सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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१९६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् गुरुसमरसमुत्थरेणुपूरैर्मलिनितमात्मवपुस्त्विषामधीशः । विमलयितुमिवोदके निमङ्क्षुश्चरमपयोनिधिसन्निधिं जगाम ॥५५॥ सूर्य भगवान् उस भीषण युद्ध में उड़ी हुई धूल के समूह से मैले बने हुये अपने शरीर को जल में डुबकी लगा कर साफ़ करने के लिये ही मानों पश्चिमी समुद्र के पास गए ॥५५॥ अकबरधरणोशः सन्निवृत्य स्वसैन्यं शिविरमुखमयासीद् वासरस्यावसाने बहलरुधिरधाराधोरणीधौतदेह- स्तदनु निववृते च क्षोणिपालः स्वदुर्गम् ॥५६॥ दिन डूबने पर सम्राट् अकबर अपनी सेना को लौटा कर शिविर की ओर चले और तब राजा सुर्जन भी, जिनके शरीर से गहरी रुधिर धारायें बह रहीं थीं, अपने दुर्ग में लौट गये ॥५६॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये सप्तदशः सर्गः।