सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशः सर्गः १८७ संसारवेणिमिवशुद्धगुरुपदिष्टविद्याभिरुद्यमविशेषभृतो विविक्ताः । उत्तेरुरातरमतित्वरयाऽतिरिक्तं केचिद् वितीर्य तरिभिः सरितं सुखेन ॥५२॥ जिस प्रकार विवेकी पुरुष, विशेष उद्यम करके, सद्गुरु से उपदिष्ट शुद्ध विद्याओं द्वारा इस संसारप्रवाह को सुखपूर्वक पार कर जाते हैं, उसी प्रकार कुछ लोगों ने, जल्दी के कारण अधिक खेवाई देकर, नावों द्वारा उस नदी को सुखपूर्वक पार कर लिया ॥ ५२ ॥ आवेष्टय मौलिवसनेन धनुः सतूगं सव्येतरेण च करेण शिरोऽवलम्ब्य । एकेन कश्चन करालत रङ्गमालां दोष्णा नुदन्नतिबलस्तरति स्म दूरम् ॥५३॥ तरकस के साथ धनुष को अपनी पगड़ी से पीठ पर बाँध कर और दाहिने हाथ से सिर को सहारा देकर, एक वीर सैनिक केवल बायें हाथ से ही भीषण लहरों वाली नदी को दूर तक तैर गया ॥ ५३ ॥ निर्माय कश्चिदुडुपं दृढबन्धनाढ्यमारोप्य तत्र दयितां दरकम्पिताङ्गीम् । व्यावृत्त्य कातरमुखं मुहुरेतदीयं पश्यन् गुणार्पितकरः शनकैस्ततार ॥५४॥ कोई दृढ़ बन्धन से युक्त छोटी सी नाव बना कर और उस पर भय से कम्पित शरीर वाली प्रिया को बैठा कर तथा रस्सी पकड़ कर, प्रिया के कातर मुख को बार बार देखता हुआ, धीरे धीरे पार चला गया ॥ ५४ ॥ तीर्त्वेत्थं तटिनीं [.....]हैरंलिहिंराकुला— [....]र्ती मनुजाधिपः पृतनया प्रीतिप्रफुल्लाननः । उद्दण्डाऽहितचण्डडिण्डिमरवेरुज्जृम्भमाणत्वरः सम्प्राप्तः पृथुपौरुषः पुरमसौ पौरान् समुल्लासयन् ॥५५॥ प्रेम से प्रसन्न मुख वाले और सेना से घिरे हुये राजा सुर्जन ने इस प्रकार मेघों को छूने वाली बड़ी-बड़ी लहरों से व्याकुल नदी को पार किया और उद्धत शत्रुओं के प्रचण्ड वाद्यों के शब्दों को सुन कर जल्दी चलने वाले महान् पराक्रमी राजा, नागरिकों को प्रसन्न करते हुये, अपने (रणथं- भौर) नगर में पहुँच गये ॥ ५५ ॥ ॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये षोडशः सर्गः ॥
(५२) आतरस्तरपण्यम् ।