भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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१९८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् नर्मदाश्रयविशेषपवित्रा ये भवन्ति विषया वसुपूर्णाः । जाह्नवीविमलवेणिविचित्रा पार्वतीपरिवृढस्य पुरी च ॥ ७ ॥ वासरेशसुतयाऽधिकशोभं मण्डलं च निखिलं मथुरायाः । गृह्यतां नियमतश्चिरकालं यद्यदिच्छसि परं च सुराज्यम् ॥ ८ ॥ एकमेव नृपते ! रणपूर्वस्तम्भदुर्गमिदमर्पय तस्मै । एवमेव हि शके शितुरस्य प्रीतियतिमती भवति स्यात् ॥ ९ ॥ नर्मदा के आश्रय के कारण विशेष रूप से पवित्र और धनधान्य से पूर्ण प्रदेश तथा पार्वतीपति भगवान् शिव की भागीरथी के निर्मल प्रवाह से पवित्र पुरी काशी एवं सूर्यसुता यमुना के कारण अधिक सुन्दर मथुरा का सम्पूर्ण मंडल तथा अन्य जो भी सुन्दर राज्य आप लेना चाहें वह सब आप नियमपूर्वक चिरकाल के लिये ग्रहण कीजिये, और राजन् ! केवल एक यह रणस्तम्भपुर का दुर्ग अकबर को समर्पण कीजिये । ऐसा करने पर ही यवन सम्राट् का प्रेम आपके प्रति विशाल होगा ॥७-९॥ कुर्वते समयतः खलु सन्धि बिभ्रतोऽपि बहलोज्ज्वलतेजः । वीतिहोत्रहरितोऽङ्कमुपास्ते शीतकालमधि घर्ममयूखः ॥१०॥ विशाल और उज्ज्वल तेजस्वी पुरुष भी समय देख [कर सन्धि करते] हैं; सूर्य भी शीतकाल में अग्नि की दिशा (आग्नेय कोण) की गोद में शरण [लेता है ॥१०॥] हीनशक्तिविभवेऽपि जयः स्यात् कुत्रचिद् [घूणाक्षर]कल्पः । तं विलोक्य न तु नीतिविरुद्धं बुद्धिमान् व्यवसितुं विदधीत ॥११॥ यदि शक्ति और वैभव रहित पुरुष को कहीं घूणाक्षरन्याय से विजय प्राप्त हो [भी] जाय, तो उसे देख कर बुद्धिमान् पुरुष को नीतिविरुद्ध आचरण नहीं करना चाहिये ॥११॥ ये स्वतोऽधिकबलेषु न कुर्युः सन्धिमन्धितधियो गुरुगर्वात् । स्रोतसीव पतिताः प्रतिकूले ते व्रजन्ति न कदाचन पारम् ॥१२॥ जो लोग भारी अभिमान के कारण अन्धी बुद्धि वाले बन कर अपने से अधिक [बल]वान् शत्रु से सन्धि नहीं करते वे, प्रतिकूल प्रवाह में पड़े हुये प्राणियों के समान, क[भी पार] नहीं जा सकते ॥१२॥ म्लानतामयति यत्र न कीर्तिर्भूयसी क्षतिरुदेति न यस्मात् । तं बलीयसि विरोधिनि सन्धिं कुर्वतः क इव तेऽत्र विमर्शः ॥१३॥ जिसके कारण भारी हानि का उदय न हो और जिसके कारण कीर्ति भी मलिन न हो ऐसी सन्धि यदि बलवान् शत्रु के साथ हो सके तो इसे करने में आपके लिये इतने सोच-विचार की क्या आवश्यकता है ? ॥१३॥ (१०) वीतिहोत्रस्याग्नेः हरित आग्नेयकोणस्येत्यर्थः ।