सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशः सर्गः २०५ अवलम्ब्य कदम्बशाखिमूलं चिरमुल्लासितचारुचिल्लिवल्लिः । अहरत् कुतुकेन यत्र गोपीर्मुरलीकूजितकौशलेन कृष्णः ॥५२॥ इस वृन्दावन में कदम्बवृक्ष के तने का सहारा लेकर 'चिल्लि' नामक लताओं को झुमाते हुये भगवान् श्रीकृष्ण अपनी वंशीध्वनि के कौशल से गोपियों (के हृदयों को यों ही) हर लेते थे ॥५२॥ यस्य स्मृतावपि सपत्नतिरस्कृताया निःसीममम्बरमभूद् द्रुपदात्मजायाः । यत्राम्बराणि स लसत्कलसस्तनीनामस्तेनयद् विकचनीपवनीविलासी ॥५३॥ दुर्योधन दुःशासन आदि शत्रुओं द्वारा अपमानित द्रौपदी का वस्त्र, जिनके स्मरणमात्र से, सीमारहित बन गया, इस वृन्दावन के विकसित कदम्ब-कुञ्जों में विलास करने वाले उन भगवान् श्रीकृष्ण ने भी यहाँ कलशों के समान सुन्दर स्तनों वाली गोपियों के वस्त्र चुराये ॥५३॥ रासोत्सवे मण्डलिकाविलासमुपेयुषि प्रेयसि वल्लवीनाम् । भानूद्भवाया भ्रमिभङ्गभाजो विलुप्तमद्यापि न यत्र चिह्नम् ॥५४॥ जब गोपियों के प्राण भगवान् श्रीकृष्ण स्थल पर मंडल बना कर रासलीला करने के बाद गोपियों के साथ यमुना में वारिविहार के लिये उतरे, तब यमुनाजल में रासलीला का जो मंडल बना उस मंडलाकार चिह्न को आज भी यमुना अपनी भँवरों के रूप धारण कर रही है और वह चिह्न आज तक [विलुप्त नहीं हुआ] ॥५४॥ आकीर्य र... निकुञ्जकेलीशयनानि सायम् । गायन्ति यस्मि... द्वन्द्वानि नित्यं वनदेवतानाम् ॥५५॥ (इस वृन्दावन के क... सायंकाल कुञ्ज में भगवान् श्रीकृष्ण की रतिशय्या पर मनोहर पुष्प फैला कर) वनदेवताओं के मिथुन नित्य भगवान् के प्रशस्त चरितों का गान करते हैं ॥५५॥ ...हितधियां शमिनां समन्तादुल्लासितं मुररिपोर्ललितैः पदाङ्कैः । ...ने सुकृतकौतुकवर्धनं तं शैलं जगाम स यशोधनसार्वभौमः ॥५६॥ [यशस्वियों के सम्राट् राव सुर्जन उस पुण्य-वर्धन गोवर्धन पर्वत पर गये जो चारों ओर भगवान् श्रीकृष्ण के सुन्दर पदारविन्दों के चिह्नों से कृतार्थ हुआ था जिनका ध्यान विशुद्ध बुद्धि वाले मुनिजन किया करते हैं ॥५६॥ ...त्रपदमूयुषि तीव्रवृष्टिमूर्च्छत्सवत्ससुरभीकुलजीवनाय । ...वस्य गोपवपुषो विभराम्बभूव बाहुर्महेन्द्रमणिनिर्मितदण्डलक्ष्मम् ॥५७॥ (इन्द्र के कोप से होने वाली) भयंकर वर्षा के कारण व्याकुल बछड़ों, गायों (और गोप- गोपियों) के समूह की जीवनरक्षा के लिये जब गोवर्धन पर्वत छत्र बना, तब गोपवेशधारी भगवान् श्रीकृष्ण के हाथ ने उज्ज्वल नीलम मणियों से निर्मित छत्रदंड की शोभा धारण की ॥ ५७ ॥ (५२) चिल्लिः लताविशेषः । (५४) श्रीमद्भागवते (१०-३३-२४)—'सोऽम्भस्यलं युवतिभिः परिषिच्यमानः प्रेम्णेक्षितः प्रहसती- भिरितस्ततोऽङ्ग । वैमानिकैः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानो रेमे स्वयं स्वरतिरत्र गजेन्द्रलीलः ॥' इति ।