सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशः सर्गः अथापरेद्युः परदर्पहन्ता सन्नह्य सैन्यैरविषण्णचेताः । युद्धाय बद्धातिशयप्रयत्नः सपत्नसेनाभिमुखं प्रतस्थे ॥ १ ॥ फिर दूसरे दिन, शत्रुओं के अभिमान को चूर करने वाले राव सुर्जन कवच इत्यादि से सुस- ज्जित होकर, सेना को साथ लेकर, अव्यग्र मन से, युद्ध के लिये अधिक प्रयत्नशील होकर, शत्रुसेना के सम्मुख चले ॥ १ ॥ तस्य प्रयातुः पटहप्रणादाश्चमूरचोद्भूतनधूलयश्च । समं पुरोऽवस्थितशात्रवाणां श्रोत्राणि नेत्राणि च रुन्धते स्म ॥ २ ॥ उनके प्रयाण के समय बजने वाले नगाड़ों के शब्दों ने और उनकी सेना से उड़ने वाली धूल ने सामने स्थित शत्रुओं के कानों और आँखों को एक साथ आक्रान्त किया ॥ २ ॥ दिशोभिमानं किमु किन्नु तासां पर्यन्तमव्याहतमश्नुवानम् । विलङ्घ्य किं ताः स्थितमस्तपारं विलोकयामास बलं स शत्रोः ॥ ३ ॥ उस शत्रुसेना को, जो चारों