सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् पुर एव नीपपवनोतिदारुणोऽदलयद् वियोगिमिथुनानि मर्मणि । किमुत प्रफुल्लनवचारुमालतीपरिरम्भसम्भृतविशेषसौरभः ॥७१॥ कदम्बों से सुगन्धित पवन ने, पहले ही भयंकर बन कर, वियोगी मिथुनों को मर्मान्तिक पीड़ा दी और जब वह नव विकसित मनोहर मालती का आलिंगन करके विशेष सुरभित हो गया, तब तो उसकी बात ही क्या ! ॥७१॥ घनान्धकारेष्वपि वीतशङ्कं ययुः प्रियं कुङ्कुमगौरगात्र्यः । अनारतोद्दामवितायमानसौदामिनीदामनि लीनदेहाः ॥७२॥ अभिसारिकायें, अपने गोरे शरीर पर केसर का लेप करके, निरन्तर वेग से चमकने वाली बिजलियों की आभा में अपने शरीरों को एक करती हुई, गहरे अन्धकार में भी, निःशंक होकर, अपने प्रियतमों के पास चली गईं ॥७२॥ आस्वाद्य जम्बूरसमन्यपुष्टश्चकूज यद्गर्जिति तोयवाहे । भेरीमुखे भाङ्कृतिभाजि तन्त्रीक्विक्वाणवत् तद्द्वितयं बभूव ॥७३॥ जामुन का रस पीकर कोयल, मेघ के गरजने पर भी, कूकने लगी; मेघ की गर्जना के साथ कोयल की कूक ऐसी लगी जैसे नगाड़े की ध्वनि के साथ वीणा का (मंजु) स्वर हो ॥७३॥ निर्जीवं विरहिगणं करोतु कामं निर्जी[वोऽयमवन्ध्य] चापः । आश्चर्यं यदमृतवृष्टिरब्दकीर्णा पा[न्थानामत्ति] दीर्घमायुः ॥७४॥ निर्जीव (ज्यारहित) इन्द्रधनुष यदि विरही व्यक्त्यि[ों को निर्जी]व (जीवनरहित) बनाये तो आश्चर्य नहीं है, किन्तु इसका आश्चर्य अवश्य है कि मेघों से बरसने वाली अमृतवृष्टि (जल- वृष्टि) भी विरही पथिकों की दीर्घ आयु को खा रही है ! ॥७४॥ नभसि सान्द्रतमःस्पृशि विश्वदृङ्मुषि तमोमणयः स्फुरिता[...] घनघट्टविकुट्टितचन्द्रमःप्रकटरेणुनिभाः परिबभ्रमुः ॥७५॥ घने अन्धकार से व्याप्त आकाश के संसार की दृष्टि को हर लेने [पर] चमकने वाले खद्योत (जुगनू) ऐसे लग रहे थे मानों बादलों की (गरजने वाली) चक्की में पिस गये [चन्द्रमा] के कण हों ॥७५॥ द्युमणिकनकगोले तोयदाङ्गारगर्भे कुलिशकृतहुताशे प्रावृषा धम्य[माने] । प्रबलपवनवेगात् सर्वतः सारितार्चिःप्रततिरचिररोचिर्व्याजितो जृम्भते स्म ॥७६॥ वर्षाकाल रूपी सुनार चन्द्रमां रूपी सोने के गोले को बादल रूपी कोय[लों] के बीच में रख कर वज्ररूपी आग में प्रबल पवन के वेग से धौंक रहा है जिससे बिजली रूपी ज्वा[ला चा]रों ओर उठ रही हैं ॥७६॥ (७४) निर्जीवो ज्यारहितः । अब्दकीर्णा मेघमुक्ता । अमृतवृष्टिः जलवृष्टिः । (७५) तमोमणयः खद्योताः ।