सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशतितमः सर्गः २११ वारां भ्रमे कमलवल्लभकन्यकायाः पाथः क्वचिन्मिलितमम्बरशैव लिन्याः । आभासते स्म शतपत्रमिवावदातं नाभीह्रदान्तरगतं पतगेन्द्रकेतोः ॥ ६ ॥ और कहीं पर यमुना की भँवर से गंगा की लहर मिल कर इस प्रकार सुशोभित हो रही है जैसे भगवान् विष्णु की नाभि में लगा हुआ श्वेत कमल हो ॥ ६ ॥ निर्वर्त्य कृत्यमुचितं रुचिरं च तत्र दानं स दानवरिपौ विनिवेशितात्मा । तप्त्वा तपांसि तपसि प्रसितो यशोभिर्विश्वेशदर्शनसमुत्कमनाः प्रतस्थे ॥७॥ भगवान् विष्णु में मन लगाने वाले राव सुर्जन प्रयाग के त्रिवेणी संगम में उत्तम दान देकर और उचित कार्य समाप्त करके तथा तप करके यश से शुभ्र बने हुये, भगवान् विश्वनाथ के दर्शन की उत्कंठा के कारण काशी की ओर रवाना हुये ॥ ७ ॥ 'निःश्रेयसश्रिय उदार विहारभूमिः सौभाग्यसिद्धिरखिलावनिमण्डलस्य । प्राप्ता प्रिया पुररिपोरथ पार्थिवेन वाराणसी सुकृतसारभूतामुपास्या ॥८॥ इसके बाद राव सुर्जन भगवान् विश्वनाथ की प्रिय नगरी काशी पहुँचे, जो पुण्यात्मा पुरुषों द्वारा सेव्य ह, जो समस्त भूमंडल की सौभाग्यसिद्धि है और जो मोक्ष-लक्ष्मी की उदार विहार- भूमि है ॥ ८ ॥ आनन्दसान्[...]ङ्गमन्तःप्रसादविशदाननमीशमुख्याः । गोपाल इत्य[...] व्यासोऽवदत् विदिततीर्थवरप्रभावः ॥९॥ [...]तीर्थ श्रेष्ठ वाराणसी [...]ले राजपुरोहित गोपाल व्यास ने आनन्द के कारण होने वा[ले] घने रोमांच से यु[...]ङ्ग वाले और हृदय की प्रसन्नता के कारण खिले हुये मुख वाले राजा स[...] से इस प्रका[र] निवेदन किया ॥ ९ ॥ [...]लतमेघघटाविमुक्तमर्यादसागरजलेऽपि न या निमज्जेत् । [...]पयति कल्पसमीरणोऽपि याऽपेक्षते क्वचन नापि गुणाभियोगम् ॥१०॥ [...]तारयत्यखिल[...]तरमन्तरेण यत्रेश्वरः सपदि दक्षिणकर्णधारः । दुष्पार[...]महार्णवलङ्घनाय काऽप्यीयमायतिमती तरणिर्नराणाम् ॥११॥ यह क[...] जो प्रलय काल