भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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अष्टादशः सर्गः २०७ पवनेन पुरोभवेन भूयो मधुराभिर्नवनीरधोरणीभिः । तपतीव्ररविप्रतापद्ग्धा वनराजीरदजीवयद् वनश्रीः ॥६४॥ वनलक्ष्मी ने ग्रीष्म के प्रचंड सूर्य के ताप से जली हुई वन की पंक्तियों को पुरवाई हवा से और नवीन जल की मधुर धाराओं से फिर जिला दिया ॥६४॥ चिरान् निवृत्तस्य घनागमस्य गाढोपगूढेन हरिद्वधूनाम् । हारा निपेतुश्छिदुरा विदूरात् पयोधरेभ्यः करकामिषेण ॥६५॥ बहुत समय बाद प्रवास से लौटे हुये वर्षा-काल द्वारा दिग्वधुओं का गाढ़ आलिंगन करने पर उनके पयोधरों से (बादलों से; स्तनों से) हारों के मोती टूट टूट कर ओलों के बहाने गिरने लगे ॥६५॥ सुहृदः समुपागतान् पयोदान् स्मृतनन्दात्मजदेहकान्तिपूराः । ददृशुः स्रवदस्रवः कथञ्चिद् बत वृन्दावनवासिनो मयूराः ॥६६॥ वृन्दावनवासी मोर, समीप आये हुये मित्र मेघों की ओर, भगवान् श्रीकृष्ण के शरीर की कान्ति के स्मरण में लीन होने के कारण, आँसू बहाते हुये, किसी प्रकार, देख सके ॥६६॥ बर्हेण येषां विदधेऽवतंसं कंसस्य शत्रुः स्वयमुज्झितेन । कलापिनः प्रे[म्णार्द्रने]त्रास्ते विलोकयन्ति स्म घनं सबाष्पाः ॥६७॥ कंसशत्रु भगवान् श्री[कृष्ण] द्वारा भी स्वयं गिरे हुये पंख को अपने सिर का आभूषण बनाते थे, वे (वृन्दावनवासी) [मोर प्रेमार्द्र नेत्र] कर, (घनश्याम के समान) मेघ की ओर, आँस बहाते हुये, देखने लगे ॥६७॥ विनापि बाणं रविलम्ब्य तावदिन्द्रायुधं निर्गुणमप्यनङ्गः । संमोहयद् विश्वमनन्यतन्त्राः काङ्क्षन्ति सिद्धौ न तु हेतुमन्यम् ॥६८॥ अ[नङ्ग (कामदेव)] ने निर्गुण (ज्यारहित) इन्द्रधनुष से ही, बिना बाण चलाये, सारे संसार को मोह[कर दिया। वास्तव] में स्वतन्त्र पुरुष कार्यसिद्धि के लिये अन्य हेतु की अपेक्षा नहीं रखते ॥६८॥ कादम्बि[नी...] भुजङ्गजाया प्राणान् पिपासुः पथिकप्रियाणां । ऊर्ध्वां[...ऽ]म्भोदफणा सनादं व्यलोलयद् विद्युतमग्रजिह्वाम् ॥६९॥ काल[...]-की पत्नी मेघमाला, विरहिणियों के प्राणवायु को पीने के लिये (सर्पों को पवनशन[...]) है), अपने काले बादल रूपी फण को फैला कर (मेघगर्जन के बहाने) फुँफ- कारती हुई, बिजली रूपी तेज जीभ हिलाने लगी ॥६९॥ विलुप्तमर्यादमुदीरितैर्जलैर्भग्नास्तटस्था अपि मेदिनीरुहाः । [किं] न कुर्वन्त्यसमञ्जसं गताः परां विवृद्धिं तरला हि निम्नगाः ॥७०॥ चपल नदियों ने बरसाती पानी से अत्यधिक बढ़ कर तथा मर्यादा छोड़ कर, अपन बाढ़ के जल से तट पर स्थित वृक्षों को भी उखाड़ फेंका ; वास्तव में नीच पुरुष, जो स्वभाव से ही चंचल हों, यदि भाग्यवश अत्यन्त समृद्ध बन जाँय, तो अपनी मर्यादा खो कर तटस्थ पुरुषों को भी कष्ट देते हैं और क्या क्या उलटी बातें नहीं कर बैठते ? ॥७०॥