भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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२६ अष्टादशः सर्गः २०१ स्वच्छात्मानः पावनीमेतदीयां वारां धारां स्वच्छशीतस्वभावम् । अम्भोवाहाः साधवोऽपि प्रकामं पीत्वा सद्यः कृष्णभावं भजन्ते ॥२८॥ इस यमुना के जल की पवित्र, नील और शीतल स्वभाव वाली धारा को पर्याप्त पीकर स्वच्छ शरीर वाले शुभ्र बादल शीघ्र काले बन जाते हैं और स्वच्छ हृदय वाले साधु पुरुष शीघ्र भगवान् श्रीकृष्ण-स्वरूप हो जाते हैं ॥२८॥ इयञ्च गीर्वाणतरङ्गिणी च कामं जगत्पावनतां दधाते । परन्तु धौतं पदमेव तस्यामियञ्जगाहे हरिणा विहारे ॥२९॥ यमुना और गंगा, दोनों ही, जगत् को पवित्र करती हैं; तथापि भगवान् श्रीकृष्ण ने गंगा में तो केवल पैर ही धोया, किन्तु इस यमुना में (गोपियों के साथ) जल-क्रीड़ा की। (जब वामन रूप भगवान् ने अपना एक पैर स्वर्ग में रक्खा तब ब्रह्माजी ने अपने कमण्डलु के जल से उस पैर को धोया, वह जल ही गंगा-रूप से तीनों लोकों को पवित्र कर रहा है) ॥२९॥ सेयं पुरी प्राणभृतां नमस्या को वेद सम्यङ् महिमानमस्याः । अजोऽपि यस्यां समजायताऽसौ जातो न भूयः समुपैति जन्म ॥३०॥ यह मथुरा पुरी प्राणियों के लिये पूज्य है। इसकी महिमा को ठीक-ठीक कौन जान सकता है ? इसमें भगवान् श्रीकृष्ण (जन्म रहित) होते हुये भी, जन्म लिया; और जो इसमें एक बार जन्म ले लेता है, वह फिर जन्म नहीं लेता (क्योंकि वह जन्म-मृत्युचक्र से छूटकर मुक्त हो जाता है) ॥३०॥ जन्माऽमुष्यां जन्मततीर्धुनोते मौञ्जीबन्धो हन्ति बन्धानुबन्धान् । मृत्युर्भिन्ते दारुणां मृत्युभीतिं दाहस्तीव्रांस्त्रासयेत् सर्वदाहान् ॥३१॥ इस मथुरा में जन्म लेना जन्म-परम्परा को मिटा देता है; इसमें यज्ञोपवीत लेकर मौञ्जी- बन्धन करना सब बन्धनों को काट देता है; इसमें मरने से मृत्यु का भीषण भय नष्ट हो जाता है (अर्थात् जन्म-मृत्यु का चक्र छूट जाता है) और इसमें दाह-संस्कार होने से सम्पूर्ण दाह (सांसा- रिक सन्ताप) छूट जाते हैं ॥३१॥ औत्तानपादतनयः प्रयतः सदाऽस्याः प्रासादशेखरपरिक्रमणं करोति । तद्यदत्र यदुवीरपदारविन्दमाराध्य स ध्रुवपदं पृथुकः प्रपेदे ॥३२॥ उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव सदा सावधान होकर इसके महलों के शिखरों की परिक्रमा करते हैं, यह ठीक ही है क्योंकि बालक ध्रुव ने भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों की आराधना करके यहीं ध्रुवपद प्राप्त किया था ॥३२॥ चिराय विप्रोषितभर्तृका कथं ध्रियेत वैकुण्ठपुराधिदेवता । अजस्रमस्याः श्रितपीतवाससो न तां पताकापवनो यदि स्पृशेत् ॥३३॥ वैकुण्ठपुर की अधिदेवता, बहुत समय के लिये अपने पति से वियुक्त होकर, किस प्रकार धैर्य धारण करती, यदि निरन्तर पीताम्बर भगवान् कृष्ण का आश्रय लेनेवाली इस मथुरा की पताकाओं का पवन उसका स्पर्श नहीं किया करता ? ॥३३॥