सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशः सर्गः २०३ गृहे गृहे माथुरकामिनीनां मुखाम्बुजेभ्यश्चरितं मुरारेः । आकर्णयन् कंसवधादिवृत्तमस्यां जनो ह्यस्तनमेव वेद ॥४०॥ घर-घर में मथुरा की स्त्रियों के मुख-कमलों से भगवान् श्रीकृष्ण का कंसवध आदि चरित्र सुन कर लोग उसे कल ही हुआ समझते हैं ॥४०॥
अश्मन्ततीर्थं स कृती जगाम यत्र स्थितो दानपतिः प्रतीतः । अज्ञानजान्ध्यं विजहौ जलान्तर्मग्नोऽपि दामोदरवैभवेन ॥४१॥ पुण्यात्मा राव सुर्जन फिर अश्मन्त तीर्थ पहुँचे जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से अक्रूर ने (यमुना के) जल में निमग्न होकर भी (जड़ता अर्थात् मूर्खता में निमग्न होकर भी अथवा जड़ पदार्थों में आसक्त होने पर भी) अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को दूर कर दिया था ॥४१॥
वसन्तमुख्यैः समयैः स्वभावविरोधमुद्वास्य परस्परेण । निषेव्यमाणं युगपन्नृपोऽसौ वृन्दावनं पावनमन्वविन्दत् ॥४२॥ फिर राव सुर्जन उस [...] तीर्थ में पहुँचे जहाँ वसन्त आदि छहों ऋतुयें परस्पर विरोध छोड़ कर एक साथ रहती [...] द्वारा से [...]
स्मरस्य सेव[...]न्वशेषितश्रीर्वयसा नवेन । यत्कुञ्जभूमिर्भगवान् मुकुन्दः कृतार्थयामास पदार्पणेन ॥४३॥ काम[...] करने का अवसर देने वाले नवयौवन के कारण विशेष शोभा वाले भगवान् श्रीकृष्ण[...] वन की कुञ्जभूमि को अपने चरणारविन्दों के स्पर्श से धन्य बनाया था । (जैसे [...]म-पुत्र कामावतार प्रद्युम्न भगवान् के चरणों की सेवा करते थे, उसी प्रकार स्वयं कामदे[...] महायोगेश्वर के चरणों में ही लोटता रहता था ) ॥४३॥
[...] यत्र सनाथयन्तः शिखण्डिनामुन्मदताण्डवानि । [...]भिरूर्ध्वीकृतकण्ठनादा जगुर्मरालाश्च वनप्रियाश्च ॥४४॥ वृन्दावन में मोरों के मादक नृत्य का निरन्तर साथ देने के लिये कोयल और हंस, परस्पर स्पर्धा से, अपने कंठस्वर को ऊँचा करके गाया करते हैं ॥४४॥
(४३) स्मरस्य कामस्य कामावतारप्रद्युम्नस्य च । कामोऽपि श्रीकृष्णस्य पदाम्बुजमेव आश्रयति स्म । तदुक्तं श्रीमद्भागवते (१०-३३-२०) 'रेमे स भगवांस्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया' इति, 'यत्पादपंकजपरा- गनिषेवतृप्ता योगप्रभावविधुताखिलकर्मबन्धाः । स्वैरं चरन्ति मुनयोऽपि न नह्यमानास्तस्येच्छयाऽऽत्तवपुषः कुत एव बन्धः ॥' (१०-३३-३५) इति च ।