भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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१९२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मौर्वीरवेण व्रणयन्नरातिश्रोत्राणि स त्राणकरो नतानाम् । अगाहताऽगाधबलं बलीयान् यथाम्बुराशिं प्रथमो वराहः ॥२८॥ विनीत पुरुषों की रक्षा करने वाले बलवान् राव सुर्जन अपने धनुष की ज्या की टंकार से शत्रुओं के कानों को घायल करते हुये, शत्रुओं की अपार सेना में उसी प्रकार घुस पड़े जिस प्रकार आदिवराह (वराहावतार) अथाह समुद्र में (पृथ्वी का उद्धार करने के लिये) घुस गये थे ॥२८॥ निषङ्गसङ्गत्वरमेकमन्यं करं धनुःस्थं श्रवणस्थमन्यम् । मौर्वीषयोगे परमेकदेनं पश्यंश्चतुर्बाहुममंस्त लोकः ॥२९॥ उस समय ऐसा प्रतीत होता था कि मानों राव सुर्जन का एक हाथ तरकस से जल्दी जल्दी बाण निकालने में लगा है, दूसरा हाथ धनुष को पकड़े है, तीसरा हाथ प्रत्यंचा को कान तक खींच रहा है और चौथा हाथ प्रत्यंचा पर चढ़े हुये बाण को छोड़ रहा है—ऐसी प्रतीति होने के कारण उन चतुर्बाहुमान् (चौहाण) वीर सुर्जन को लोगों ने उस समय वास्तव में चतुर्बाहुमान् (चतुर्भुज) ही समझा ॥२९॥ अपीडयन् म्लेच्छभटानभीक्ष्णं तीक्ष्णाः पृषत्काः प्रभुणा विमुक्ताः । जन्तूनिव प्रान्तरसीमसंस्थान् वर्षोपलास्तोयधरेण नुन्नाः ॥३०॥ राजा द्वारा छोड़ें गये तीक्ष्ण बाण उन यवन वीरों को उसी तरह बराबर पीड़ा देते रहे, जिस तरह मेघ द्वारा बरसाये गये ओले दूर निर्जन भयरहित स्थान की सीमा में रहने वाले (छोटे-छोटे) प्राणियों को पीड़ित करते हैं ॥३०॥ व्ययोजयन् कांश्चन जीवनेन बाणास्तदानीं यवनवीरान् । कल्पावसानोदितचण्डभानोः स्फुरन्मयूखा इव जीवलोकान् ॥३१॥ उनके बाणों ने कई यवनवीरों को अपने प्राणों से वियुक्त कर दिया, जैसे प्रलय के समय उदित प्रचण्ड सूर्य की तीव्र किरणें जीवों को प्राणों से वियुक्त कर देती हैं ॥३१॥ आयामवत्श्मश्रुशिरस्त्रभाञ्जि शिरांसि तेषां रुधिरापगासु । स्वच्छन्दमास्कन्द्य निषेदिवांसः सुखेन खेलां दधति स्म गृध्राः ॥३२॥ लम्बी चौड़ी दाढ़ी और शिरस्त्राणों से युक्त उन यवनों के रुधिर की नदियों में पड़े हुए सिरों पर फैल पसर कर आराम से बैठे हुये गिद्ध सुखपूर्वक खेल रहे थे ॥३२॥ अजिह्मगानामपि नाम तेषां तत्कर्तृकं मोचनमेव युक्तम् । गुणाश्रयं दर्शितपक्षपातं कुर्वन्ति येऽमी परभेदहेतोः ॥३३॥ यद्यपि वे 'अजिह्मग' (बाण; सरल) थे तो भी राजा के लिये उनको छोड़ देना ही उचित था क्योंकि वे 'पक्षपात' (पक्ष अर्थात् बाण के पिछले भाग के साथ गिर कर; किसी पक्ष का अनु- चित समर्थन) दिखला कर दूसरों को भेदने के लिये (पीड़ा देने के लिये) ही 'गुण' (प्रत्यञ्चा.; गुण) का आश्रय लेते थे ॥३३॥ (३०) प्रान्तरसीमसंस्थान् दूरशून्यमार्गसीम्नि स्थितान् । (३३) तत्कर्तृकं राज्ञा कृतमित्यर्थः ।