सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशः सर्गः १९९ सर्वथाऽधिकबलैः प्रतिपक्षै विग्रहे ग्रहिलतान्न हि गच्छेत् । कः प्रतीपतरचण्डसमीरं शर्म लिप्सुरभियाति रयेण ॥१५४॥ अपने से सब प्रकार अधिक बलशाली शत्रु से युद्ध करने के लिये दुराग्रह नहीं करना चाहिये । अपना कल्याण चाहने वाला कौन पुरुष अत्यन्त प्रचण्ड वायु के सामने वेग से दौड़ेगा ? ॥१५४॥ दुर्गमेकमुपनीय नृपास्मै गृह्यते यदि पुरत्रयमस्मात् । ईदृशा विनिमयेन बभूव प्रत्युताधिकतरस्तव लाभः ॥१५५॥ राजन् ! यदि आप इनको एक दुर्ग देकर इनसे तीन नगर ले लें, तो इस विनिमय से उलटे आपको ही अधिक लाभ है ॥१५५॥ ग्रन्थित्वमपदे किमु कुर्वन् खेदयस्यधिबलं यवनेशम् । किन्नु कर्णपदवीन्न गतस्ते जैत्रसिंहतनयस्य विपाकः ॥१५६॥ अस्थान में दुराग्रह करके आप सेना के साथ यवन सम्राट् को व्यर्थ में क्यों कष्ट दे रहे हैं ? क्या जैत्रसिंह के पुत्र हम्मीरदेव का परिणाम आपने नहीं सुना ? ॥१५६॥ वारिकाननमही...स्त्वग्रहीत् तदधिपान् स निगृह्य । शिष्यते परमि... तत्र यततेऽद्भुततेजाः ॥१५७॥ सम्राट् ने जल, वन अ... उनके स्वामियों को बन्दी बनाकर, जीत लिया है; केवल यह आप ही का दुर्ग म... इसलिये अद्भुत तेजस्वी सम्राट् इसको लेने का यत्न कर रहे हैं ॥१५७॥ ...क्ता प्रबलवैरिन्ृपालैः सद्गुणैश्च भवता धरणीयम् । ...वितरणाम्बुनदीभिः कीर्तिभिश्च भुवनं विशदाभिः ॥१५८॥ अ... इस पृथ्वी को प्रबल शत्रुओं के रुधिर से रक्त और अपने उत्तम गुणों से अनुरक्त बना र... है; आपने... विश्व को अपने दान जल की विस्तृत नदियों से पूर्ण और अपनी स्वच्छ... से... कर दिया है ॥१५८॥ ...तरमिहास्ति विधेयं शस्त्रचापतपसां नृपतीनाम् । पुण्यवानसि विनैव हि यत्नं सर्वमेव समपद्यत तत् ते ॥१५९॥ शस्त्र और धनुष-रूपी तप वाले राजाओं के लिये इसके बाद जो कर्तव्य शेष रह जाता है, वह बिना यत्न ही आपको मिल रहा है, अतः आप बड़े पुण्यात्मा हैं ॥१५९॥ नर्मदान्वयजशर्मदतोयां नर्मदां नियमवानवगाह्य । वीतशङ्कमधुना मधुरास्ताः पश्य पावनभुवो मधुरायाः ॥१२०॥ नर्मद के कुल के लोगों के लिये जिसका जल कल्याणकारक है ऐसी नर्मदा में नियमपूर्वक स्नान करके अब निःशंक होकर आप मथुरा की मधुर और पवित्र भूमि के दर्शन करें ॥१२०॥