भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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१९० सुर्र्जनचरितमहाकाव्यम् रजस्तमोद्धतरावकाशे जगत्यनासाद्य पदं कुतश्चित् । विवेश सत्वं सुतरां भटानां स्वतन्त्रमन्तःकरणं तदानीम् ॥१५॥ उस समय जगत् रजस् (धूल) के तमस् (अन्धकार) से घिर रहा था, अतः सत्व (सत्व गुण; बल) रजस्तमोमय (रजोगुण और तमोगुण से आक्रान्त; धूल के अन्धकार से युक्त) संसार में कहीं स्थान न पाकर, वीरों के स्वतन्त्र अन्तःकरणों में प्रवेश कर गया अर्थात् वीरों के हृदयों में बल का संचार हो गया ॥१५॥ आकृष्य दूरं गुणमाशु मुक्ते विनिर्गतेऽङ्गानि विभिद्य बाणे । अपारिता वाचयितुं परेण वृथा बभूवुर्भटनामवर्णाः ॥१६॥ ज्या को दूर तक खींच कर शीघ्रता से छोड़े गये बाण के शत्रु के अंगों के भेद कर बाहर निकल जाने के कारण शत्रु उस वीर के नाम के उस बाण पर खुदे हुये अक्षरों को न पढ़ सका और वे अक्षर व्यर्थ ही रहे ॥१६॥ पुरः परेण क्षिपता शिरस्त्रमाकङ्कपत्रं निटले निखातः । पुंसः परावृत्तिपराङ्मुखस्य शरः किरीटस्य चकार कान्तिम् ॥१७॥ किसी शत्रु का बाण एक वीर के ललाट में इतना अन्दर घुस गया कि उसकी जड़ ही बाहर रही, फिर भी वह वीर युद्ध में सामने ही डटा रहा और उस बाण का बाहर दिखाई देने वाला मूल- भाग उस वीर, के मस्तक पर किरीट के समान कान्ति को करता रहा ॥१७॥ मर्मातिगेनाऽहितमार्गणेन विभिन्नमर्मा न चचाल कश्चित् । सम्वर्मयामास वपुर्विशङ्कः स्वाभाविकेनैव हि साहसेन ॥१८॥ शत्रु के मर्मस्पर्शी बाणों से किसी वीर का कवच छिन्न भिन्न हो गया, फिर भी वह वीर युद्ध में डटा रहा और निःशंक होकर उसने अपने शरीर को अपने स्वाभाविक साहस के कवच से सुशोभित किया ॥१८॥ निरुन्धति व्योमनि मार्गमह्नो निरङ्कुशे रेणुकृतान्धकारे । आनन्दसान्द्रस्मितचन्द्रिकाभिव्यक्तं प्रवीरस्य मुखं व्यलोकि ॥१९॥ उद्धत धूल ने दिन के मार्ग को रोक कर आकाश को व्याप्त कर लिया, फिर भी आनन्द की घनी मुस्कान रूपी चाँदनी में किसी वीर का मुख स्पष्ट दिखाई दिया ॥१९॥ संयोज्यमाने विशिखेन चापे विलूनशीर्षोपि शरेण सद्यः । कबन्धभावेऽपि तथैव कश्चिद् विदूरमाकृष्य मुमोच बाणम् ॥२०॥ कोई वीर अपने धनुष पर बाण चढ़ा ही रहा था कि शत्रु ने उसका सिर काट गिराया, फिर भी उस वीर के कबन्ध (रुंड) ने ही उस बाण को दूर तक खींच कर छोड़ा ॥२०॥ (१७) आकंकपत्रमुपमूलं यावत् ।