भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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एकोनविंशतितमः सर्गः नीत्वा दिनानि कतिचित् पथि कौतुकेन तीर्थानि पावनतमानि निषेवमाणः । स्वर्वाहिनीथमुनयोः प्रमना मनोज्ञं सम्भेदमप मकरस्पृशि चण्डभानौ ॥ १ ॥ प्रसन्न राव सुर्जन, मार्ग में, कुतूहलवश, पवित्रतम तीर्थों का सेवन करते हुये, कुछ दिन बिता कर, (माघ महीने में ) मकरसंक्रान्ति के समय गंगा और यमुना के सुन्दर संगम पर (प्रयाग) पहुँचे ॥ १ ॥ यस्मिन् बबन्ध सुषमाम्रविन्दबन्धोः पुत्री समेत्य सुरलोकतरङ्गवत्या । निर्यद्विमुक्तविशदच्छविकञ्चुकार्धा पापावलीकवलने प्रसुतेव सर्पी ॥ २ ॥ संगम में सूर्यपुत्री यमुना भगवती गङ्गा से मिल कर इस प्रकार सुशोभित हो रही है मानों पाप-समूह को निगलने के लिये बढ़ने वाली साँपिन हो जि[सके शरीर से] चमकती हुई केंचुल आधी उतर