सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशः सर्गः यावदुद्यमभृतोऽस्य रणाय स्वैरमुल्लसति दुन्दुभिनादः । तावदेव सचिवः शकभर्तुः प्रातरेत्य मिलितः प्रतिहारे ॥ १ ॥ जिस समय युद्ध के लिये तैयार होने वाले राव सुर्जन के नगाड़ों के शब्द जोरों से बजने लगे, उसी समय प्रातःकाल अकबर के मंत्री (मानसिंह) द्वार पर मिलने आये ॥ १ ॥ अर्हणाभिरुचितोपचिताभिस्तेन चारुचरितेन स नीतः । संसदं मृदुपदां गुणगुर्वीमाददे गुरुमतिर्गिरमेताम् ॥ २ ॥ सुन्दर चरित्रवाले राजा सुर्जन उनको उचित आदर सत्कार के साथ सभा में ले आये और बुद्धिमान् मंत्री ने शब्दों से कोमल और गुणों से भारी ये वचन कहे ॥ २ ॥ आगतः स्वयमहं निखिलोर्वीसार्बभौमवचनव्यपदेशात् । सौहृदातिशयतः स्फुटबन्धोर्बोधनाय नयशालिवचोभिः ॥ ३ ॥ समस्त भूमंडल के सार्वभौम अकबर के आदेश के कारण मैं स्वयं यहाँ आया हूँ। आप मेरे बन्धु