सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशः सर्गः १९५ यावत् तुरङ्गं पतनोन्मुखं तं विहाय वाहान्तरमभ्युपैति । तावद् विपक्षाः किल चापमौर्वीमुर्वीपतेस्तस्य विलनवन्तः ॥४८॥ जिस समय राव सुर्जन उस गिरने वाले घोड़े को छोड़ कर दूसरे घोड़े पर चढ़ रहे थे उसी समय शत्रुओं ने उनके धनुष की प्रत्यंचा को काट दिया ॥४८॥ बाणासनं तद् विनिकार्य विद्वाञ्जवेन जग्राह स मण्डलाग्रम् । तं भीममूर्तिर्भ्रमयन् बभासे यथा दिनेशः परिवेषसङ्गात् ॥४९॥ विद्वान् सुर्जन ने शीघ्र उस धनुष को फेंक कर वेग से तलवार हाथ में ले ली और भयंकर रूप धर कर उस तलवार को चारों ओर घुमाते हुये वे परिधि से घिरे हुए सूर्य के समान शोभित हुए ॥४९॥ कौक्षेयकाक्षेपपरिक्षतानां क्षितिक्षितां ख्यातविपक्षगानाम् । अक्षीणदाक्ष्यः क्षतजैरभीक्षमक्षालयत् क्षोणितलस्य कुक्षिम् ॥५०॥ युद्ध-कुशल राजा ने विख्यात शत्रु-राजाओं के अपनी तलवार के प्रहारों से उत्पन्न घावों से बहने वाले रुधिर से निरन्तर धरातल की कोख को पाट दिया ॥५०॥ विनिघ्नतस्तस्य समन्तस्तानरीन् नरेन्द्रस्य तुरङ्गमेन्द्रः । भ्रमन् विभाति स्म यथा मरालः स्फुरन्महावर्तविवर्तमानः ॥५१॥ शत्रुओं को मारने वाले राजा और उसका घोड़ा युद्धभूमि में चारों ओर घूमता हुआ, बड़ी भँवर में घूमने वाल हंस के [समान शोभित हो] रहा था ॥५१॥ अथापरे वैरि[वधैषिणोऽन्ये] विनिर्जितप्रोन्मदमेदिनीशाः । [म]र्माणि सम्भिद्यपि भेदयन्तः शस्त्रैः प्रजापालममुं प्रजह्रुः ॥५२॥ इसके [बाद] बड़े-बड़े उन्मद राजाओं को जीतने वाले अन्य शत्रु-सेनापतियों ने, राव सुर्जन के कवच [तथा व]क्षस्थल को भेदते हुये, शस्त्रों से उन पर प्रहार किये ॥५२॥ [अ]त्युग्रैः कङ्कटभेदिभिस्तैः प्रबाध्यमानाननुवेलमस्त्रैः । [अ]व्यग्रचेताः सममुग्रवेगात् प्रत्यग्रहीत् तान् प्रहराजतेजाः ॥५३॥ कवच [को भेदने] वाले अत्यन्त तीव्र शस्त्रों से लगातार प्रहार करने वाले उन शत्रु सेनापतियों के प्रहारों [को सूर्य] के समान तेजस्वी राव सुर्जन ने अव्यग्रचित्त होकर रोका और प्रबल वेग से उन पर वार करना प्रारंभ किया ॥५३॥ सम्भावयामास तमुग्रसत्त्वं हूमायूँजः सन्ततसाधुवादैः । सा स्यादसाधारणता गुणानां प्रमोद्येद् यद्विषतोपि चेतः ॥५४॥ महान् पराक्रमी राव सुर्जन की, हुमायूँ के पुत्र अकबर बार बार 'वाह वाह' कहते हुये, भूरि भूरि प्रशंसा कर रहे थे; वास्तव में गुणों की असाधारणता वही है जो शत्रु के चित्त को भी प्रसन्न कर दे ॥५४॥ (५३) कंकटभेदिभिः कवचभेदिभिः ।