़ी के नीचे थोड़ा-सा पानी मिल गया । प्यासा होने पर भी वह धीरे-धीरे चलने वाली (प्यास से) व्याकुल मृगी की प्रतीक्षा करते हुये उस जल को ढक कर बैठ गया ॥५१॥ एकस्य पाथोजदलस्य पार्श्वतो निलीय नेतुं तपतीव्रमातपम् । छायामदीर्घामपि सेवितुं समं रथाङ्गयुग्मं यतते स्म मौग्ध्यतः ॥५२॥ एक कमलदल के पास छिप कर, भयंकर गर्मी को बिताने के लिये, चकवा-चकवी का जोड़ा, मूढ़ता के कारण, उसकी छोटी-सी छाया में बराबर बराबर बैठने का यत्न कर रहा था ॥५२॥ कुञ्जोदरे वा तरुकोटरे वा निलीय कुत्रापि विनीय वासरम् । अस्तं गते घर्मघृणौ शनैः शनैः विनिर्ययौ कौशिकवत् पृथग्जनः ॥५३॥ किसी कुञ्ज के भीतर अथवा किसी वृक्ष की कोटर में छिप कर और किसी प्रकार दिन भर बिता कर, ग्रीष्म ऋतु के सूर्य के अस्त हो जाने पर, तुच्छ पुरुष, उल्लुओं की तरह, धीरे धीरे बाहर निकले ॥५३॥ सूक्ष्मान्तरीये जघने घनस्तनी सहा न वोढुं रशनाकलापकम् । उत्फुल्लमल्लीकुसुमस्त्रजः परं नितम्बशोभां नितरामुपानयत् ॥५४॥ विशाल स्तनवाली कामिनी ने, पतले वस्त्र से शोभित नितम्ब पर करधनी का भार न सह सकने के कारण, विकसित मल्लिका के पुष्पों की माला से ही अपने नितम्ब की शोभा बढ़ाई ॥५४॥ (५३) घर्मघृणौ ग्रीष्मर्तुसूर्ये ।
१७४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् स्वेदोदबिन्दुस्तिमितं मृगीदृशो वपुर्वहन्त्यास्तपतापनिःसहम् । गाढं ललाग स्फुटरागि कञ्चुकं स्वत्याजनत्रस्तमिव स्तनद्वये ॥५५॥ ग्रीष्म की गरमी को न सह सकने वाले सुकुमार शरीर वाली मृगनयनी की पसीने की बूंदों से गीली और इसलिये प्रकटित राग (लाली; अनुराग) वाली चोली, उतार कर फेंक दिये जाने के भय से, स्तनों से कस कर चिपक गई ॥५५॥ ग्रीष्मानुरोधादनुभूय भूपतिः स वारिधारा जलयन्त्रनिर्गताः । वारां विहारैश्चकमे निषेचनं विलासिनीनां करयन्त्रधारया ॥५६॥ ग्रीष्म के कारण राजा ने फौव्वारों से निकलने वाली जल की धाराओं का सेवन करके, जल-क्रीड़ा द्वारा करयन्त्र की धारा से कामिनियों को भिगोने की इच्छा की ॥५६॥ हंसान् हसन्त्यो गमनैरथालसैः सखीकरालम्बनलब्धसाहसाः । पेतुः पतङ्गांशुनिपातकातरास्तरङ्गिणीं त्रस्तकुरङ्गलोचनाः ॥५७॥ अपनी मन्द चाल से हंसों की हंसी उड़ाने वाली और भयभीत हिरणों की सी आँखों वाली तथा सूर्य की किरणों के गिरने से व्याकुल स्त्रियों ने, सखियों के हाथों के सहारे के कारण साहस करके, नदी में प्रवेश किया ॥५७॥ आकर्ण्य तारं कलनूपुरध्वनि पुराङ्गनानां पतगाः सितच्छदाः । आपेतुरुत्तानितदीर्घकन्धराः स्वयूथ्यनादभ्रमतः ससम्भ्रमाः ॥५८॥ उन रमणियों के सुन्दर नूपुरों की उच्च ध्वनि को सुनकर, अपने झुण्डों के शब्द के भ्रम से, सफेद पंखों वाले हंस, चकित होकर और अपनी लम्बी गर्दनें तान कर, आये ॥५८॥ सीमन्तिनीनां कलमेखलारवैर्जितस्वराः सारसपत्रिपंक्तयः । द्रागेव जग्मुः सलिलाशयान्तरं पराभवोद्भूतह्रियैव ताडिताः ॥५९॥ रमणियों की रशनाओं के सारसों के स्वरों को जीतने वाले स्वरों से परास्त होकर सारस पक्षियों की पंक्तियाँ मानों पराजय की लज्जा के कारण शीघ्र जलाशय के भीतर घुस गईं ॥५९॥ दूरादहंपूर्विकया समागतास्तटावधि प्रौढकुतूहलेरिताः । तोयावगाहे क्षणजातसम्भ्रमा नतभ्रुवस्तद्विपरीततां दधुः ॥६०॥ अत्यन्त कुतूहल से प्रेरित हुई रमणियाँ दूर से तट तक तो "मैं पहले चलूँ", "मैं पहले चलूँ" इस प्रकार की स्पर्धा से आईं, किन्तु जल में उतरने के समय, क्षण भर चकित होकर, "तुम पहले उतरो", "तुम पहले उतरो" कहने लगीं ॥६०॥ कामं समर्थापि पुरो नितम्बिनी नितम्बदघ्नेम्भसि साध्वसादिव । हस्तावलम्बे दयितस्य सस्पृहा निवर्तितुं सम्बवृते पराङ्मुखी ॥६१॥ नितम्ब तक आने वाले जल में उतरने के लिये समर्थ होने पर भी कोई कामिनी, प्रियतम के हाथ के सहारे को पाने की इच्छा के कारण, मानों भय से विमुख होकर लौटने लगी ॥६१॥
पञ्चदशः सर्गः १७५ कान्तेन सिक्तं प्रथमं पृथुस्तनी विपक्षमालोक्य विवृद्धवेपथुः । शीतातिरेकं प्रतिपाद्य कोपना जवादुदस्थाज्जलवेणिमध्यतः ॥६२॥ प्रियतम ने पहले सपत्नी पर जल छिड़का, यह देखकर किसी विशाल स्तनवाली कामिनी को क्रोध से रोमाञ्च हो गया और वह काफी सर्दी लगने का बहाना बना कर वेग से जल के प्रवाह से बाहर जाने के लिये उठ खड़ी हुई ॥ ६१ ॥ कान्ताभिषेकाय पुरः समुद्यता भुजद्वयाऽऽन्दोलननर्तितस्तनी । दोर्मूललोलेक्षणमेनमुन्मुखी विलोक्य भूयिष्ठमसिञ्चदक्षिणी ॥६३॥ प्रियतम पर दोनों हाथों से जल फेंकने के कारण भुजाओं के हिलने से नाचने वाले स्तनों वाली रमणी ने जब मुँह उठा कर देखा कि प्रियतम तो उसकी भुजाओं के मूल पर दृष्टि जमाये हैं, तो उसने प्रियतम की आँखों पर गहरा पानी फेंकना प्रारम्भ किया ॥ ६३ ॥ लग्नं कुचे केसरमम्बुजन्मनो विदूरयामीति नखक्षतस्पृशम् । सीत्काररुद्धस्मितमाक्षिपत् प्रियं सरोरुहाक्षी कटुसाचिवीक्षणैः ॥६४॥ 'तुम्हारे स्तन पर कमल का केसर लग गया है, इसे हटा देता हूँ'—यह कहकर नखक्षत का स्पर्श करने वाले प्रियतम पर, कमलनयनी ने, जिसकी मुस्कान को सीत्कार ने रोक दिया था, बनावटी क्रोध से टेढ़ी नजर डाली ॥ ६४ ॥ गत्वा कियद्दूरमुदीक्ष्य कौतुकाद् ग्रहीतुकामा कमलानि कामिनी । आलम्बितुं नालमुदग्रनालकं विदूनपाणिः परिगाढकण्टकैः ॥६५॥ कोई कामिनी कुतूहलवश कमलों को देख कर उनको तोड़ने के लिये कुछ दूर तक गई, किन्तु उठे हुये कमल-नाल के घने काँटों से हाथ छिलने के कारण उसे नहीं पकड़ सकी ॥ ६५ ॥ विम्बाधराक्रान्तिवितीर्णवेदनैर्निरुध्यमाना परितो मधुव्रतैः । त्रासादिव स्रस्तदुकूलमाकुला प्रियं सपत्नीपुरतोपि सस्वजे ॥६६॥ बिम्बाधर पर आक्रमण से कष्ट देने वाले भ्रमरों से चारों ओर घिरी हुई कामिनी ने, जिसका दुकूल गिर गया था, भय से घबरा कर सपत्नी के सामने ही प्रिय का आलिंगन कर लिया ॥ ६६ ॥ कस्याश्चिदम्भःस्नपितं नतभ्रुवः क्षणादसंलक्षितसूक्ष्मकञ्चुकम् । वक्षोजयुग्मं द्रुतहेमपूर्णयोर्ववाह कान्तिं किल काचकुम्भयोः ॥६७॥ किसी सुभ्रू के स्तन, जिनकी पतली चोली, कुछ समय के लिये, पानी से भींग जाने के कारण दिखाई नहीं दे रही थी, पिघले हुये सोने से भरे हुये काच के घड़ों के समान लगे ॥ ६७ ॥ दष्टाधरा मुग्धवधूर्मधुव्रतैः प्रियेण साकूतसहासमीक्षिता । तत्कालयोग्यप्रतिपत्तिकातरा विनष्टबाधेव नतानना स्थिता ॥६८॥ किसी मुग्धा को, जिसके अधर को भ्रमरों ने काट लिया था, प्रियतम ने हँस कर साभिप्राय देखा, इसलिये उस समय क्या करना चाहिये यह न सोच सकने के कारण, वह नीचा मुख करके इस प्रकार खड़ी हो गई मानों उसे पीड़ा ही न हो रही हो ॥ ६८ ॥
१७६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् धारातिपाताच्चकिता कृशोदरी करेण यावत् पिहिताननेक्षणा । तावत् प्रियः पार्श्वगतां तथापरामसिञ्चदाशुस्मितपूर्वमम्बुभिः ॥६९॥ प्रियतम द्वारा फेंके गये जल की अधिक धाराओं के गिरने से चकित कृशोदरी ने जैसे ही अपने हाथों से मुँह और आँखें ढक लीं वैसे ही प्रियतम ने पास में खड़ी दूसरी प्रिया को, मुस्कुरा कर, शीघ्र पानी से सींचना शुरू किया ॥ ६९ ॥ दन्तच्छदं दन्तपदैर्यावकं गतानुलेपौ नखरक्षतैः स्तनौ । रागेण वीताञ्जनमीक्षणद्वयं व्यरोचयद् वारिचयो वरस्त्रियाः ॥७०॥ जिस प्रकार प्रियतम (चुम्बन के समय) प्रिया के अधर की लाक्षादिजन्य लालिमा को अपने दाँतों से हटा देता है, स्तनों के (चन्दन केसर आदि के) लेप को नखक्षत से दूर कर देता है और नेत्रों के अञ्जन को (चुम्बन, करस्पर्श आदि से) मिटा देता है, उसी प्रकार नदी के जल ने भी श्रेष्ठ काम
CC0. In Public Domain, Digitizagtion by eGangotri २३ पञ्चदशः सर्गः १७७ पत्रालिलीना मकरी मृगीदृशां स्तनाचलेभ्यः पतिता ह्रदाम्भसि । रागोपि तावज्जडसङ्गिनोऽङ्गतः प्रसन्नमन्तर्विशति स्म तत्क्षणम् ।।७५।। मृगनयनियों के स्तनों पर चित्रित मकरी स्तनरूपी पर्वतों से सरोवर के जल में कूद पड़ी (मगर जल में रहते ही हैं) । (केसर और चन्दन आदि से) स्तनों पर चित्रित मकराकार चिह्न के जल से धुल जाने पर उसका राग (लालिमा) जल के संग के कारण शरीर से हट कर, उसी समय प्रसन्नतापूर्वक अन्तःकरण में प्रवेश कर गया, जिस प्रकार मूर्ख के साथ संभोग (जडसंग) करते समय विदग्ध नायिका का राग शरीर से हट कर अन्तःकरण में चला जाता है अर्थात् नायक के मूर्ख होने के कारण नायिका का शरीर राग (हावभाव) का प्रदर्शन नहीं करता, केवल अन्तः- करण ही अनुरागपूर्ण रहता है ।। ७५ ।। प्रेम्णा प्रियेणाम्बुजमम्बुजेक्षणकराम्बुजे यत् प्रथमं निवेशितम् । शङ्के तदेवास निवासभूः श्रियस्तदाश्रये श्रीरधिका यतोऽभवत् ।।७६।। पहले पहल कमलनयनी के कर-कमल में प्रियतम ने प्रेम से जो कमल दिया उस कमल में ही मानों लक्ष्मी जी रहती थीं क्योंकि उसको पाकर कमलनयनी की लक्ष्मी (शोभा) अधिक हो गई ।। ७६ ।। कीर्णं क्वचिन्मर्दितपुष्पदामभिः क्वचिच्च किञ्जल्कभरः सरोरुहाम् । पर्याविलं क्वापि हतैर्विलेपनैरभूत् तदम्भः सुदृशां विगाहनात् ।।७७।। उन कामिनियों के स्नान के कारण जल में कहीं तो मसली हुई फूलमालायें बिखर रही थीं, कहीं कमलों के केसर-समूह पड़े थे और कहीं कहीं वह जल घुले हुये लेपों के कारण मटमैला बन गया था ।। ७७ ।। प्रतिप्रतीपं विनिभालयन्ती द्राग् द्राघयन्ती क्वचिदम्बरान्तम् । लग्नाईवस्त्रप्रकटोच्चनीचे निलीयमानेव निजे शरीरे ।।७८।। भुजायुगस्वस्तिकया नितान्तं निपीडितोत्तुङ्कतरस्तनान्ता । काचिद् व्रजन्ती सरितस्तटान्तं कामेऽपि तन्वी तनुते स्म कामम् ।।७९।। जलक्रीड़ा के बाद नदी के प्रवाह से तीर की ओर आने वाली कामिनी, कभी प्रत्येक सपत्नी की ओर (तिरस्कार से) देखती थी, कभी हाथ बढ़ा कर साड़ी को खूब फैला लेती थी ताकि शरीर के अंग दिखाई न दें, गीले वस्त्र के शरीर से चिपक जाने के कारण उसके अंगों का उतार-चढ़ाव स्पष्ट प्रतीत हो रहा था और कभी वह झुक कर लज्जावश इस प्रकार चलती थी मानों अपने शरीर में ही छिप जाना चाहती हो, कभी वह अपने स्तनों को छिपाने के लिये (बायें हाथ को दाहिने कंधे पर और दाहिने हाथ को बायें कंधे पर रख कर) अपने दोनों हाथों को स्वस्तिक के आकार का बनाकर उनसे अपने अत्यन्त उच्च स्तनों के अग्रभाग को खूब दबाती हुई चलती थी; वह कामदेव को भी कामविह्वल बना रही थी ।। ७८-७९ ।। (७८) प्रतिप्रतीपं प्रतीपं प्रतीपं प्रति, एकैकाः सपत्नीः पश्यन्तीत्यर्थः । (७९) भुजायुगस्वस्तिकया स्वस्तिकाकारेण बाहुयुगलेन । Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi
१७८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इतिरचितविहारः पार्थिवः प्रेयसोभिः पयसि ललितलीलापेशलाभिः परीतः । करधृतविशदस्रग्गन्धसाराम्बराभिः परिजनवनिताभिः सेवितं तीरमागात् ॥८०॥ ललित लीला में निपुण प्रेयसियों से घिरे हुये राजा वारिविहार करके नदी के तीर पर चले आये जहाँ परिचारिकायें हाथों में सुन्दर मालायें, चन्दन और वस्त्र लिये खड़ी थीं ॥ ८० ॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये पञ्चदशः सर्गः।
षोडशः सर्गः कालेऽथ शुद्धिमति शूरजनः समृद्धान् पत्नीसु तासु तनयान् जनयाञ्चकार । तेषामभूदधिगुणः किल भोजदेवः प्रासूत पट्टमहिषी कनकावती यम् ।। १ ।। राव सुर्जन ने शुद्ध और शुभ मुहूर्त में अपनी पत्नियों में समृद्ध पुत्र उत्पन्न किये जिनमें पटरानी कनकावती के पुत्र भोजदेव सबसे अधिक गुणवान् थे ।। १ ।। आरुह्य वाजिवरमूर्जितमाजिभूमौ नाराचराजिभिरुपार्जितजैत्रवीर्यः । जाग्रत्प्रगल्भभुजमण्डनमण्डलाग्रव्यग्रीकृतोप्रतरवैरिनृपालवर्गः ।। २ ।। भोजदेव उन्नत और श्रेष्ठ घोड़े पर चढ़ कर युद्ध भूमि में अपनी बाण परम्परा के द्वारा अपने उत्कृष्ट बल को प्रकट करके विजय प्राप्त करते थे और अपनी जागरूक तथा गंभीर भुजाओं को सुशोभित करने वाली तलवार से भयंकर शत्रु राजाओं के समूह को उद्विग्न कर देते थे ॥२॥ संख्येबु यः प्रतिभटक्षितिपालवक्षोविक्षोभजातरुधिरोद्धुरकर्दमाक्तम् । कौक्षेयकं खलु विपक्षम
॥८॥ Wait, look at "दधत्यधिपतेरधिराज्यलक्ष्मीम्": द ध त्य धि प ते र धि रा ज्य ल क्ष्मी म् ॥८॥
Line 9: (अकबर ने रणथंभौर दुर्ग को जीतने के लिये) कुछ यवन वीरों को आज्ञा दी जो अपनी
Line 10: विस्तृत और तेज तलवारों की धार से युद्धभूमि में सैकड़ों बार अपने पराक्रम से विजय प्राप्त कर Wait, look at "युद्धभूमि": in line 10, is it "युद्धभूमि" or "युद्धभमि"? Zoom in on line 10: "य द्ध भ मि" -> wait! Look at the 'भ': there is no 'ू' under 'भ'! It is: "युद्धभमि में सैकड़ों बार" ! Wait, let me look closely at "युद्धभमि": य (ya) with ु (u) and द्ध (ddha) = युद्ध Then भ with म (mi) = भमि or भूमि? Wait, there is no 'ू' stroke below भ! It literally is "युद्धभमि". Let me look really closely. Ah, there is no curve below भ. It looks like "युद्धभमि". But wait, could it be faint? In line 25: "युद्धभूमि" has a clear loop below भ. In line 10: the bottom of भ is flat, no loop at all
षोडशः सर्गः १८१ प्रास्थानिकध्वनिरथोद्धतदुन्दुभीनां भिन्दन्निव प्रतिरवैर्जगदण्डभाण्डम् । आपूरितत्रिदशभूधररन्ध्रमुच्चैर्दिक्चक्रमाक्रमत तत्क्षणमक्रमेण ॥ १३ ॥ तब जोरों से बजाये जाने वाले नगाड़ों के, युद्ध के लिये प्रस्थान की तैयारी की सूचना देने वाले शब्दों ने, अपनी प्रतिध्वनि से मानों ब्रह्माण्ड कटाह को भेद कर, उस समय क्रम का ध्यान न रख कर, सुमेरु पर्वत की गुफाओं को भर कर, जोरों से दिशाओं के समूह पर आक्रमण कर दिया ॥ १३॥ व्यग्रात्मनां निजनिजोचितसंविधानैस्तत्तत्क्रियासु विनियोजयतां जनौघान् । उच्चैः स्वरैस्त्वरयताञ्च पुनः पुनस्तान् कोलाहलः पुनरभूदपरो नराणाम्। १४। जनसमूह को अपने योग्य साधनों द्वारा अपने अपने कार्यों में नियुक्त करने वाले और ऊँचे स्वर में बारवार उनको जल्दी करने की आज्ञा देने वाले व्यस्त अधिकारी-वर्ग का कोलाहल भी सुनाई दे रहा था ॥ १४ ॥ जेतुं पतङ्गतुरगानिव पादयुग्ममुच्चैः क्षिपन्तमसकृद् विधृतं प्रयत्नात् । उच्चैर्जवेन विजितं विनतातनूजं हेषारवैरिव हसन्मुदीर्णदन्तम् ॥ १५॥ पर्याणपीडनपुरस्कृतपीठदेशं कण्ठक्वणत्कनककिङ्किणिकाकलापम् । वल्गागुणग्रहिलपाणिरुपानिनाय तूर्णं तुरङ्गमधिकारिजनः पुरस्तात् ॥ १६॥ सूर्य के घोड़ों को जीतने के लिये मानों अपनी टापें बार बार जोरों से फटकारने वाले, प्रयत्न- पूर्वक रोके जाने वाले, अपने वेग से जीते गये गरुड़ की मानों दाँत निकाल कर हिनहिनाने के बहाने हँसी उड़ानेवाले, कसी हुई काठी से सुसज्जित पीठ वाले और कण्ठ में बजने वाले सोने के घुँघरुओं की माला से सुशोभित घोड़े को लगाम पकड़ कर साईंस शीघ्रता से आगे लाया ॥ १५-१६॥ राकानिशाकरकरोत्करकोमलेन कीर्णेन चामरचयेन विरोचमानम् । स्वर्गापगारुचिरवीचिवितानकेन चित्रं प्रवाहमिव भानुमतः सुतायाः ॥१७॥ घण्टाभिराहितरुचं दधतीभिरुच्चैर्नादान् द्विषत्क्षितिभृतामभिचारमन्त्रान् । माणिक्यमुद्रितसुवर्णमयं किरीटं बिभ्राणमद्रिमुदयं महसामिवेशम् ॥१८॥ अव्याहतस्रुतमदद्रवगन्धलोलैर्झङ्कारिभिर्मधुकरैः श्रवणान्तिकस्थैः । उद्गीयमानमिव दानयशः स्वकीयं शृण्वन्तमर्धमुकुलीकृतलोचनान्तम् ॥१९॥ सिन्दूरबिन्दुचयचित्रितपूर्वभागं नागं महीधरमिवोदितधातुरागम् । आस्तीर्णकम्बलकुथं धृतकेतुमालमाधोरणः प्रमुखमीशितुरानिनाय ॥२०॥ फिर महावत प्रमुख हाथी को राजा के आगे लाया—वह हाथी पूर्णिमा के चन्द्रमा के किरण- समूह के समान कोमल और विस्तृत चँवरों से सुशोभित होने के कारण गंगा की सुन्दर लहरों की भँवरों से शोभित यमुना के प्रवाह के समान लग रहा था, उसके दोनों ओर लटकने वाले घंटे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे और उनके जोर से बजने के कारण जो शब्द निकल रहे थे वे ऐसे लग रहे थे मानों शत्रुराजाओं को नष्ट कर देने वाले अभिचार मंत्र हों, माणिक जड़े हुये सोने के (१८) उदयं बिभ्राणं महसांमीशं सूर्यं बिभ्राणमद्रिमिव किरीटं बिभ्राणं गजमित्यर्थः ।
१८२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् किरीट को धारण करने के कारण वह नवोदित सूर्य को धारण करने वाले उदयाचल पर्वत के समान सुशोभित हो रहा था, निरन्तर बहनेवाले मदजल की गन्ध से आकृष्ट चंचल भ्रमर उसके कानों के पास गूंज रहे थे और वह इस प्रकार शोभित हो रहा था मानों उन भ्रमरों द्वारा गाये जा रहे अपने दानयश (मदजल को भी दान कहते हैं) को आधी आँखें मूंद कर मस्ती से सुन रहा हो, उसका अगला भाग सिन्दूर बिन्दुओं के समूह से चित्रित होने के कारण वह गेरू से शोभित पर्वत के समान लग रहा था, उस पर कम्बल की झूल बिछ रही थी और वह ध्वजदंड से शोभित था ॥ १७—२० ॥ आधोरणप्रहितपाणिमनुग्रहेण स्पृष्ट्वातिकौशलवशादनमन्तमेव । तं बृंहितेन मधुरेण कृतानुमोदं दन्तावलेन्द्रमवनीपतिरारुरोह ॥२१॥ अत्यन्त निपुण होने के कारण राव सुर्जन, हाथी को बिना झुकाये ही, महावत द्वारा प्रसारित हाथ को अनुग्रहपूर्वक छू करं, मधुर चिंघाड़ से अपने ऊपर राजा के बैठने का अनुमोदन करने वाले उस हाथी पर आरूढ़ हुये ॥ २१ ॥ आदर्शाबिम्बमदसीयविशालकीर्तेः क्रीडाभूमिभवनं किल राजलक्ष्म्याः । तस्योपरि स्थिरमराजत दुग्धसिन्धोरावर्तवद् विततवर्तुलमातपत्रम् ॥२२॥ राजा के ऊपर लगा हुआ विस्तृत, गोल और श्वेत छत्र ऐसा सुशोभित हो रहा था मानों राजा की विशाल कीर्ति का शुभ्र दर्पण हो या राजलक्ष्मी का क्रीड़ाभवन हो या क्षीरसागर की स्थिर भँवर हो ॥ २२ ॥ तत्कर्मणि प्रणिहिताः प्रभुणा नियुक्तास्तत्कार्मुकं क्रमविदः करमस्य निन्युः । यत् सङ्गरेषु ददृशुर्गतजीवनाशाः कीनाशकासरविषाणसमं द्विषन्तः ॥२३॥ (शस्त्र देने के) कार्य में स्थापित, स्वामी द्वारा नियुक्त, क्रम को जानने वाले भृत्यों ने राजा के हाथ में वह धनुष अर्पित किया जिसे शत्रु-गण युद्ध में अपने जीवन की आशा छोड़ कर, यमराज के भैंसे के सींग के समान देखते थे ॥ २३ ॥ यत्रार्जवेन न भवेद् गुणवत्वलाभस्तत्र क्वचित् कुटिलतां कत्तिचिद् भजन्ते । बाणासनं यदवनीशकरे तदानीं संवर्तते स्म कुटिलं गुणयोगहेतोः ॥२४॥ जहाँ सीधेपन से गुणलाभ न हो सके वहाँ कोई-कोई कुटिलता से भी लाभ लेते हैं, इसलिये राजा के हाथ में गुणलाभ करने के लिये (प्रत्यञ्चा से युक्त होने के लिये) धनुष कुटिल बन रहा था ॥२४॥ पाणौ पुरैव शुभदेऽहनि या गृहीता कोशान्तरे विनिहिता हितकारिणी या । स्नेहं विना न खलु गच्छति या प्रसादं साऽस्य प्रियाऽसिलतिका सविधे सदैव २५ पहले ही शुभ मुहूर्त में जिसे हाथ में पकड़ा था (जिसका पाणिग्रहण किया था), जिसे कोश (म्यान) के अन्दर रखा था (जिसको कोश अर्थात् खजाना सौंप दिया था), जो सदा हित करने वाली है और जो स्नेह (तेल) के बिना नहीं चमकती (जो प्रेम के बिना प्रसन्न नहीं होती) वह, प्रिया के समान प्रिय तलवार, सदा राव सुर्जन के पास रहती है ॥ २५ ॥ (२३) कीनाशकासरविषाणसमं यमराजमहिषशृङ्गतुल्यम् ।
षोडशः सर्गः १८३ आक्रीडनं वयसि याऽसिलताऽतिपूर्वे या यौवने पुरुषकारविकासहेतुः । या वार्धके खलु भवत्यवलम्बनाय स्वप्नेऽपि तां न खलु मुञ्चति चाहुवाणः॥२६॥ जो तलवार बचपन में खिलौने की तरह है, जो यौवन में पौरुष के विकास का कारण है और जो वृद्धावस्था में सहारे का काम देती है (प्रिया के समान प्रिय) उस तलवार को चौहाण स्वप्न में भी नहीं छोड़ता ॥ २६ ॥ तं वारणस्थितमवारितसन्निधानाः सेवावकाशकलनेष्वथ सावधानाः । जग्मुः प्रणन्तुमनसो युगपत् क्षितीशा वाहैः परस्परविमर्दनयन्त्रिताङ्गैः ॥२७॥ जिनको राजा के समीप जाने में कोई रुकावट नहीं थी और जो सेवाकार्य में सावधान थे वे विनीत मन वाले राजा लोग हाथी पर स्थित राव सुर्जन के साथ साथ उन घोड़ों पर चढ़ कर चले जिनके अंग, समीप समीप चलने के कारण, परस्पर रगड़ खा रहे थे ॥२७॥ प्रत्येकनामपरिकीर्तनपूर्वमुच्चैरावेदितोऽन्तिकचरेण नरेन्द्रसिंहः । नम्रोत्तमाङ्गमुचितप्रतिपत्तिभिस्तं राज्ञां समूगमनुरञ्जयति स्म विज्ञः ॥२८॥ समीपस्थ अनुचर ने राव सुर्जन को प्रत्येक राजा का उच्च स्वर में नाम ले लेकर आवेदन किया और महाराज ने, नतमस्तक होकर प्रणाम करने वाले उस राजसमूह के नमस्कारों का उचित उत्तर देकर, उसे प्रसन्न किया ॥ २८ ॥ माद्यन्मतङ्गजतुरङ्गमपदातिकानां दर्पोद्धतद्रुतगतैर्ध्वनयद् धरित्रीम् । निर्मथ्यमानमकरालयभीमघोषं भूपालपालितबलं युगपच्चचाल ॥२९॥ मदोत्कट हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकों की दर्पोद्धत और तेज चाल से पृथ्वी को हिलाती हुई और मथित समुद्र के समान भयंकर घोष करती हुई वह राजसेना एक साथ चली ॥ २९ ॥ तत्सैन्यनिर्भरभराद् भुजगाधिनाथे त्रासान्मुमुक्षति महीमुदितप्रकम्पे । कूर्मः कटाहकुहरान्मुखमुन्नमय्य ब्रह्माण्डभङ्गचकितः परितो ददर्श ॥३०॥ उस सेना के भारी भार के कारण कम्पित होकर शेषनाग ने पृथ्वी को छोड़ देने की इच्छा की तो कच्छप भगवान् अपनी ढाल में से मुंह बाहर निकाल कर ब्रह्माण्ड भंग से चकित हुये चारों ओर देखने लगे ॥ ३० ॥ मन्दोल्लसत्पवनसङ्गतंरङ्गितान्ता व्योमस्पृशो रुरुचिरे रुचिराः पताकाः । तद्वैरिणां कवलनाय कृतोद्यमस्य कालस्य लोलरसना इव दिक्षु कीर्णाः ॥३१॥ मन्द मन्द चलने वाले वायु से हिलती हुई आकाश को छूने वाली सुन्दर पताकायें इस प्रकार शोभित हो रहीं थीं मानों राजा के शत्रुओं को खाने के लिये उद्यमशील काल की दिशाओं में फैलाई हुई चंचल जीभें हों ॥ ३१ ॥ मुक्ताः कुतूहलवशात् क्षणमश्ववारै र्वाहाः स्म भान्ति विशिखा इव सञ्चरन्तः । येषां यतां रयवशाद् घनवर्त्मनीव स्पर्शो भुवः खुरपदैरनुमीयते स्म ॥३२॥ कुतूहलवश थोड़ी देर के लिये सवारों से ढीले छोड़ दिये जाने पर घोड़े तीर की तरह छूट पड़े; वेग से दौड़ने के कारण ऐसा लगता था मानों वे आकाश में ही उड़ रहे हों, केवल उनके खुरों के चिह्नों से यह अनुमान लगाया जाता था कि वे भूमि का स्पर्श भी करते थे ॥ ३२ ॥ ୨
१८४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शिक्षाविशेषवशतस्तुरगाधिरूढैरापादिताः सपदि मण्डलिकां तुरङ्गाः । जाम्बूनदाभरणकर्बुरितास्तदानीमालातचक्रधिषणां दधिरे न कस्य ॥३३॥ शिक्षा विशेष के कारण सवारों ने घोड़ों को गोल घेरे में दौड़ाया; उस समय सोने के आभूषणों से सज्जित घोड़े जलती हुई और चारों ओर घुमाई जाने वाली मशाल के घेरे की बुद्धि उत्पन्न कर रहे थे ॥ ३३ ॥ यानक्रमादतिनिरन्तरतामुपेतौ द्वौ सादिनौ प्रणयसङ्कथनेन यान्तौ । घ्रात्वा परस्परमुखं क्षणतो हयाभ्यां साक्षेपनादमथ दूरमनायिषाताम् ॥३४॥ साथ साथ चलने के कारण अत्यन्त समीप आये हुये दो सवार परस्पर प्रेमालाप करते हुये जा रहे थे, किन्तु उनके घोड़ों ने शीघ्र एक दूसरे का मुंह सूंघ कर आक्षेप के साथ हिनहिना कर उन्हें दूर कर दिया ॥ ३४ ॥ दैवादुपेत्य बडवाधिरुहं तुरङ्गी कश्चित् पथि प्रतिहतप्रसरावकाश
२४ षोडशः सर्गः १८५ श्यामद्युतः पिदधतो हरितां मुखानि विष्वग्विसारिमदवारिझरं क्षरन्तः । वातेरिता इव नवीनघनाः सनादमीयुर्महीधरनिभा महिता महेभाः ॥३९॥ काली कान्ति वाले, दिशाओं के मुखों को ढाँकने वाले, चारों ओर विस्तृत मदजल की झड़ी लगाने वाले, पर्वतों के समान बड़े बड़े हाथी, वायु से प्रेरित नये मेघों के समान, गरजते हुये चले ॥ ३९ ॥ उत्तंसितोज्वलविचित्रपतत्रिपत्रा गाढोपगूहितकटीधृतकिंकिणीकाः । आस्फालितप्रहरणाः प्रथितस्वदर्पा जग्मुः समुद्धतगतेन पदातिमुख्याः ॥४०॥ (मयूर आदि) पक्षियों के उज्ज्वल और रंग बिरंगे पंखों को सिर पर लगाकर, घुंघरुओं की माला को कमर में अच्छी तरह बाँध कर, अपने अभिमान को प्रकट करने वाले पैदल सैनिक शस्त्रों पर हाथ फेरते हुये उद्धत चाल से चल रहे थे ॥ ४० ॥ वल्गान्तविस्फुरितशोणितसङ्गिफैनैरश्वैः श्वसद्भिरुपकूलमथापगायाः । भालेषु रेणुभरकर्दमितं वहन्तः स्वेदोदबिन्दुलहरीं ययुरश्ववाराः ॥४१॥ लगाम के कोने की रगड़ से निकले हुये खून के कारण लाल फेन वाले हाँफते हुये घोड़ों पर बैठे हुये सवार अपने ललाटों पर पसीने की लहरों को, जो (टापों से उड़ी हुई) धूल के कारण कहीं कहीं कीचड़ की तरह बन गई थी, धारण करते हुये, नदी के किनारे किनारे जा रहे थे (नदी की भाँति सवार भी फेन, कीचड़ और लहरों से युक्त थे) ॥ ४१ ॥ उच्चैस्तया गतमिवान्तिकमुष्णरश्मेः पादैर्नितान्तपरुषैः परितापिताङ्गम् । नैसर्गिकीं गतिमपास्य मुहुर्जवेन रोधो रुरोध करियूथमथापगायाः ॥४२॥ ऊँचाई के कारण सूर्य को छूने वाले और सूर्य की अत्यन्त कड़ी किरणों से संतप्त अंगों वाले हाथियों के समूह ने, अपनी स्वाभाविक धीमी चाल छोड़ कर, वेग से नदी का तट घेर लिया ॥४२॥ पारं प्रयातमनसं सवरूथिनीकमालोक्य तत्र सरितो मनुजाधिनाथम् । आनायिभिर्द्रुतमन्यायिषत प्रकामं स्फारास्ततस्तरणयः स्थिरकर्णधाराः ॥४३॥ राजा को सेनासहित नदी के पार जाने का इच्छुक देख कर मल्लाह शीघ्र बड़ी बड़ी विस्तृत नौकायें ले आये जिनमें केवट बैठे हुये थे ॥ ४३ ॥ नीतोऽपि पारगमनाय गुरुप्रयत्नात् तीरस्थ एव परिपीतपयः प्रमत्तः । नाशु व्यगाहत करी गहनं ह्रदाम्भस्तप्तोऽपि तप्तकिरणस्य करैः कठोरैः ॥४४॥ एक प्रमत्त हाथी खूब जल पीकर तीर पर ही खड़ा रहा; यद्यपि महावत बड़े प्रयत्न से उसे चलने के लिये प्रेरित कर रहा था और वह स्वयं भी सूर्य की प्रचण्ड किरणों से सन्तप्त हो रहा था, तो भी वह नदी के गहरे जल में शीघ्रता से नहीं घुसा ॥ ४४ ॥ आधोरणान् मदवशादवधीरयन्तः स्तब्धाः क्षणं तटमधि द्विरदा मदान्धाः । उत्तेजितास्तरलिताः परतीरगर्जन्मत्तापरद्विरददुःसहदानगन्धैः ॥४५॥ उत्कट मद के कारण महावतों की अवज्ञा करके मदान्ध हाथी स्तब्ध होकर कुछ देर तक तट पर ही खड़े रहे, किन्तु सामने के तट पर चिंघाड़ते हुये मत्त शत्रु-हाथियों के मदजल की दुःसह गन्ध को सूँघने के कारण उत्तेजित होकर नदी के पार चले गये ॥ ४५ ॥
ग)!! IT IS AN EXACT, 100% PERFECT VASANTATILAKA METER! Let's check the letters again: स्ते (1) ह (2) स्त (3) -> wait, is it 'हस्त'? Wait, 'हस्त' doesn't mean anything with 'रङ्गततरलां' unless... wait, what word starts with 'हस्त'? Wait! Could it be "स्तेहस्तरङ्गततरलां"? Wait, why "हस्तरङ्गततरलां"? Or is it "स्तेऽस्तरङ्गततरलां"? Wait, if it's "ऽस्त", then syllable 2 is missing! Syllable 2 MUST exist for the meter to have 14 syllables! If it's 'ह', then ह is syllable 2! Wait, look at that letter: it has a top bar, then down-right curve, loop... wait, is it 'ह'? Wait! Could it be 'ऽह'? No. Could it be 'सह'? Wait, look at the letter before 'स्त': It is 'ह'! Wait, why 'हस्तरङ्गततरलां'? Wait, could it be "उत्तस्तरङ्गततरलां"? No, the first letter is 'ह' or 'अ' or 'उ'? Wait, look at the Hindi: "लहरों से चञ्चल नदी को तैर गये". "तैर गये" = what verb? Wait! Where
षोडशः सर्गः १८७ संसारवेणिमिवशुद्धगुरुपदिष्टविद्याभिरुद्यमविशेषभृतो विविक्ताः । उत्तेरुरातरमतित्वरयाऽतिरिक्तं केचिद् वितीर्य तरिभिः सरितं सुखेन ॥५२॥ जिस प्रकार विवेकी पुरुष, विशेष उद्यम करके, सद्गुरु से उपदिष्ट शुद्ध विद्याओं द्वारा इस संसारप्रवाह को सुखपूर्वक पार कर जाते हैं, उसी प्रकार कुछ लोगों ने, जल्दी के कारण अधिक खेवाई देकर, नावों द्वारा उस नदी को सुखपूर्वक पार कर लिया ॥ ५२ ॥ आवेष्टय मौलिवसनेन धनुः सतूगं सव्येतरेण च करेण शिरोऽवलम्ब्य । एकेन कश्चन करालत रङ्गमालां दोष्णा नुदन्नतिबलस्तरति स्म दूरम् ॥५३॥ तरकस के साथ धनुष को अपनी पगड़ी से पीठ पर बाँध कर और दाहिने हाथ से सिर को सहारा देकर, एक वीर सैनिक केवल बायें हाथ से ही भीषण लहरों वाली नदी को दूर तक तैर गया ॥ ५३ ॥ निर्माय कश्चिदुडुपं दृढबन्धनाढ्यमारोप्य तत्र दयितां दरकम्पिताङ्गीम् । व्यावृत्त्य कातरमुखं मुहुरेतदीयं पश्यन् गुणार्पितकरः शनकैस्ततार ॥५४॥ कोई दृढ़ बन्धन से युक्त छोटी सी नाव बना कर और उस पर भय से कम्पित शरीर वाली प्रिया को बैठा कर तथा रस्सी पकड़ कर, प्रिया के कातर मुख को बार बार देखता हुआ, धीरे धीरे पार चला गया ॥ ५४ ॥ तीर्त्वेत्थं तटिनीं [.....]हैरंलिहिंराकुला— [....]र्ती मनुजाधिपः पृतनया प्रीतिप्रफुल्लाननः । उद्दण्डाऽहितचण्डडिण्डिमरवेरुज्जृम्भमाणत्वरः सम्प्राप्तः पृथुपौरुषः पुरमसौ पौरान् समुल्लासयन् ॥५५॥ प्रेम से प्रसन्न मुख वाले और सेना से घिरे हुये राजा सुर्जन ने इस प्रकार मेघों को छूने वाली बड़ी-बड़ी लहरों से व्याकुल नदी को पार किया और उद्धत शत्रुओं के प्रचण्ड वाद्यों के शब्दों को सुन कर जल्दी चलने वाले महान् पराक्रमी राजा, नागरिकों को प्रसन्न करते हुये, अपने (रणथं- भौर) नगर में पहुँच गये ॥ ५५ ॥ ॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये षोडशः सर्गः ॥
(५२) आतरस्तरपण्यम् ।
सप्तदशः सर्गः अथापरेद्युः परदर्पहन्ता सन्नह्य सैन्यैरविषण्णचेताः । युद्धाय बद्धातिशयप्रयत्नः सपत्नसेनाभिमुखं प्रतस्थे ॥ १ ॥ फिर दूसरे दिन, शत्रुओं के अभिमान को चूर करने वाले राव सुर्जन कवच इत्यादि से सुस- ज्जित होकर, सेना को साथ लेकर, अव्यग्र मन से, युद्ध के लिये अधिक प्रयत्नशील होकर, शत्रुसेना के सम्मुख चले ॥ १ ॥ तस्य प्रयातुः पटहप्रणादाश्चमूरचोद्भूतनधूलयश्च । समं पुरोऽवस्थितशात्रवाणां श्रोत्राणि नेत्राणि च रुन्धते स्म ॥ २ ॥ उनके प्रयाण के समय बजने वाले नगाड़ों के शब्दों ने और उनकी सेना से उड़ने वाली धूल ने सामने स्थित शत्रुओं के कानों और आँखों को एक साथ आक्रान्त किया ॥ २ ॥ दिशोभिमानं किमु किन्नु तासां पर्यन्तमव्याहतमश्नुवानम् । विलङ्घ्य किं ताः स्थितमस्तपारं विलोकयामास बलं स शत्रोः ॥ ३ ॥ उस शत्रुसेना को, जो चारों
सप्तदशः सर्गः १८९ घण्टानिनादैरुपबृंहितेन दिग्वारणश्रोत्रविदारणेन । आधोरणस्फालनदीपितानां मदद्विपानां घनबृंहितेन ॥ ८ ॥ घोणारवैर्घुर्रघुरिकानिनादैस्तुरङ्गमाणां गुरुहेषितेन । बाहू समास्फोटयतां भटानामत्युद्भटैरारभटीनिनादैः ॥ ९ ॥ आग्नेययन्त्रैः पततामजस्रमुदर्चिषामायसगोलकानाम् । निर्घातपातप्रतिमैश्च घोषैर्नादैकरूपं जगदादधानम् ॥१०॥ दिग्गजों के कानों को फाड़ने वाली तथा घंटों के शब्दों से बढ़ी हुई, महावतों के चलाने से उत्तेजित मदोत्कट हाथियों की भयंकर चिंघाड़ों से, नाक से 'घुर्घुर' शब्द करने वाले घोड़ों के जोरों से हिनहिनाने से, भुजाओं को फटकार कर ताल ठोकने वाले प्रबल वीरों के उद्धत शब्दों से और तोपों से लगातार निकलने वाले जलते हुये लोहे के गोलों के जोरों से गिरने से वह शत्रुसेना जगत् को नादमय बना रही थी (जगत् नादब्रह्म से निकला है) ॥ ८-१०॥ ततः शरौघाः परवीरचक्रात् निश्चक्रमुः सस्वनमक्रमेण । धारा इवाम्भोधरविप्रकीर्णा वातेन तिर्यग्गतिमश्नुवानाः ॥११॥ इसके बाद शत्रुवीरों के समुदाय से, बिना क्रम के, जोरों के शब्दों के साथ बाणवृष्टि होने लगी जो बादलों से बरसने वाली और वायुवेग के कारण टेढ़ी बनी हुईं धारावृष्टि के समान लग रही थी ॥ ११ ॥ चमूरमुष्यापि [समृद्धिम]न्तः समं समाक्रान्तवती विपक्षान् । अजिह्मगैर्जिह्मगतुल्यरूपैस्तेषां पृषत्काऽलिमपार्थयद्भिः ॥१२॥ समृद्ध[बल] वाले राव सुर्जन की सेना ने भी उसी समय शत्रुओं पर आक्रमण किया और सर्पों के समान ल[म्बे] वाले बाणों से शत्रुओं के बाणसमूह को बेकार कर दिया ॥ १२ ॥ स्वसम्मुखं सञ्च[र]तोस्तदानीमनीकयोः सङ्गररङ्गभाजोः । [द्व]योः क्षणादैक्यमभूद् यथाम्भःप्रवाहयोः प्रावृषि तीव्रवेगात् ॥१३॥ युद्धभूमि में एक दूसरे के सामने लड़ने वाली उन दोनों सेनाओं का कुछ देर के लिये ऐक्य हो गया जैसे वर्षा ऋतु में दो तरफ से बहने वाले जलप्रवाहों का मेल हो जाता है ॥१३॥ नभःस्थितं तावदरुद्ध युद्धे रजोन्धकारोऽरुणमग्रतो यः । भूमिं स्थितस्तं भटशोणितोत्थः परो न्यरौत्सीदरुणः प्रवाहः ॥१४॥ उस युद्ध में धूल के अन्धकार ने ऊपर उड़ कर आकाश में स्थित सूर्य को घेर लिया ; तब वीरों के भूमिस्थ रुधिर प्रवाह ने उस धूल के अन्धकार को घेर लिया । (सेना से उड़ी हुई धूल ने आकाश में जाकर सूर्य को ढाँक दिया और युद्धभूमि में बहने वाले वीरों के रक्तप्रवाह ने उस धूल को नीचे बिठा दिया) ॥१४॥ (१२) अजिह्मगाः बाणाः जिह्मगाः सर्पाः ।
१९० सुर्र्जनचरितमहाकाव्यम् रजस्तमोद्धतरावकाशे जगत्यनासाद्य पदं कुतश्चित् । विवेश सत्वं सुतरां भटानां स्वतन्त्रमन्तःकरणं तदानीम् ॥१५॥ उस समय जगत् रजस् (धूल) के तमस् (अन्धकार) से घिर रहा था, अतः सत्व (सत्व गुण; बल) रजस्तमोमय (रजोगुण और तमोगुण से आक्रान्त; धूल के अन्धकार से युक्त) संसार में कहीं स्थान न पाकर, वीरों के स्वतन्त्र अन्तःकरणों में प्रवेश कर गया अर्थात् वीरों के हृदयों में बल का संचार हो गया ॥१५॥ आकृष्य दूरं गुणमाशु मुक्ते विनिर्गतेऽङ्गानि विभिद्य बाणे । अपारिता वाचयितुं परेण वृथा बभूवुर्भटनामवर्णाः ॥१६॥ ज्या को दूर तक खींच कर शीघ्रता से छोड़े गये बाण के शत्रु के अंगों के भेद कर बाहर निकल जाने के कारण शत्रु उस वीर के नाम के उस बाण पर खुदे हुये अक्षरों को न पढ़ सका और वे अक्षर व्यर्थ ही रहे ॥१६॥ पुरः परेण क्षिपता शिरस्त्रमाकङ्कपत्रं निटले निखातः । पुंसः परावृत्तिपराङ्मुखस्य शरः किरीटस्य चकार कान्तिम् ॥१७॥ किसी शत्रु का बाण एक वीर के ललाट में इतना अन्दर घुस गया कि उसकी जड़ ही बाहर रही, फिर भी वह वीर युद्ध में सामने ही डटा रहा और उस बाण का बाहर दिखाई देने वाला मूल- भाग उस वीर, के मस्तक पर किरीट के समान कान्ति को करता रहा ॥१७॥ मर्मातिगेनाऽहितमार्गणेन विभिन्नमर्मा न चचाल कश्चित् । सम्वर्मयामास वपुर्विशङ्कः स्वाभाविकेनैव हि साहसेन ॥१८॥ शत्रु के मर्मस्पर्शी बाणों से किसी वीर का कवच छिन्न भिन्न हो गया, फिर भी वह वीर युद्ध में डटा रहा और निःशंक होकर उसने अपने शरीर को अपने स्वाभाविक साहस के कवच से सुशोभित किया ॥१८॥ निरुन्धति व्योमनि मार्गमह्नो निरङ्कुशे रेणुकृतान्धकारे । आनन्दसान्द्रस्मितचन्द्रिकाभिव्यक्तं प्रवीरस्य मुखं व्यलोकि ॥१९॥ उद्धत धूल ने दिन के मार्ग को रोक कर आकाश को व्याप्त कर लिया, फिर भी आनन्द की घनी मुस्कान रूपी चाँदनी में किसी वीर का मुख स्पष्ट दिखाई दिया ॥१९॥ संयोज्यमाने विशिखेन चापे विलूनशीर्षोपि शरेण सद्यः । कबन्धभावेऽपि तथैव कश्चिद् विदूरमाकृष्य मुमोच बाणम् ॥२०॥ कोई वीर अपने धनुष पर बाण चढ़ा ही रहा था कि शत्रु ने उसका सिर काट गिराया, फिर भी उस वीर के कबन्ध (रुंड) ने ही उस बाण को दूर तक खींच कर छोड़ा ॥२०॥ (१७) आकंकपत्रमुपमूलं यावत् ।
सप्तदशः सर्गः १९१ प्रणोदितानां सरयं शराणामन्योन्यसंघट्टभवो हुताशः । लग्नः पताकासु ततान दूरादुल्काविकासभ्रममभ्रसीम्नि ॥२१॥ वेग से छोड़े गये बाणों के परस्पर संघर्ष से जो अग्नि उत्पन्न हुई वह पताकाओं में लग कर आकाश में दूर से ऐसी लगी मानों कोई तारा टूट रहा हो ॥२१॥ नीतं नभः शत्रुशरै र्विलूनं शिरः प्रवीरस्य विरोचते स्म । गतं किमु व्योमसदां वधूनां विधूयमानाननचुम्बनाय ॥२२॥ शत्रुओं के बाण से काटा गया और आकाश में उछाला गया किसी वीर का सिर इस प्रकार शोभित हुआ मानों वह स्वर्ग की अप्सराओं के हिलते हुये मुख को चूमने के लिये गया हो (युद्ध में काम आने वाले वीरों को वरने के लिये अप्सरायें आती हैं) ॥२२॥ नितान्तनिस्वाद्यतया पिशाचा रक्तं स्रवन्तीमविगाहमानाः । अस्रं पपुः पाणितलोपगूढकृत्तेभशुण्डाविवरैर्विदूरात् ॥२३॥ पिशाचगण उस अत्यन्त स्वादिष्ट रक्त को रक्त-नदी में बिना घुसे ही दूर से, हाथियों की कटी हुई सूंडों के छेदों से पी रहे थे ॥२३॥ आसन्नगाधेऽस्रसरित्प्रवाहे कृत्तद्विपाः कुत्रचिदन्तरौपाः । ददर्श येषु स्थितमेत्य कालः क्रव्याशिनां वारिविहारलीलाः ॥२४॥ रक्तासवास्वा[द...] क्रव्याद्वधूगीतसमानकालम् । वेतालकान्ता[कर...]कृतानुबन्धान् नटतः कबन्धान् ॥२५॥ उस अगाध प्रवाह वाली रक्त नदी में मरे हुये हाथी टापुओं की तरह लग रहे थे जिन पर चढ़ कर [साक्षात्] काल मांसभक्षियों की (रक्त-नदी में) जलक्रीड़ायें देख रहा था—पिशाचों की स्त्रियाँ खून-रक्तमदिरा पीकर मस्त होकर गीत गा रही थीं और वेताल स्त्रियाँ तालियाँ बजा रही थीं जिनके ताल पर कबन्ध (रुंड) नाच रहे थे ॥२४-२५॥ [मांसा]शया शोणितपङ्करुद्धं मौलिस्थमाणिक्यदलं निगीर्य । लग्नं [गले] गाढमथोज्जिगीषुर्व्यग्रा शिवा तीव्रतरं ववाशे ॥२६॥ रुधिर रूपी कीचड़ में सने हुये किसी वीर के शिरोभूषण में जड़े हुये माणिक-समूह को मांस समझ कर एक गीदड़ी (शृगाली) उसे निगलने लगी, किन्तु वह गले में जाकर गहरा फँस गया और विचारी गीदड़ी व्याकुल होकर बुरी तरह चिल्लाने लगी ॥२६॥ ततः परं वीक्ष्य विपक्षसैन्यैः पताकिनीं विक्लवितां स्वकीयाम् । अवातरद् वातरयं तुरङ्गममारूढवान् शूरजनो रणाय ॥२७॥ इसके बाद अपनी सेना को शत्रु सेनाओं द्वारा व्याकुल देख कर राव सुर्जन पवन के समान वेगशील घोड़े पर चढ़कर युद्धभूमि में कूद पड़े ॥२७॥ (२६) ववाशे चीञ्चकार ।
१९२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मौर्वीरवेण व्रणयन्नरातिश्रोत्राणि स त्राणकरो नतानाम् । अगाहताऽगाधबलं बलीयान् यथाम्बुराशिं प्रथमो वराहः ॥२८॥ विनीत पुरुषों की रक्षा करने वाले बलवान् राव सुर्जन अपने धनुष की ज्या की टंकार से शत्रुओं के कानों को घायल करते हुये, शत्रुओं की अपार सेना में उसी प्रकार घुस पड़े जिस प्रकार आदिवराह (वराहावतार) अथाह समुद्र में (पृथ्वी का उद्धार करने के लिये) घुस गये थे ॥२८॥ निषङ्गसङ्गत्वरमेकमन्यं करं धनुःस्थं श्रवणस्थमन्यम् । मौर्वीषयोगे परमेकदेनं पश्यंश्चतुर्बाहुममंस्त लोकः ॥२९॥ उस समय ऐसा प्रतीत होता था कि मानों राव सुर्जन का एक हाथ तरकस से जल्दी जल्दी बाण निकालने में लगा है, दूसरा हाथ धनुष को पकड़े है, तीसरा हाथ प्रत्यंचा को कान तक खींच रहा है और चौथा हाथ प्रत्यंचा पर चढ़े हुये बाण को छोड़ रहा है—ऐसी प्रतीति होने के कारण उन चतुर्बाहुमान् (चौहाण) वीर सुर्जन को लोगों ने उस समय वास्तव में चतुर्बाहुमान् (चतुर्भुज) ही समझा ॥२९॥ अपीडयन् म्लेच्छभटानभीक्ष्णं तीक्ष्णाः पृषत्काः प्रभुणा विमुक्ताः । जन्तूनिव प्रान्तरसीमसंस्थान् वर्षोपलास्तोयधरेण नुन्नाः ॥३०॥ राजा द्वारा छोड़ें गये तीक्ष्ण बाण उन यवन वीरों को उसी तरह बराबर पीड़ा देते रहे, जिस तरह मेघ द्वारा बरसाये गये ओले दूर निर्जन भयरहित स्थान की सीमा में रहने वाले (छोटे-छोटे) प्राणियों को पीड़ित करते हैं ॥३०॥ व्ययोजयन् कांश्चन जीवनेन बाणास्तदानीं यवनवीरान् । कल्पावसानोदितचण्डभानोः स्फुरन्मयूखा इव जीवलोकान् ॥३१॥ उनके बाणों ने कई यवनवीरों को अपने प्राणों से वियुक्त कर दिया, जैसे प्रलय के समय उदित प्रचण्ड सूर्य की तीव्र किरणें जीवों को प्राणों से वियुक्त कर देती हैं ॥३१॥ आयामवत्श्मश्रुशिरस्त्रभाञ्जि शिरांसि तेषां रुधिरापगासु । स्वच्छन्दमास्कन्द्य निषेदिवांसः सुखेन खेलां दधति स्म गृध्राः ॥३२॥ लम्बी चौड़ी दाढ़ी और शिरस्त्राणों से युक्त उन यवनों के रुधिर की नदियों में पड़े हुए सिरों पर फैल पसर कर आराम से बैठे हुये गिद्ध सुखपूर्वक खेल रहे थे ॥३२॥ अजिह्मगानामपि नाम तेषां तत्कर्तृकं मोचनमेव युक्तम् । गुणाश्रयं दर्शितपक्षपातं कुर्वन्ति येऽमी परभेदहेतोः ॥३३॥ यद्यपि वे 'अजिह्मग' (बाण; सरल) थे तो भी राजा के लिये उनको छोड़ देना ही उचित था क्योंकि वे 'पक्षपात' (पक्ष अर्थात् बाण के पिछले भाग के साथ गिर कर; किसी पक्ष का अनु- चित समर्थन) दिखला कर दूसरों को भेदने के लिये (पीड़ा देने के लिये) ही 'गुण' (प्रत्यञ्चा.; गुण) का आश्रय लेते थे ॥३३॥ (३०) प्रान्तरसीमसंस्थान् दूरशून्यमार्गसीम्नि स्थितान् । (३३) तत्कर्तृकं राज्ञा कृतमित्यर्थः ।