सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशः सर्गः १८९ घण्टानिनादैरुपबृंहितेन दिग्वारणश्रोत्रविदारणेन । आधोरणस्फालनदीपितानां मदद्विपानां घनबृंहितेन ॥ ८ ॥ घोणारवैर्घुर्रघुरिकानिनादैस्तुरङ्गमाणां गुरुहेषितेन । बाहू समास्फोटयतां भटानामत्युद्भटैरारभटीनिनादैः ॥ ९ ॥ आग्नेययन्त्रैः पततामजस्रमुदर्चिषामायसगोलकानाम् । निर्घातपातप्रतिमैश्च घोषैर्नादैकरूपं जगदादधानम् ॥१०॥ दिग्गजों के कानों को फाड़ने वाली तथा घंटों के शब्दों से बढ़ी हुई, महावतों के चलाने से उत्तेजित मदोत्कट हाथियों की भयंकर चिंघाड़ों से, नाक से 'घुर्घुर' शब्द करने वाले घोड़ों के जोरों से हिनहिनाने से, भुजाओं को फटकार कर ताल ठोकने वाले प्रबल वीरों के उद्धत शब्दों से और तोपों से लगातार निकलने वाले जलते हुये लोहे के गोलों के जोरों से गिरने से वह शत्रुसेना जगत् को नादमय बना रही थी (जगत् नादब्रह्म से निकला है) ॥ ८-१०॥ ततः शरौघाः परवीरचक्रात् निश्चक्रमुः सस्वनमक्रमेण । धारा इवाम्भोधरविप्रकीर्णा वातेन तिर्यग्गतिमश्नुवानाः ॥११॥ इसके बाद शत्रुवीरों के समुदाय से, बिना क्रम के, जोरों के शब्दों के साथ बाणवृष्टि होने लगी जो बादलों से बरसने वाली और वायुवेग के कारण टेढ़ी बनी हुईं धारावृष्टि के समान लग रही थी ॥ ११ ॥ चमूरमुष्यापि [समृद्धिम]न्तः समं समाक्रान्तवती विपक्षान् । अजिह्मगैर्जिह्मगतुल्यरूपैस्तेषां पृषत्काऽलिमपार्थयद्भिः ॥१२॥ समृद्ध[बल] वाले राव सुर्जन की सेना ने भी उसी समय शत्रुओं पर आक्रमण किया और सर्पों के समान ल[म्बे] वाले बाणों से शत्रुओं के बाणसमूह को बेकार कर दिया ॥ १२ ॥ स्वसम्मुखं सञ्च[र]तोस्तदानीमनीकयोः सङ्गररङ्गभाजोः । [द्व]योः क्षणादैक्यमभूद् यथाम्भःप्रवाहयोः प्रावृषि तीव्रवेगात् ॥१३॥ युद्धभूमि में एक दूसरे के सामने लड़ने वाली उन दोनों सेनाओं का कुछ देर के लिये ऐक्य हो गया जैसे वर्षा ऋतु में दो तरफ से बहने वाले जलप्रवाहों का मेल हो जाता है ॥१३॥ नभःस्थितं तावदरुद्ध युद्धे रजोन्धकारोऽरुणमग्रतो यः । भूमिं स्थितस्तं भटशोणितोत्थः परो न्यरौत्सीदरुणः प्रवाहः ॥१४॥ उस युद्ध में धूल के अन्धकार ने ऊपर उड़ कर आकाश में स्थित सूर्य को घेर लिया ; तब वीरों के भूमिस्थ रुधिर प्रवाह ने उस धूल के अन्धकार को घेर लिया । (सेना से उड़ी हुई धूल ने आकाश में जाकर सूर्य को ढाँक दिया और युद्धभूमि में बहने वाले वीरों के रक्तप्रवाह ने उस धूल को नीचे बिठा दिया) ॥१४॥ (१२) अजिह्मगाः बाणाः जिह्मगाः सर्पाः ।