भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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२०४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मनोजमौर्वीरवमेदुरेण क्वचिद्द्विरेफावलिहुङ्कृतेन । क्वचिच्च षड्जस्वरपारगानां केकाभिराकारितमन्मथाभिः ॥४५॥ विलासिनीशंसितपेशलाभिः क्वचित् पिकालीमृदुकाकलीभिः । अन्योन्यरागादनुबन्धिनीभिः क्वचित् कथाभिः शुकसारिकाणाम् ॥४६॥ रतप्रवृत्तोन्मदसारसाक्षीसाकूतकण्ठध्वनिकोमलेन । आकर्षता संयमिनोऽपि चेतः क्वचित् कपोतीघनघूत्कृतेन ॥४७॥ नृत्यत्तभ्रू रशनानिनादहृद्यैः क्वचित् सारसकण्ठघोषैः । नितम्बिनीनूपुरशिञ्जिताभैर्मरालयूनां निनदैः क्वचिच्च ॥४८॥ दात्यूहपारावततित्तिरीणां प्रत्यूहशून्यप्रतिनादभाजाम् । कोलाहलेन क्वचिदादधानं मनो जनस्य श्रवणैकतानम् ॥४९॥ कहीं पुष्पधन्वा कामदेव की धनुष-प्रत्यञ्चा की टंकार क समान मनोहर, भ्रमरों की गूँज सुनाई दे रही है। कहीं षड्ज स्वर के पारगामी विद्वान् मोरों की कामदेव को बुलाने वाली केका ध्वनि सुनाई दे रही है। कहीं विलासिनी कामिनियों की प्रणय-कथा के समान चतुर, कोयलों की कूकें श्रवणगोचर हो रही हैं। कहीं परस्पर अनुराग का अनुसरण करने वालीं, तोता मैना की प्रणयकथायें हो रही हैं। कहीं सारस के समान लाल नेत्रों वाली सम्भोग में उन्मत्त रमणी के साभिप्राय रति-कूजित के समान मृदु तथा संयमी पुरुषों के भी चित्त को आकर्षित करने वाले कबूतरियों के गहरे घूत्कार सुनाई दे रहे हैं। कहीं नृत्य करती स्त्रियों की रशना (करधनी) के स्वरों के समान मनोहर सारस पक्षियों के कंठस्वर और नितम्बिनी सुन्दरी (नर्तकी) के घुंघरुओं के शब्दों के समान सुन्दर, युवक हंसों के निनाद सुनाई पड़ रहे हैं। कहीं दात्यूहों (नीले कंठ वाली चिड़िया), कबूतरों और तीतरों का निर्विघ्न प्रतिध्वनि से प्रपूरित कोलाहल सुनाई दे रहा है। इन विविध शब्दों के कारण वृन्दावन में जाने वाले पुरुष का मन पूर्णतः ही एकाग्र हो जाता है ॥४५-४९॥ विचित्रकल्पद्रुमवेदिभाजां नानामणीनां खचितैर्मयूखैः । यत्रार्कपुत्री वलयिप्रवाहा बलद्विषश्चापरुचिं बभार ॥५०॥

  • विचित्र कल्पवृक्षों की वेदी पर स्थित नाना प्रकार के मणियों की किरणों की परम्परा से यमुना, अपनी भँवर के कारण, इन्द्रधनुष की शोभा धारण कर रही थी ॥५०॥ मुरजिन्मुखवीजितस्य वेणोः कलगीतामृतनिम्नगानि मग्नाः । जगदुत्तरतां जगाहिरै ता हरितो हेलिसुतासमीपभाजः ॥५१॥ यमुना के पास की दिशायें, भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से बजाई गई बाँसुरी के मनोहर गीत रूपी अमृतनदी में डूब कर संसार में अलौकिक लग रहीं थीं ॥५१॥ (४७) यथोक्तं—‘कान्ते तथा कथमपि प्रथितं मृगाक्ष्या चातुर्यमुद्गतमनोभवया रतेषु। तत्कूजितान्यनु- वदद्भिरनेकवारं शिष्यायितं गृहकपोतशतैर्यास्याः ॥’ इति । (४५-४९) श्रीमद्भागवते (३-१५-१८) उक्तं—"पारावतान्यभृतसारसचक्रवाकदात्यूहहंसशुकति- त्तिरिबर्हिणां यः। कोलाहलो विरमतेऽचिरमात्रमुच्चैर्भृङ्गाधिपे हरिकथामिव गायमाने ॥" इति ।