सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७ अष्टादशः सर्गः २०९ घनतमसि विलीने सोमसूर्यप्रसङ्गे जगति जलनिमग्ने कैरवे पङ्कजेऽपि । विरगमनुभवन्ती सङ्गमं च स्वभर्त्रा रजनिदिसवभेदं चक्रवाकी विवेद ॥७७॥ चन्द्र और सूर्य के बादलों के घने अन्धकार में छिप जाने पर तथा कुमुद और कमल के जल में डूब जाने पर, अपने पति का वियोग और संयोग अनुभव करने वाली चकवी ही रात और दिन के अन्तर को जानती थी ॥७७॥ प्रावृड्वल्ली जलधरदलस्यान्तरे द्योतिताशं विद्युद्दन्त्याजात् कुसुमनिकरं यत् करालं बभार । तस्योद्रिक्तं समजनि फलं हन्त ! तत्कालमेव प्राणत्यागो रमणविरहव्याकुलानां वधूनाम् ॥७८॥ वर्षा ऋतु रूपी लता ने मेघ रूपी पत्तों में बिजली रूपी भीषण और चमकीले पुष्प-समूह को धारण किया जिसमें शीघ्र ही प्रियतमों के विरह से व्याकुल रमणियों का प्राणत्याग रूपी बड़ा फल लगा ॥७८॥ गुरुध्वानेनैव प्रतिनगरमध्वन्यसुदृशां [जनयंश्च] दूरो मूर्च्छां सपदि कृतकृत्योऽपि कुतुकात् । व्यपेतज्या[चापा]मपि शर्बलभिदो [शो]भाद् वपुषि विभरामास मुदिरः ॥७९॥ कामदेव का मित्र मेघ भयंकर गर्जना से ही प्रत्येक नगर में विरहिणी स्त्रियों को मूर्च्छित करके यद्यपि कृतकार्य हो गया था, तथापि कुतूहलवश अपनी शोभा बढ़ाने के लिये उसने प्रत्यञ्चारहित इन्द्रधनुष को शरीर पर धारण किया ॥७९॥ [अथ] नरपतिवर्यः प्रावृषं यापयित्वा यदुपतिपदलक्ष्म्याऽलङ्कृतासु स्थलीषु । नभसि [परिरिक्ते] मुक्तनिद्रे मुकुन्दे प्रमथपतिनगर्याः सेवनाय प्रतस्थे ॥८०॥ इस[प्रकार] राजाओं में श्रेष्ठ सुर्जन, भगवान् श्रीकृष्ण की पद-लक्ष्मी से अलंकृत स्थानों में (वृन्दा[वन] आदि में) वर्षा ऋतु बिता कर आकाश के मेघरहित हो जाने पर और भगवान् विष्णु के जाग जाने पर (देवोत्थापिनी एकादशी के बाद) भगवान् शिव की काशी पुरी का सेवन करने के लिये रवाना [हुए] ॥८०॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये अष्टादशः सर्गः (७९) मुदिरो मेघः।