भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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१९४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अमानमन्नेव ममैष चापः क्ष्मापालमुख्यान् नमयाञ्चकार । निदानमस्मिन् नितरामुदग्रा भवादृशामेव पराक्रमर्द्धिः ॥४१॥ मेरे इस धनुष ने बिना झुके ही (क्योंकि इस पर प्रत्यंचा चढ़ाने की आवश्यकता ही नहीं हुई) बड़े बड़े श्रेष्ठ राजाओं को झुका दिया है—इसका कारण भी आप जैसे वीरों का अत्यन्त प्रबल पराक्रम ही है ॥४१॥ यशांसि युष्माकमहो जिहीर्षुर्जगत्प्रकाशान्यपि जाङ्गलोऽयम् । मध्येमृधं धामभृतां नृपाणां यान्यर्जितान्यूर्जितविक्रमेण ॥४२॥ आप लोगों ने युद्ध में बड़े बड़े तेजस्वी राजाओं को परास्त करके अपने प्रबल पराक्रम से जो जगद्विख्यात यश संचित किया है उस यश को आज यह जंगली मिटा देना चाहता है ! ॥४२॥ अतः परं किन्नु विडम्बनं स्यादपत्रपायाः परमावधिर्वा । पृष्ठं परे यत् समितौ भटानां पश्यन्ति वक्षोऽपि कुलाङ्गनानाम् ॥४३॥ इससे बढ़ कर और क्या अपमान हो सकता है और इससे बढ़ कर लज्जा की और कौन-सी पराकाष्ठा हो सकती है कि लोग वीरों की युद्ध में पीठ और कुलीन स्त्रियों का वक्षःस्थल देख सकें ! ॥४३॥ कार्यं समीचीनमथेतरद् वा निर्वाहकाले कुरुते नरो यत् । तत् प्राक्प्रणीतं विपरीतकृत्यं प्रमाष्टि यस्तस्य वश्यम् ॥४४॥ आपत्काल में पुरुष जो कुछ अच्छा या बुरा कार्य करता है वह अवश्य ही पहले किये गये बड़े भारी बुरे या अच्छे कार्य को भी मिटा देता है ॥४४॥ पराजितेऽस्मिन्नपरं शरव्यं भवद्विधानां न महीतलेऽस्मिन् । वेलाविलासावधि वारिराशेर्वशीकृतं तत् खलु विश्वमेव ॥४५॥ इसे पराजित कर देने पर इस भूमंडल में आप जैसों के बाणों का और लक्ष्य नहीं बचता क्योंकि फिर समुद्र तट तक सारा विश्व अपने ही वश में है ॥४५॥ इतीरितास्ते प्रभुणा प्रवीरा ह्रिया च भीत्या च निवर्तिताश्वाः । शूरं प्रजह्नुः समकालमेव निजैर्निजैर्निर्दयमुद्धतास्त्रैः ॥४६॥ अपने सम्राट् द्वारा इस प्रकार प्रेरित उन यवन वीरों ने लज्जा और भय के कारण अपने अपने घोड़े वापस लौटा लिये और उन सबने अपने अपने उद्धत शस्त्रों से निर्दयतापूर्वक एक साथ वीर सुर्जन पर प्रहार किये ॥४६॥ चिरं परिश्रान्तिपरीतदेहः श्वसन् सफेनप्लुतशोणितास्यः । अथास्य वाहः परवाहिनोशैः शिलीमुखैस्तीक्ष्णमुखैरघानि ॥४७॥ इसके बाद उन शत्रुसेनापतियों ने राव सुर्जन के घोड़े को, जिसका शरीर अत्यन्त परिश्रम के कारण चूर-चूर हो रहा था, जो बुरी तरह हाँफ रहा था और जिसके मुँह से फेन और खून निकल रहा था, अपने तेज बाणों से मार दिया ॥४७॥