सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् आरोहतः कुतुकतो रजनीष्वमुष्याः प्रासादशैलशिखरं शशिशेखरस्य । सद्यस्तिरोहितशिरःस्थितबालचन्द्रः पूर्णः कलानिधिरुपैति किरीटभावम्॥१२॥ जब (पूर्णिमा को) रात में कुतूहलवश भगवान् शिव इस काशी के विशाल महल के शिखर पर चढ़ते हैं तब (आकाशस्थित) पूर्ण चन्द्र, भगवान् के मस्तक पर विराजमान बालचन्द्र को ढक कर स्वयं किरीट बन जाता है ॥१२॥ निर्मथ्य नोरनिधिमुद्धतमादितेयाः पीत्वाऽमृतान्यपि भयं मुमुचुर्न मृत्योः । मृत्युः स्वयं प्रवितरत्यमृतं यदस्यां कीटोऽपि येन सुतरामकुतोभयः स्यात् ॥१३॥ देवों ने समुद्र को अत्यन्त वेग से मथ कर अमृत पिया, फिर भी उन्हें मृत्यु के भय से छुटकारा नहीं मिल सका, किन्तु इस काशी में स्वयं मृत्यु अमृत बाँटती है जिस कारण तुच्छ कीड़ा भी अत्यन्त निर्भय हो जाता है। (काशी में मरने वालों की मुक्ति हो जाती है।) ॥१३॥ आख्याय कर्णपदवीमनुजन्मभाजां मन्त्रं मृगाङ्कमुकुटः किल तारकाख्यम् । आश्चर्यमत्र भगवान् गुरुरप्यदम्भमात्मानमन्तसदि सादरमर्पयेद् यत् ॥१४॥ काशी में मरने वालों के दाहिने कान में स्वयं भगवान् शिव तारक मंत्र सुनाते हैं और आश्चर्य है कि भगवान् शिव, गुरु होकर भी, अपने आपको सर्वतोभावेन उस शिष्य को सादर अर्पण कर देते हैं ! (लोक में तो जब शिष्य अपने आपको सर्वतोभावेन गुरु को सादर अर्पण कर देता है तब गुरु उसे मंत्रोपदेश देते हैं, किन्तु यहाँ भगवान् शि[व...] अपने आपको शिष्य को अर्पण कर देते हैं अर्थात् उसका भवबन्धन छुड़ा क[...] देते हैं) ॥१४॥ ज्योतिर्मयो जयति पञ्चमुखस्य पञ्च[...] जगदुज्ज्वलश्रीः । पञ्चत्व