सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५ सप्तदशः सर्गः १९३ अजिह्मगाः सन्त्वथ जिह्मगा वा कर्णेजपा दूरतरे विधेयाः । येऽन्तः प्रविश्य प्रथमं परेषां प्राणाननाकृष्य बहिर्न यान्ति ॥३४॥ चाहे सरल (अजिह्मग) हों, चाहे कुटिल (जिह्मग), वाणों को 'कर्णेजप' (कान में गुन- गुनाने वाले अर्थात् कान तक खींच कर छोड़े जाने वाले) होने के कारण दूर छोड़ना ही अच्छा है (अथवा चाहे सरल हों, चाहे कुटिल, वाणों (अजिह्मग) को, साँपों (जिह्मग) को और चुगलखोरों (कर्णेजप) को दूर छोड़ना ही अच्छा है) क्योंकि ये पहले दूसरों के भीतर घुस कर, बिना उनके प्राणों को बाहर निकाले, स्वयं भी बाहर नहीं निकलते ॥३४॥ तद्बाणवह्नोरनलं विषोढुं ज्वालां करालामथ पारसीकाः । विदुद्रुवुर्दावशिखिप्रतप्ता जीवा इवारण्यचराः पराञ्चः ॥३५॥ राव सुर्जन के वाणों की भयंकर प्रज्वलित अग्नि को वे यवन नहीं सह सके और विमुख होकर भाग गये, जैसे दावानल के भयंकर संताप को न सह कर वन के प्राणी भाग जाते हैं ॥३५॥ ते त्रासजान्धंतमसावसन्ना विस्रस्तशस्त्राः परितो भ्रमन्तः । नालक्षयन् सूक्षिणमन्तिकस्थं प्रभुं नृपाणामपि शासितारम् ॥३६॥ भय से उत्पन्न गहरे अन्धकार से घिरे हुये वे यवन अपने शस्त्र छोड़ कर चारों ओर भाग खड़े हुये और घबराहट के कारण वे राजाओं के भी शासक और अपने रक्षक अकबर को, जो समीप ही स्थित थे, नहीं देख पाये ॥३६॥ तथाविधांस्तानपि वीक्ष्य...पः सर्वसहामण्डलसार्वभौमः । सहासमाह स्...धीरस्वनः सैनिकनाथमुख्यान् ॥३७॥ भूमण्डल के सार्वभौम [सम्राट] अकबर ने अपने मुख्य सेनापतियों को इस प्रकार भयभीत देख कर, हँसते हुये, मेघ के समान गंभीर स्वर में, उनसे यों कहा ॥३७॥ ...ङ्गोणीशांस्तरसा स्वदोर्भ्यां शश्वत्समुत्तीर्णवतां सहेलम् । ... भवेन् मोहतमोवकाशस्तडागकासारविगाहनेषु ॥३८॥ [आश्च]र्य है कि जिन वीरों ने सदा अपने बाहुबल से समुद्रों तक को वेग से खेल ही खेल में पार कर [लि]या, उन्हें आज छोटे से तालाब को पार करने में भयंकर व्यामोह हो रहा है ! ॥३८॥ [उ]ल्लङ्घिता यैरर्लघूप्रतापैः कुतूहलेनैव कुलाचलेन्द्राः । [गण्ड]शैलाक्रमणेऽपि तेषां सम्भावितो विप्रतिपत्तिलेशः ॥३९॥ जिन महाप्रतापी वीरों ने कुतूहल में ही बड़े बड़े पर्वतों को पार कर लिया, उन्हें आज पहाड़ से गिरी हुई शिला को पार करने में शंका हो रही है ! ॥३९॥ विरोधिभूपालवरूथिनीशे निरन्तरापि प्रसभं सुखेन । मया समासादि समुद्रसीमा समुद्रनेमिर्भवतां बलेन ॥४०॥ बड़े बड़े शत्रुराजाओं के सेनापतियों के होते हुये भी उन्हें हठात् परास्त करके इस अव्यवहित समुद्ररशना पृथ्वी को मैंने आप ही लोगों के पराक्रम के कारण सुख से प्राप्त किया है ॥४०॥ (३६) सूक्षिणं रक्षकम् । - (३९) गण्डशैलाः पर्वतात् पतिताः स्थूलोपलाः ।