भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 226

२०० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ज्योतिरुज्जवलतरां यतयो यां शीलयन्ति सततं यतचित्ताः । अन्तरिक्षनगरीं गणभर्तुस्तां विलोक्य भवितासि कृतार्थः ॥२१॥ यति लोग यतचित्त होकर जिस अत्यन्त उज्ज्वल ज्योतिर्मयी भगवान् शिव की अन्तरिक्ष नगरी काशी का सदा सेवन किया करते हैं उसके दर्शन करके आप अपने आपको कृतार्थ कीजिये ॥२१॥ सोपपत्तिकमथाधिकपथ्यं भाषितं चिरममुष्य विचार्य । पुण्यतीर्थगमनाय मनीषी सोऽन्ववर्तत मनः शकभर्तुः ॥२२॥ मानसिंह के युक्तियुक्त और अत्यन्त हितकारी वचनों पर बहुत देर तक विचार करके, पुण्य तीर्थों में जाने के इच्छुक राव सुर्जन ने अकबर के मनोनुकूल कार्य कर दिया ॥२२॥ तं विसृज्य विषयं वशिवर्यस्त्वर्यमाण इव तीर्थविनोदैः । अन्वितः पुरजनैरनुरागान्निर्जगाम नगरान्नरनाथः ॥२३॥ संयमी पुरुषों में श्रेष्ठ राव सुर्जन उस प्रदेश को छोड़कर तीर्थों में जाने के लिये जल्दी करते हुये, प्रेम के कारण नागरिकों के साथ, नगर से चल दिये ॥२३॥ वासरैः कतिपयैः पतिरुर्व्याः सोऽथ वर्त्म वि...विलङ्घ्य । नर्मदामृदुसमीरसनाथं सन्निवेशमक... ॥२४॥ राजा सुर्जन ने कुछ दिनों में उस विस्तृत मार्ग ... के कोमल पवन से युक्त स्थान में अपनी सेना का शिविर बनाया ॥२४॥ नीत्वा स कत्यपि समा भुवि नर्मदायास्तद्वासिनो जनपदान् वशगान् कृत्वा । पुण्यामपूर्णसुकृतैर्मनुजैर्दुरापां प्राप प्रियां मधुपुरीं श्वसद... ॥२५॥ नर्मदा की भूमि में कुछ वर्ष रहकर और वहाँ के निवासी नागरिकों को व... के राव सुर्जन, अल्प पुण्य वाले पुरुषों के लिये दुष्प्राप्य तथा भगवान् कृष्ण की प्रिय, पुण्य...थुरा पहुँचे ॥२५॥ कालिन्दीपुलिनमथो विगाहमानं गोपालः स्वकुलपुरस्कृ... पुरोधाः । व्यासस्तं वशिनमुदाहरत् प्रमोदादुन्मीलन्मधुपुरमाधुरी... ॥२६॥ अपने कुटुम्बियों के साथ यमुना के तट का सेवन करने वाले, मथुरा पुरी के विक... सौन्दर्य में निमग्न, संयमी राव सुर्जन से उनके पुरोहित गोपाल व्यास ने प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार मथुरा का वर्णन किया ॥२६॥ रक्तोत्पलैरभिनवैरभितः स्फुरद्भिः स्फीतेन्द्रनीलमणिमेदुरमुग्धवेणिः । आभाति पातकतरुक्षतजाक्तधारा धर्मस्य खड्गलतिकेव कलिन्दकन्या ॥२७॥ किनारे-किनारे विकसित नवीन लाल कमलों के कारण उज्ज्वल नीलम के समान सुन्दर प्रवाह वाली यमुना, पापों के समूहों को मारने के कारण उनके रुधिर से सनी हुई धार वाली धर्म (यमराज) की तलवार के समान सुशोभित हो रही है ॥२७॥ ०