सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अमुना यमुनापथेन बालं हरिमङ्के विनिधाय धीरचेताः । अगमत् तमसि प्रकामभीमे वसुदेवः सदनाय गोपभर्तुः ॥३४॥ बालरूप भगवान् कृष्ण को अपनी गोद में लेकर धीरचित्त वसुदेव उस (भाद्रपद कृष्णाष्टमी के) भयंकर निविड़ अन्धकार में इसी यमुनामार्ग से गोपों के स्वामी नन्द के घर गये थे ॥३४॥ नामानि यस्य गृणतामिह जन्मभाजां संसारसिन्धुरपि गोष्पदतां प्रयाति । आश्चर्यमत्र किमिहानकदुन्दुभे स्तत्सङ्गेन मित्रतनयाऽजनि जानुदघ्नी ॥३५॥ इस संसार में जन्म लेने वाले प्राणियों के लिये जिन भगवान् श्रीकृष्ण के नामस्मरण के कारण यह अपार भवसागर भी गाय के खुर से पड़े हुये छोटे से गड्ढे में भरे हुये जल के समान (सरलता से पार करने योग्य) बन जाता है, उन भगवान् श्रीकृष्ण के संग के कारण (गोद में होने के कारण) वसुदेव के लिये यदि मित्रपुत्री (सूर्य की पुत्री; मित्र की पुत्री) यमुना घुटनों तक आने वाली बन गई (जैसे किसी व्यक्ति की गोद में बच्चे को देखकर उसके मित्र की छोटी बच्ची आकर उसके घुटनों से लिपट जाती है) तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है ! ॥३५॥ संसारजाङ्गलपथश्रमखेदभाजां विश्रामदो मधुरिपुः स्वयमश्रमोऽपि । आकृष्य कंसमसकृद् रविणं जवेन विश्राम्यतिस्म... [तट]ेऽत्र कलिन्दजायाः ॥३६॥ इस संसार के बीहड़ जंगली मार्ग में चलने के परिश्र[म से उत्पन्न खेद] को विश्राम देने वाले मधुसूदन श्रीकृष्ण ने, स्वयं श्रमरहित होने पर भी, बार-[बार कं]स को वेग से खींच कर (मार कर), यमुना के इस तट पर विश्राम किया था [॥३६॥] कंसस्य काराभवनं तदेतन्नारायणोऽजायत यत्र [दे]वः । यद्दर्शनात् प्राणभृतो न भूयः संसारकाराभवनं विशन्ति ॥३७॥ यह कंस का कारागार है जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था; इसके [दर्शन] से प्राणी फिर संसार-रूपी कारागार में प्रवेश नहीं करते ॥३७॥ दाम्ना मणीनां खचितेन हेम्ना शोणः क्वचिच्छोणितक[णैश्च] । करे हरेः कंसगजस्य दन्तः कौमोदकीकान्तिमिहाससाद ॥३८॥ सोने में जड़ी हुई मणियों की माला से सुशोभित और कहीं-कहीं रुधिर-रूपी [कणों के] लगने से लाल, कंस के हाथी का उखाड़ा हुआ दाँत, यहाँ भगवान् कृष्ण के हाथ में उनकी [कौमो]दकी गदा के समान शोभित हुआ ॥३८॥ प्रतिमन्दिरमिन्दिरासहायो वसतीह स्वयमेव वासुदेवः । अलिखन्निह कारवः समन्तात् परमेनं निजशिल्पकौशलाय ॥३९॥ मथुरा के प्रत्येक मन्दिर में भगवान् वासुदेव लक्ष्मी के साथ निवास करते हैं; शिल्पियों ने उनकी प्रतिमायें केवल अपना शिल्पकौशल दिखाने के लिये ही बनाई हैं ॥३९॥ (३५) श्रीमद्भागवते (१०-२-३०) 'त्वत्पादपोतेन महत्कृतेन कुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम्' इति ।