सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
तिरोहिते कौतुकतो मुकुन्दे तदङ्गसंसर्गविशेषहृद्यैः । यद्धादुरागैर्विहिताङ्गरागा दधुः स्वजीवं व्रजनीरजाक्ष्यः ॥५८॥ (रासलीला के समय) जब भगवान् श्रीकृष्ण कौतुकवश अन्तर्धान हो गये तब उनके अंगों के संसर्ग के कारण विशेष रूप से मनोहर, गोवर्धन पर्वत के गेरु आदि का अपने शरीर पर लेप करके व्रज की कमलनयनी गोपियों ने अपने प्राण धारण किये ॥५८॥
अथ घनजलधारारुद्धदिक्चक्रवालं तिमिरतिमिगभीरं मग्नसोमार्कबिम्बम् । हुतवहमनिवार्यं वारिरन्तर्दधानं समजनि घनवीथीमण्डलं सिन्धुकल्पम्॥५९॥ उसके बाद वर्षा ऋतु के कारण बादलों का समूह समुद्र के समान शोभित हुआ—वह घनी जलधाराओं से दिशाओं का मंडल व्याप्त कर रहा था, अन्धकार रूपी मगरमच्छों से गहरा लग रहा था, सूर्य और चन्द्र उसमें डूब जाते थे और वह जल में अनिवार्य अग्नि (बिजली; बड़वानल) छ